Tag Archives: Muzaffarnagar communal violence 2013

Everybody Loves A Good Riot

This here is a 360 video of Friday namaaz at the Rangrezi masjid in Lisad, a village where 13 Muslims were killed in the Muzaffarnagar Riots of 2013.

Play the video, and tilt your phone left, right, up or down to explore the mosque. If you are watching this on your computer, click on the screen and drag your mouse to look around this space.

I shot this video last week in Muzaffarnagar as part of “Everybody Loves A Good Riot” – an immersive multimedia project detailing western Uttar Pradesh’s “riot economy”. The story features 2 more 360 videos like the one above, as well as a text story to mark the 3rd anniversary of the Muzaffarnagar riots. Experience the full story here

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था! हाँ! हमें 2002 की गर्मियां ज़रूर याद हैं, मस्जिदों में चल रही पनाहगाह की याद है, याद हैं गम से खामोश और समझदार आँखें जो हमें देख रही थीं जो उनका दुःख बँटाने आए थे वहाँ, कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ वक्त गुजारने, फिर जो अपने घरों को लौट जाने को थे क्योंकि हमारे घर थे जहां हम लौट सकते थे, घर जो आपका इंतज़ार जितना करता है उससे कहीं ज़्यादा दिन-हफ्ते उससे बाहर गुजारते हुए आप उसका करते हैं. वे आँखें जानती थीं कि हमारे घर हैं लौटने को और उनके नहीं हैं. वे अशफाक, सायरा, शकीला होने की वजह से बार-बार घर खोजने को नए, सिरे से उन्हें बसाने को मजबूर हैं, कि उनको  और उनकी आगे की पीढ़ियों को इसका इत्मीनान दिलाने में यह धर्मनिरपेक्ष भारत,यह हिन्दुस्तान लाचार है. जिसकी हस्ती कभी नहीं मिटती, उस हिन्दुस्तान को बनाने वालों में कई को ज़रूर एक ज़िंदगी में कई जिंदगियां गढ़नी पड़ती हैं. एक घर के बाद कई घर बसाने पड़ते हैं. Continue reading ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद

सामूहिक अपराध और जवाबदेही

मुज्ज़फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी तय करने का मसला पेचीदा होता जा रहा है.क़त्ल हुए हैं,बलात्कार की रिपोर्ट है, घर लूटे और बर्बाद किए गए हैं.हजारों मुसलमान अपने घरों और गावों से बेदखल कर दिए गए हैं.यह सब कुछ अपने आप तो नहीं हुआ होगा.किसी भी अपराध के मामले में इंसाफ की प्रक्रिया की शुरुआत अभियुक्तों की पहचान और उनकी नामजदगी से होती है.मुज्ज़फरनगर के हिंदू ग्रामीणों को इस पर ऐतराज है.उनका दावा है कि शिकायतें, जो मुस्लिम उत्पीड़ितों ने दर्ज कराई हैं और जिनके आधार पर अभियुक्तों को चिह्नित किया गया है,गलत हैं.वे और उनके लोग निर्दोष हैं और इसलिए पुलिस को धर पकड़ की अपनी कार्रवाई से बाज आना चाहिए.

अभियुक्तों को गिरफ्तार करने गई पुलिस पर हमले किए जा रहे हैं और पकड़े गए लोगों को छुड़ा लिया जा रहा है.हथियारों के साथ औरतें सड़क पर हैं,कहते हुए कि वे अपने बच्चों और मर्दों के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगी.किसी तुलना के लिए नहीं,लेकिन ऐसे सामूहिक प्रतिरोध के बारे में राय कायम करने एक लिए क्या हम किसी दहशतगर्द हमले में शक की बिना पर किसी मुस्लिम बस्ती में की जा गिरफ्तारी के इसी तरह के सामूहिक विरोध की कल्पना कर सकते हैं?उस समय हम उसे उस समूह की  अविचारित सामूहिक प्रतिक्रिया ही मानेंगे. Continue reading सामूहिक अपराध और जवाबदेही

पड़ोसी और अजनबी

पड़ोसी कब पड़ोसी न रह कर अजनबी बन जाता है ? या वह हमेशा ही एक अजनबी रहता है जिस पर मौक़ा मिलते ही हमला करने में ज़रा हिचक नहीं होती ? हम अपना पड़ोस चुनते कैसे हैं? क्या पड़ोस मात्र एक भौगोलिक अवधारणा है? क्या जो भौगोलिक दृष्टि से हमारे करीब है, वही हमारा पड़ोसी होगा? पड़ोस चुनना क्या हमारे बस में नहीं? क्या पड़ोस कुछकुछ धर्म या भारतीय जाति की तरह है जिसके साथ जीवन भर जीने को हम बाध्य हैं? क्या पड़ोस का अर्थ हमेशा आत्मीयता ही है? क्या पड़ोस का मतलब एक दूसरे का ख़याल रखना,आड़े वक्त एक दूसरे के काम आना ही है? या यह रिश्ता अक्सर उदासीनता का होता है , जिसमें हमें दरअसल अपने पड़ोसी में दिलचस्पी नहीं होती? क्या इस उदासीनता के हिंसा में बदल जाने के लिए कोई भी कारण काफी हो सकता है? यह प्रश्न जितना शहर के सन्दर्भ में प्रासंगिक है उतना ही भारतीय गाँव के सन्दर्भ में भी पूछे जाने योग्य है. एक बार फिर, मुज़फ्फरनगर के गाँव में हुई हिंसा के बाद, पड़ोस के मायने पर बात करना ज़रूरी हो उठा है. Continue reading पड़ोसी और अजनबी

Muzaffarnagar 2013 – Violence by Political Design: Centre for Policy Analysis

This fact-finding exercise was coordinated by the CENTRE FOR POLICY ANALYSIS. Team members were the human rights activist and former civil servant Harsh Mander; former Director-General of the Border Security Force, E N Rammohan; Professor Kamal Mitra Chenoy of Jawaharlal Nehru University; National Integration Council member John Dayal; senior journalist Sukumar Muralidharan and CPA Director and senior editor Seema Mustafa.

Introduction and Overview

The first impression of the Muzaffarnagar countryside, now green with the sugarcane ripening for harvest, is of utter desolation. Villages are tense with fear.  Kasbas and hamlets are purged of their Muslim presence and the Hindu quarters have also emptied out in a self-imposed curfew even at midday, as women and children peep out from behind closed doors and windows, their menfolk having fled to avoid arrest as criminal complaints are made out against them. Fear is in the air. The atmosphere reeks of embitterment and betrayed trust, with neighbour now unwilling to trust neighbour, and apprehensive of ever returning to their accustomed lives. All the evidence points towards people who were forced to flee their habitations in sheer terror and seek out the safety of gathering among others of their own faith, occupying any vacant space in areas where they could be sure of not being targets just because of who they were.

“We will never go back to our villages”, say Muslim women refugees in a makeshift camp in the tehsil town of Budhana, some twenty kilometres from Muzaffarnagar. Continue reading Muzaffarnagar 2013 – Violence by Political Design: Centre for Policy Analysis