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‘Son, you outgrew my lap but never my heart’ – Fauzia Ansari in search of her son: Debangana Chatterjee

On August 14, 2013, Shivam Vij wrote in Kafila  about Hamid Ansari, a young Management Studies graduate from Mumbai who crossed the border illegally to Pakistan in November 2012, to meet a young woman, and has been missing since. At the time Shivam wrote the post, there were indications that Hamid had been picked up by Pakistani security agencies.

Beena Sarwar, Pakistani human rights activist, wrote in July this year about the possibility of ‘cautious optimism’, following the directive of Peshawar High Court to Pakistan’s defence and interior ministries to provide full information about the forced disappearance of Hamid Ansari and of 25 others, who are Pakistani nationals. Her account is worth reading in full, outlining as it does, the ways in which cross border solidarities of democratic forces consistently work to soar above and also to undermine the barbed wire fences of nation-states.

DEBANGANA CHATTERJEE, a Delhi-based MA student, met Hamid’s mother a few days ago, and wrote this piece after talking to her, outlining some new developments in the case. We have retained Fauzia Ansari’s voice as far as possible in this narrative.

The story of Hamid Ansari, a 28 year old IT engineer and management studies graduate, started unfolding when I came across his mother, Fauzia Ansari at a conference on ‘Challenges to Indian Democracy’ organized in Delhi by the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace a few days ago, on August 30-31. Fauzia Ansari is a lecturer of Hindi at a college in Mumbai. Like other mothers, Fauzia says she too had vibrant dreams of her son’s bright future. But a nightmare has unfolded instead. Continue reading ‘Son, you outgrew my lap but never my heart’ – Fauzia Ansari in search of her son: Debangana Chatterjee

राष्ट्रवाद का मौसम

मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत पर कश्मीरी छात्रों की खुशी जाहिर करने पर स्थानीय छात्रों द्वारा उनकी पिटाई और तोड़-फोड़ के बाद तीन दिनों के लिए छियासठ छात्रों के  निलंबन (निष्कासन नहीं) और फिर ‘उनकी हिफाजत के लिए’ उन्हें उनके घर भेजने के विश्वविद्यालय के फैसले के बाद उन छात्रों पर राष्ट्रद्रोह की धाराएं लगाने से लेकर उन्हें वापस लेने तक और उसके बाद भी जो प्रतिक्रियाएं हुई हैं,वे राष्ट्रवादी नज़रिए मात्र की उपयोगिता को समझने के लिहाज से काफी शिक्षाप्रद हैं.आज यह खबर आई है कि ग्रेटर नॉएडा के शारदा विश्विद्यालय में भी छह छात्रों को छात्रावास से ऐसी ही घटना के बाद निकाल दिया गया है जिनमें चार कश्मीरी हैं. मामला इतना ठंडा क्यों है, ऐसी निराशा जाहिर करते हुए फेसबुक पर टिप्पणी की गयी है और उसके बाद तनाव बढ़ गया है.

रोशोमन नियम के अनुसार घटना के एकाधिक वर्णन आ गए हैं और तय करना मुश्किल है कि इनमें से कौन सा तथ्यपरक है. स्थानीय (राष्ट्रीय या राष्ट्रवादी?) तथ्य यह है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों के प्रदर्शन और फिर उस टीम की जीत पर कश्मीरी छात्रों ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जिससे  भारतीय टीम की हार से पहले से ही दुखी स्थानीय छात्रों में रोष फैल गया. निलंबित कश्मीरी छात्रों का कहना है कि वे हर उस खिलाड़ी के प्रदर्शन पर ताली बजा रहे थे जो अच्छा खेल रहा था. बेहतर टीम पकिस्तान के जीतने पर उनका खुशी जाहिर करना कहीं से राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता. उनके मुताबिक  इसके बाद उन्हें पीटा गया और तोड़-फोड़ की गई. Continue reading राष्ट्रवाद का मौसम