Tag Archives: 1984 anti-Sikh pogrom

सामूहिक अपराध और जवाबदेही

मुज्ज़फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी तय करने का मसला पेचीदा होता जा रहा है.क़त्ल हुए हैं,बलात्कार की रिपोर्ट है, घर लूटे और बर्बाद किए गए हैं.हजारों मुसलमान अपने घरों और गावों से बेदखल कर दिए गए हैं.यह सब कुछ अपने आप तो नहीं हुआ होगा.किसी भी अपराध के मामले में इंसाफ की प्रक्रिया की शुरुआत अभियुक्तों की पहचान और उनकी नामजदगी से होती है.मुज्ज़फरनगर के हिंदू ग्रामीणों को इस पर ऐतराज है.उनका दावा है कि शिकायतें, जो मुस्लिम उत्पीड़ितों ने दर्ज कराई हैं और जिनके आधार पर अभियुक्तों को चिह्नित किया गया है,गलत हैं.वे और उनके लोग निर्दोष हैं और इसलिए पुलिस को धर पकड़ की अपनी कार्रवाई से बाज आना चाहिए.

अभियुक्तों को गिरफ्तार करने गई पुलिस पर हमले किए जा रहे हैं और पकड़े गए लोगों को छुड़ा लिया जा रहा है.हथियारों के साथ औरतें सड़क पर हैं,कहते हुए कि वे अपने बच्चों और मर्दों के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगी.किसी तुलना के लिए नहीं,लेकिन ऐसे सामूहिक प्रतिरोध के बारे में राय कायम करने एक लिए क्या हम किसी दहशतगर्द हमले में शक की बिना पर किसी मुस्लिम बस्ती में की जा गिरफ्तारी के इसी तरह के सामूहिक विरोध की कल्पना कर सकते हैं?उस समय हम उसे उस समूह की  अविचारित सामूहिक प्रतिक्रिया ही मानेंगे. Continue reading सामूहिक अपराध और जवाबदेही

1984 and the Spectre of Narendra Modi: Ravinder Kaur

Guest Post by Ravinder Kaur 

As India begins the countdown to the 2014 general elections, a new discourse has started taking shape around its minority populations. It is called the ‘what about 1984’ argument. The supporters of Narendra Modi in a bid to deflect attention from his role in 2002 pogrom usually throw 1984 at his critics. The critics have lately begun responding by placing 1984 pogrom in  a less grave category in comparison to 2002. The difference we are told is the political ideology – Congress is inherently secular and 1984 an aberration whereas BJP is communal and 2002 symptomatic. This unfortunate comparison means that the ‘what about 1984’ argument has unintentionally turned 1984 pogrom into an exclusive Congress problem even when it sets out to call out Modi’s anti-minority stance. The role of Hindutava ideology has been airbrushed out of the history that led to 1984 pogrom as a consequence.

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पड़ोसी और अजनबी

पड़ोसी कब पड़ोसी न रह कर अजनबी बन जाता है ? या वह हमेशा ही एक अजनबी रहता है जिस पर मौक़ा मिलते ही हमला करने में ज़रा हिचक नहीं होती ? हम अपना पड़ोस चुनते कैसे हैं? क्या पड़ोस मात्र एक भौगोलिक अवधारणा है? क्या जो भौगोलिक दृष्टि से हमारे करीब है, वही हमारा पड़ोसी होगा? पड़ोस चुनना क्या हमारे बस में नहीं? क्या पड़ोस कुछकुछ धर्म या भारतीय जाति की तरह है जिसके साथ जीवन भर जीने को हम बाध्य हैं? क्या पड़ोस का अर्थ हमेशा आत्मीयता ही है? क्या पड़ोस का मतलब एक दूसरे का ख़याल रखना,आड़े वक्त एक दूसरे के काम आना ही है? या यह रिश्ता अक्सर उदासीनता का होता है , जिसमें हमें दरअसल अपने पड़ोसी में दिलचस्पी नहीं होती? क्या इस उदासीनता के हिंसा में बदल जाने के लिए कोई भी कारण काफी हो सकता है? यह प्रश्न जितना शहर के सन्दर्भ में प्रासंगिक है उतना ही भारतीय गाँव के सन्दर्भ में भी पूछे जाने योग्य है. एक बार फिर, मुज़फ्फरनगर के गाँव में हुई हिंसा के बाद, पड़ोस के मायने पर बात करना ज़रूरी हो उठा है. Continue reading पड़ोसी और अजनबी

An appeal to seven distinguished individuals to decline the Maulana Mohd Ali Jauhar Award

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Delhi, 3 December 2011

According to a news report in the Milli Gazette of 1 December 2011, Jagdish Tytler, an accused in the anti-Sikh pogrom of 1984, will be awarded the Maulana Mohd Ali Jauhar Award on 10 December 2011 at the India Islamic Cultural Centre, New Delhi. Seven others will share this award. The undersigned appeal to the other seven awardees to not accept the award as a mark of protest against honouring Mr Tytler, whose contribution in the 1984 anti-Sikh pogrom has been recorded by several fact-finding reports, including those by PUCL and PUDR.

The seven names are:

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