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Remembering People’s Historian Amalendu Guha (1924-2015): Bonojit Hussain and Mayur Chetia

Guest post by BONOJIT HUSSAIN and MAYUR CHETIA

A Tribute and a Bibliography

স্বৰ্গত ৰুচি নাই, যাওঁ মই ভাটিখানালৈ

জুৱাৰী-মদপী-বেশ্যা-সিহঁতকো মেলত গোটাই

মনৰ চিতাৰ ছাই উৰুৱাই গাওঁ আশাবৰী :

আকাশত উৰা মাৰে জাকে জাকে ফিনিক্স চৰাই !

Amalendu Guha
Amalendu Guha

I have no desire for heaven,

Instead I go to the brewhouse,

Gamblers, drunkards, prostitutes – bringing them together

I sing of hope, sprinkling ashes from my soul’s pyre:

In flocks the phoenix flies to the sky.

  • “মোৰ কবিতা / My Poetry” Amalendu Guha 1960

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वामपंथ, माकपा और जनवादी क्रांति बकौल प्रभात पटनायक

[This post is a response to Prabhat Patnaik’s article ‘Why the Left Matters’ which appeared in the Indian Express on 17 March. A version has appeared in two parts in Jansatta]

पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं. इनमें से दो, बंगाल और केरल वाममोर्चा शासित प्रदेश हैं. केरल में तो भारत के अन्य राज्यों की तरह  चुनावों के परिणामस्वरूप सरकारें बदलती रही हैं , बंगाल ने पिछले  चौंतीस  साल से वाम मोर्चे के अलावा किसी और सरकार का तजुर्बा करना ज़रूरी नहीं समझा है. इसे अक्सर बंगाल की जनता की राजनीतिक परिपक्वता के तौर पर व्याख्यायित किया गया है. बौद्धिक जगत में साम्यवादी विचार की वैधता के लिए भी जनता द्वारा दिए गए इस स्थायित्व का इस्तेमाल वैसे ही किया जाता रहा है जैसे कभी सोवियत संघ और अन्य पूर्वी युरोपीय देशों या अभी भी चीन में  साम्यवादी दल के  सत्ता के अबाधित रहने से उसे प्राप्त था.  बल्कि कई बार इसे अन्य  राज्यों की जनता के राजनीतिक दृष्टि से पिछ्ड़े होने के प्रमाण के रूप में भी पेश किया जाता रहा है . इस बार स्थिति कुछ बदली हुई लग रही है. अगर बंगाल में अनेक स्तरों के स्थानीय निकायों के चुनाव कुछ इशारा कर रहे हैं तो वह सत्ता परिवर्तन का है.

Prabhat Patnaik, leading CPI-M aligned intellectual
Prabhat Patnaik, leading CPI-M aligned intellectual

संसदीय प्रणाली पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस प्रकार का परिवर्तन जीवन का नियम माना जाता है, बल्कि इस अस्थिरता में ही उसकी जीवंतता का स्रोत भी देखा जा सकता है. लेकिन बंगाल की जनता द्वारा मत-परिवर्तन की संभावना एक विशेष बौद्धिक संवर्ग के लिए चिंता का विषय बन गई है. प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने कुछ पहले इस संकेत की असाधारणता की ओर ध्यान दिलाते हुए एक टिप्पणी लिखी है. बल्कि यह जनता और विशेषकर भारत के शिक्षित समुदाय से एक अपील ही है – भारत की लोकतांत्रिक क्रांति की रक्षा की अपील. उनके कहने का सार यह है कि भारत की सतत वर्धमान लोकतांत्रिक क्रांति पर प्रतिक्रांतिकारी शक्तियों के बादल मंडरा रहे हैं और इस बार यह खतरा वास्तविक और आसन्न है. इस खतरे का सामना करने के लिए प्रभात आवश्यक मानते हैं कि वामपंथ को चुनाव में प्रतिकूल परिणाम न झेलना पड़ॆ.  उनके अनुसार वामपंथ को कोई भी चुनावी धक्का दरअसल लोकतांत्रिक क्रांति के लिए मरणांतक आघात साबित हो सकता है.

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Reflections on Revolutionary Violence

In the last one year, I have often found myself going back to a conversation I had had with a Maoist ideologue. As it happened, it was he who started interrogating me about my stand on violence. ‘So, you have become a Gandhian?’ he demanded. I must confess I was a bit taken aback, not quite able to figure out the context of this poser. ‘What do you mean by Gandhian’, I kind of mumbled. Pat came his reply: ‘Well you have been making some noises lately about Maoist violence, haven’t you?’ Suddenly it all became clear. Through this ridicule, he was trying to appeal to that part of me that still remained marxist – presumably now buried in some remote past – and to resurrect it against my ostensible ‘non-marxist’, ‘liberal’ present (for which ‘Gandhian’ was some kind of a short hand code). I found myself at a loss of words. Does a criticism of the mindless and nihilistic violence of the Maoists make one a Gandhian? Is there no space left between these two polar positions? The conversation did not go very far that day but has kept coming back to me ever since.

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