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‘चरित्र-निर्माण की सदी’?

आरएसएस कैसे धीरे–धीरे अपने ही इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रहा है

एक सदी बीत गयी जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से हिन्दुओं के संगठन (इसके बजाए इसे ‘हिन्दू पुरुषों‘ का संगठन कहना वाजिब होगा क्योंकि इसमें हिन्दू महिलाओं को प्रवेश नहीं मिल सकता) की नींव पड़ी , जब नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार , उनके राजनीतिक मार्गदर्शक डॉ बी एस मुंजे और विनायक दामोदर सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर तथा अन्य दो सहयोगियों ने संघ की स्थापना की।  पिछले ही साल उसके निर्माण की सदी मनाई गयी थी।  

आज संघ अपनी कामयाबी के उरूज़ पर कहा जा सकता है , जबकि उसके आनुषंगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सत्ता की बागडोर है, और उसके अन्य सहयोगी जमातों के कारिंदे देश के अग्रणी संस्थाओं को नियंत्रित कर रहे हैं; हालाँकि यह भी उतना ही सही है कि उसके निर्माण, उसके संचालन और उसकी भूमिका को लेकर वह हमेशा विवादों में रहा है। पिछले दिनों कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस के पंजीकरण, उसके द्वारा किये जा रहे अकूत धनसंग्रह और उसके हिसाब किताब के जब बात उठायी, तब ये सवाल फिर ज़िंदा हो गए। 

शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों में संघ के प्रभाव में लाये जा रहे बदलावों के बारे में अक्सर बात होती है, मगर इसी क़िस्म की कवायद में संघ अपने अतीत को लेकर भी सक्रिय है – यह बात ज़्यादा लोग नहीं जानते। Read the full article here : https://nayapath.in/how-is-the-rss-trying-to-write-its-own-history-again-subhash-gatade/]

हिंसा की राजनीति बनाम जनांदोलन

राजकीय हिंसा  के अन्यायपूर्ण होने को लेकर जिनके मन में कोई  शंका नहीं है, वे माओवादी या ‘जनता’की हिंसा के प्रश्न पर हिचकिचा जाते हैं.ऐसा इसलिए नहीं होता कि वे बेईमान हैं, बल्कि इस वजह से कि हिंसा को वैध राजनीतिक तरीका मानने को लेकर  चली आ रही बहस अभी ख़त्म नहीं हुई है. यह अलग बात है कि भगत सिंह जैसे बौद्धिक क्रांतिकारी पिछली सदी के पूर्वार्ध में ही यह समझ गए थे  कि  जन आंदोलनों  का कोई  विकल्प नहीं है. जनता की गोलबंदी,न कि हथियारबंद दस्तों के ज़रिये गुर्रिल्ला युद्ध,यह समझ भगत सिंह की बन रही थी.क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा में उन्होंने लिखा, “बम का रास्ता १९०५ से चला आ रहा है और क्रान्तिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है….आतंकवाद हमारे समाज में क्रांतिकारी चिंतन के पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है या एक पछतावा.इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है. शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ था.इसने राजनीति को आमूल बदल दिया. नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को चमकाया,आत्मत्याग की भावना को ज्वलंत रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई को ज़ाहिर करने का अवसर मिला. लेकिन यह स्वयं में पर्याप्त नहीं है. सभी देशों में इसका इतिहास असफलता का इतिहास है…. . इसकी पराजय के बीज  इसके भीतर ही हैं.” इस उद्धरण से यह न समझ लिया जाए कि  भगत सिंह ने इस रास्ते से अपने आप को एकदम काट लिया था,पर यह साफ़ है कि वे बड़ी शिद्दत से यह महसूस करने लगे थे कि बिना सामूहिक कार्रवाई के  सफलता प्राप्त करना संभव नहीं.भगत सिंह के ये वाक्य मानीखेज और दिलचस्प है:”विशेषतः निराशा के समय आतंकवादी तरीका हमारे प्रचार-प्रसार में सहायक हो सकता है,लेकिन यह पटाखेबाजी के सिवाय कुछ है नहीं.”वे स्पष्टता से लिखते है, “क्रांतिकारी को निरर्थक आतंकवादी कार्रवाईयो और व्यतिगत आत्मबलिदान के दूषित चक्र में न डाला जाए. सभी के लिए उत्साहवर्द्धक आदर्श,उद्देश्य के लिए जीना -और वह भी लाभदायक तरीके से योग्य रूप में जीना – होना चाहिए.”
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