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पड़ोसी और अजनबी

पड़ोसी कब पड़ोसी न रह कर अजनबी बन जाता है ? या वह हमेशा ही एक अजनबी रहता है जिस पर मौक़ा मिलते ही हमला करने में ज़रा हिचक नहीं होती ? हम अपना पड़ोस चुनते कैसे हैं? क्या पड़ोस मात्र एक भौगोलिक अवधारणा है? क्या जो भौगोलिक दृष्टि से हमारे करीब है, वही हमारा पड़ोसी होगा? पड़ोस चुनना क्या हमारे बस में नहीं? क्या पड़ोस कुछकुछ धर्म या भारतीय जाति की तरह है जिसके साथ जीवन भर जीने को हम बाध्य हैं? क्या पड़ोस का अर्थ हमेशा आत्मीयता ही है? क्या पड़ोस का मतलब एक दूसरे का ख़याल रखना,आड़े वक्त एक दूसरे के काम आना ही है? या यह रिश्ता अक्सर उदासीनता का होता है , जिसमें हमें दरअसल अपने पड़ोसी में दिलचस्पी नहीं होती? क्या इस उदासीनता के हिंसा में बदल जाने के लिए कोई भी कारण काफी हो सकता है? यह प्रश्न जितना शहर के सन्दर्भ में प्रासंगिक है उतना ही भारतीय गाँव के सन्दर्भ में भी पूछे जाने योग्य है. एक बार फिर, मुज़फ्फरनगर के गाँव में हुई हिंसा के बाद, पड़ोस के मायने पर बात करना ज़रूरी हो उठा है. Continue reading पड़ोसी और अजनबी

Brilliant Tutorials: Trisha Gupta reviews Siddharth Chowdhury’s “Day Scholar”

Guest post by TRISHA GUPTA

On the face of it, Siddharth Chowdhury’s Day Scholar, is a coming of age novel. The book’s own inside cover actually describes it as a “crazed and profane coming of age tale”, whose plot is ostensibly about how Patna boy Hriday Thakur (“who hopes to be a writer some day”) is first “trapped… by a series of misjudgements” and later “saved from a terrible end”. But much like Chowdhury’s previous offering, Patna Roughcut (also billed as “a story of love, idealism and sexual awakening” that takes us to “the heart of an aching, throbbing youth”), Day Scholar – despite a self-referential moment when its protagonist is asked by his father about how his Bildugsroman is coming along – is not a book that seems containable within the neat boundaries of the coming-of-age genre. Continue reading Brilliant Tutorials: Trisha Gupta reviews Siddharth Chowdhury’s “Day Scholar”