Tag Archives: NCF 2005

दीनानाथ बत्रा और उदार बुद्धिजीवी

दीनानाथ बत्रा की आलोचना में एक और टिप्पणी पहुँचने से किसी भी सम्पादक को कोफ़्त होगी:आखिर एक ही बात कितनी बार की जाए!लेकिन खुद दीनानाथ बत्रा और उनके ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ को कभी भी वही एक काम बार-बार करते हुए दुहराव की ऊब और थकान नहीं होती. इसीलिए कुछ वक्त पहले वेंडी डोनिगर की किताब ‘एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री ऑफ़ हिंदुइज्म’ के खिलाफ मुकदमा दायर करके और प्रकाशक पर लगातार उसे वापस लेने का दबाव डाल कर ‘आंदोलन’ ने जब पेंगुइन जैसे बड़े प्रकाशक को मजबूर कर दिया कि वह उस किताब की बची प्रतियों की लुगदी कर डाले और भारत में उसे फिर न छापे, तो आपत्ति की आवाजें उठीं लेकिन उसके कुछ वक्त बाद ही जब उन्होंने ‘ओरिएंट ब्लैकस्वान’ को 2004 में छापी गई शेखर बन्द्योपाध्याय की किताब From Plassey to Partition: A History of Modern India पर कानूनी नोटिस भेज दी और उस दबाव में मेघा कुमार की किताब(Communalism and Sexual Violence: Ahmedabad Since 1969) ,कई और किताबों के साथ,रोक ली गई तो कोई प्रतिवाद नहीं सुनाई पड़ा. यानी आखिरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार थक गए लगते हैं. Continue reading दीनानाथ बत्रा और उदार बुद्धिजीवी

’बिगड़ैल बच्चे की खोज में’: हिमांशु पंड्या

“क्या आपको इस बात का अहसास है कि ताकाहाशी को ‘तुम्हारी पूँछ तो नहीं है?’ पूछने पर कैसा लगा होगा” बच्चे शिक्षिका का जवाब नहीं सुन पाए. उस समय तोत्तो चान यह नहीं समझ पायी कि पूंछ वाली बात से हेडमास्टर साहब इतना नाराज़ क्यों हुए होंगे क्योंकि अगर कोई उससे यह पूछता कि तोत्तो चान तुम्हारे क्या पूंछ है? तो उसे तो इस बात में मजा ही आता.
-‘तोत्तो चान’ (तेत्सुको कुरोयांगी, अनुवाद – पूर्वा याग्निक कुशवाहा)

दलित चेतना और कार्टूनों का पुनर्पाठ
इस कार्टून पर चली ऐतिहासिक बहस के बाद अब यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि साहित्य से आगे अभिव्यक्ति के अन्य क्षेत्रों में भी दलित चेतना ने दस्तक दे दी है। शायद हम कल चित्रकला और बहुत आगे संगीत में भी दलित चेतना युक्त दृष्टि से इतिहास का पुनर्पाठ देखेंगे। Continue reading ’बिगड़ैल बच्चे की खोज में’: हिमांशु पंड्या

Please Sir, may I take a newspaper into my class?

At last, the real anxieties lurking behind what has come to be called the “Ambedkar cartoon” controversy are out in the open. It is hideously clear by now that MPs “uniting across parties” are acting as one only to protect themselves from public scrutiny, debate and criticism. It turns out, as some of us suspected all along, that the “sentiments” that have been “hurt” this time are the easily bruised egos of our elected representatives.

(By the way, you may have noticed that “MPs unite across party lines” is not a headline you will ever see after a massacre, a natural calamity, brazen public acts of sexual violence  against women and so on.  Oh no. Such unity is reserved only for utterly self-serving and anti-democratic interpretations of  “Parliamentary privilege”).*

Artist: Abu Abraham

Declared HRD minister Kapil Sibal – “Much before the issue came to parliament, I had already taken action. I called for the NCERT text books and I looked at other cartoons. I realised that there were many other cartoons that were not in good taste and disparaging in nature. They were not sending the right message to our children in classrooms”.

Continue reading Please Sir, may I take a newspaper into my class?