इस्लामिस्ट एवं हिन्दुत्ववादी: कब तक चलेगी यह जुगलबंदी!

आखिर इस्लामिस्ट क्यों खुश हैं नागरिकता संशोधन अधिनियम से

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प्रतीकात्मक तस्वीर। 

विजयादशमी के दिन सरसंघचालक की तकरीर आम तौर पर आने वाले समय का संकेत प्रदान करती है।

विश्लेषक उस व्याख्यान की पड़ताल करके इस बात का अंदाज़ा लगाते हैं कि दिल्ली में सत्तासीन संघ के आनुषंगिक संगठन भाजपा की आगामी योजना क्या होगी।

विगत माह विजयादशमी के दिन संघ सुप्रीमो के व्याख्यान का फोकस नागरिता संशोधन अधिनियम पर था, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि यह अधिनियम किसी भी ‘धार्मिक समुदाय’ के साथ भेदभाव नहीं करता है और मुसलमानों को एक छद्म प्रचार से गुमराह किया गया है। उनके मुताबिक संसद में यह कानून संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके पारित हुआ है, एक तरह से सरहद पार के उन भाइयों एवं बहनों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिन्हें वहां धार्मिक प्रताडना झेलनी पड़ती है।

मालूम हो कि उन दिनों चूंकि बिहार चुनावों की सरगर्मियां बनी हुई थीं, लिहाजा उनके वक्तव्यों से निकले संकेतों पर अधिक बात नहीं हो सकी।

गौरतलब है कि बंगाल के चुनावों के मद्देनज़र भाजपा के कुछ अग्रणी नेताओं ने भी इसी किस्म की बातें शुरू कर दी हैं। मालूम हो कई बार अपनी आम सभाओं में उनके कई अग्रणी, ‘दीमक’ की तरह ऐसे ‘अवांछितों’ को हटाने की बात पहले ही कर चुके हैं।

प्रश्न यह है कि क्या कोविड काल में इस सम्बन्ध में नियम बनाने का जो सिलसिला छोड़ दिया गया था क्या उसी मार्ग पर सरकार चलने वाली है और इसे लागू किया जाने वाला है या यह सिर्फ चुनावी सरगर्मी बनाए रखने का मामला है।

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