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Maoist Martyrdom vs. State Barbarism: Satya Sagar

This is a Guest Post by SATYA SAGAR.

Satya Sagar is a writer, journalist and videomaker based in New Delhi. sagarnama at gmail dot com

Is Maoism in India really the only response to poverty and lack of development? Is an armed rebellion the only way to change the way the Indian State operates? Will such a movement lead to a better future for underprivileged people in this country? Are other forms of mass democratic struggles an alternative option at all?  These are the questions that haunted me as I sat through a public hearing on drought at Daltonganj in Jharkhand’s Palamu district late October this year. Questions that are not new and have been debated repeatedly within the various strands of the Indian left movement for several decades now, with no clear answers as yet.

While I mused, there was this young woman standing on the stage, slowly edging towards the mike, patiently waiting for her turn to speak. She need not have said anything at all. Her emaciated, frail frame, the harassed look on her face and the tears silently welling up in her sunken eyes had already conveyed to us this was another tale of unmitigated tragedy. Barely in her early twenties, she had been diagnosed with tuberculosis a few months ago. Her husband was already on his deathbed due to the same affliction as there was no public health center near her village. Treatment in town was obviously unaffordable. The drought raging in the district, reported to be the worst in over half a century, would end up wiping out her entire family she explained in a quiet, matter of fact tone.

As we sat there, the small ‘jury’ of three or four of us who had come from Delhi and Ranchi to listen to the woes of Palamu’s villagers felt much, much smaller. For her horror story was only one out of some 3000 similar ones of neglect, deprivation and outright desperation that tensely waited to be recalled that early winter afternoon.
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दो पाटन के बीच

माओवादी हिंसा जायज़ है या नाजायज़? यह तसल्ली  की बात है कि  इस  सवाल पर अब बहस शुरू हो गई  है. इस प्रश्न पर बात करने का अर्थ यह नहीं है कि राज्य हिंसा का विरोध छोड दिया जाए. छत्तीसगढ़ में ”ऑपरेशन ग्रीन हंट” की व्यर्थता के बारे में और  कोई  नहीं , पंजाब के ” हीरो” के.पी.एस.गिल बोल रहे हैं. वे कोई  झोला वाले  मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं, जिनकी चीखो-पुकार को दीवानों की बड़ मान कर आज तक राज्य और पूंजी के पैरोकार नज़रअंदाज करते आए हैं.  दांतेवाडा  में दो दशकों से अधिक समय से काम कर रहे हिमान्शु ठीक ही पूछते हैं कि हर बार छत्तीसगढ़  के गाँवों  में राज्य की ओर से पुलिस या अर्धसैनिक बल ही क्यों भेजे जाते रहे हैं, डाक्टर, आंगनवाडी कार्यकर्ता या शिक्षक क्यों नहीं! इस देश के आदिवासियों के लिए राज्य का अर्थ क्या रह गया है?हमारे मित्र सत्या शिवरामन ने भी यह सवाल किया कि राज्य को आदिवासियों की सुध बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में क्यों आयी? क्या इसका कारण यह था कि उसे यह अपराध बोध सालने लगा था कि उसकी विकास योजनाओं के लाभ से राष्ट्र का यह तबका छूटता चला गया है?  या क्या इसकी ज़्यादा सही वजह यह थी कि देश और विदेश की पूंजी को अब अपने लिए  जो संसाधन चाहिए, वे जंगलों की हरियाली में छिपे हुए हैं और उस ज़मीन के नीचे दबे पड़े हैं, जिन पर  आदिवासी ‘हमारे’ इतिहास के शुरू होने के पहले से रहते चले आ रहे है! क्या राज्य को यह अहसास हुआ कि वह इस संपदा से अब तक  वंचित रहा है और इसकी वजह आदिवासियों का पिछडे तरीके से रहना ही है? पूंजी की नए संसाधनों की खोज और  आदिवासियों के विकास में  राज्य की दिलचस्पी का बढ़ना, क्या ये दो घटनाएं एक ही साथ नहीं होती दिखाई देती ?

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हिंसा की राजनीति बनाम जनांदोलन

राजकीय हिंसा  के अन्यायपूर्ण होने को लेकर जिनके मन में कोई  शंका नहीं है, वे माओवादी या ‘जनता’की हिंसा के प्रश्न पर हिचकिचा जाते हैं.ऐसा इसलिए नहीं होता कि वे बेईमान हैं, बल्कि इस वजह से कि हिंसा को वैध राजनीतिक तरीका मानने को लेकर  चली आ रही बहस अभी ख़त्म नहीं हुई है. यह अलग बात है कि भगत सिंह जैसे बौद्धिक क्रांतिकारी पिछली सदी के पूर्वार्ध में ही यह समझ गए थे  कि  जन आंदोलनों  का कोई  विकल्प नहीं है. जनता की गोलबंदी,न कि हथियारबंद दस्तों के ज़रिये गुर्रिल्ला युद्ध,यह समझ भगत सिंह की बन रही थी.क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा में उन्होंने लिखा, “बम का रास्ता १९०५ से चला आ रहा है और क्रान्तिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है….आतंकवाद हमारे समाज में क्रांतिकारी चिंतन के पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है या एक पछतावा.इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है. शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ था.इसने राजनीति को आमूल बदल दिया. नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को चमकाया,आत्मत्याग की भावना को ज्वलंत रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई को ज़ाहिर करने का अवसर मिला. लेकिन यह स्वयं में पर्याप्त नहीं है. सभी देशों में इसका इतिहास असफलता का इतिहास है…. . इसकी पराजय के बीज  इसके भीतर ही हैं.” इस उद्धरण से यह न समझ लिया जाए कि  भगत सिंह ने इस रास्ते से अपने आप को एकदम काट लिया था,पर यह साफ़ है कि वे बड़ी शिद्दत से यह महसूस करने लगे थे कि बिना सामूहिक कार्रवाई के  सफलता प्राप्त करना संभव नहीं.भगत सिंह के ये वाक्य मानीखेज और दिलचस्प है:”विशेषतः निराशा के समय आतंकवादी तरीका हमारे प्रचार-प्रसार में सहायक हो सकता है,लेकिन यह पटाखेबाजी के सिवाय कुछ है नहीं.”वे स्पष्टता से लिखते है, “क्रांतिकारी को निरर्थक आतंकवादी कार्रवाईयो और व्यतिगत आत्मबलिदान के दूषित चक्र में न डाला जाए. सभी के लिए उत्साहवर्द्धक आदर्श,उद्देश्य के लिए जीना -और वह भी लाभदायक तरीके से योग्य रूप में जीना – होना चाहिए.”
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नक्सलवाद के ख़िलाफ़ अभियान कि नाम पर

नक्सलवादियों के खिलाफ केंद्र का अभियान शुरू हो गया है. जनमत को अपने इस हिंसक अभियान के पक्ष में करने के लिए केंद्र ने अखबारों में पूरे पृष्ठ के विज्ञापन दिए  जिनमें ‘माओवादियों’ या ‘नक्सलवादियों’ के हाथों मारे गए लोगों की तसवीरें थीं. इनसे शायद यह साबित करने की कोशिश की गयी थी कि माओवादी हत्यारे  हैं, इसलिए उनके विरुद्ध चलने वाले अभियान में अगर राज्य की तरफ से हत्याएं होती हैं तो उन पर ऐतराज नहीं किया जाना चाहिए. इस विज्ञापन के फौरन बाद छतीसगढ़ में राज्य की कारवाई में साथ माओवादियों के मारे जाने का दावा किया गया.  छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसके प्रमाण पेश कर दिए कि मारे गए लोग  साधारण आदिवासी थे ,न कि माओवादी,  जैसा पुलिस का दावा था. केन्द्रीय गृहमंत्री ने इसी के आस-पास छत्तीसगढ़  में यह कहा कि माओवादियों के विरुद्ध राजकीय अभियान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रास्ते में नहीं आने दिया जाएगा. वे यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि माओवादियों के खिलाफ चल रही जंग में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अड़ंगा डाला है, अब यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इस नए संकल्प पर हंसा भी नहीं जाता. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की अगर इतनी ताकत होती तो बिनायक सेन को दो साल तक जेल में न रहना पड़ता.

छत्तीसगढ़ जैसी जगह में मानवाधिकार की बात करना अपनी जान को जोखिम में डालना है , यह हिमांशु से पूछिए जिनके बीस साल पुराने आश्रम को गैर-कानूनी तरीके से बुलडोजर लगा कर ढाह दिया गया.हिमांशु कोई  माओवादी नहीं हैं, बल्कि वे तो माओवादियों के गुस्से के निशाने पर भी रहे हैं. फिर भी हिमांशु का न्याय-बोध डगमगाया नहीं और उन्होंने छत्तीससगढ़ में पुलिस और सलवा-जुडूम की कार्रवाई के बारे में हमेशा सच बताने की अपनी जिद बनाए रखी. हिमांशु इस धारणा के खिलाफ हैं कि छत्तीसगढ़ में सिर्फ दो पक्ष हैं, एक राज्य का और दूसरा माओवादियों का . वे वहां के आदिवासियों के अपने गावों में रहने , अपने जमीन पर खेती करने के हक की हिफाजत की लडाई में उनके साथ हैं. क्या यह सच नहीं और क्या इस पर बात नहीं की जानी चाहिए कि सलवा जुडूम   के दौरान गाँव  के गाँव जला दिए गए और आदिवासियों को मजबूर किया गया कि वे सरकारी शिविरों में रहें !क्या यह सवाल राज्य से नहीं पूछा जाना चाहिए कि तकरीबन साधे छः सौ गाँवों से विस्थापित कर दिए  गए दो लाख से ऊपर आदिवासी कहाँ लापता हो गए क्योंकि वे शिविरों में तो नहीं हैं! अगर शिविरों में अमानवीय परिस्थियों में रहने को मजबूर पचास हजार आदिवासियों के अलावा बाकी की खोज करें तो क्या इस पर बात न की जाए कि क्या वे बगल के आंध्रप्रदेश में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं और जो वहां नहीं भाग पाए वे छत्तीसगढ़ के जंगलों में छिपे हुए हैं। जंगलों मे छिपे,या बेहतर हो हम कहें कि जंगलों में फंसे आदिवासी क्या माओवादियों की सेना के सदस्य मान लिए गए हैं!
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Yashpal Committee and The Future of Ideas:

The Yash Pal report argues for autonomy in higher education, both from the state and from private commercial interests.

It is only appropriate that the report of the Yash Pal Committee on higher education is being discussed by the Central  Advisory Board On education ( CABE) before being implemented. The Yash Pal Committee makes a very bold appeal for the revival of the state universities and asks the planners to bridge the huge gap that exists between them and the centrally created universities. One can only hope that the state ministers are not daunted by the report’s call to grant real and substantive autonomy to the centres of higher learning. Such autonomy would effectively mean leaving educational matters to  academics and cessation of interference by the ruling party or ideology of the day, not only in matters like selection of vice-chancellors and faculty  but also curriculum and syllabi.
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बेलगाम हिंसा और मानवाधिकार आंदोलन का ज़मीर

1 सितंबर:31 अगस्त की रात पुरुलिया की अयोध्या पहाडियों में नौदुली गाँव में तीस हथियारबंद लोग घुसे , गांववालों को घर से न निकलने का हुक्म पुकार कर सुनाया, फिर वे लतिका हेम्ब्रम के घर में घुसे  जहां वह अपने पति गोपाल के साथ सोई थी. राइफल के कुन्दों से  लतिका को पीटते हुए उन्होने धमकी दी  कि उसे उन्होंने एक साल पहले ही सी.पी.एम. छोड देने को कहा था पर उसने अब तक यह किया नहीं और अगर वह अभी भई यह नहीं करती तो वे उसे जान से मार डालेंगे.  लतिका स्त्री है, ग्राम पंचायत की प्रमुख है, पर उसकी उसके पति के साथ जम कर पिटाई की गई. हवा में गोलियां दागते हुए वे  दस किलोमीटर दूर एक दूसरे गांव जितिंग्लहर पहुंचे और देबिप्रसाद के घर पहुंचे. देबीप्रसाद के मां-बाप इनके पैरों पर गिर पडे और अपने बेटे के प्राणों की भीख मंगने लगे. पर उसे ठोकर मार कर जगाया गया और छाती में दो गोलियां मारी गईं. देबी प्रसाद की मौत हो गई. देबीप्रसाद सी.पी.एम. का सदस्य था.
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यशपाल समिति पर बहस और दिमाग़ों के ताले

उच्च शिक्षा को लेकर यशपाल की अध्यक्षता में बनी  समिति की रिपोर्ट को लेकर चल रही  बहस से भारत के पढ़े -लिखे समाज के बारे में कुछ दिलचस्प नतीजे निकाले जा सकते हैं. सबसे पहले तो यह, जो कोई नई खोज नही  है कि   यदि आपको इनके राजनीतिक झुकाव का पता है तो आप इनकी प्रतिक्रिया का सहज ही अनुमान कर सकते हैं.  वे बुद्धिजीवी भी, जो अपने आप को राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर बताते और समझते हैं, इस बीमारी से आजाद नहीं हैं. ऐसा लगता है, प्रतिक्रियाएं तैयार रखी  थीं और उनका उस रिपोर्ट की अंतर्वस्तु से कोई लेना – देना नहीं जिसकी वे बात कर रही हैं.
जो प्रौढ़ हो चुके, यानी जिनके कई प्रकार के स्वार्थ उनके राजनीतिक आग्रहों से बंधे हुए हैं, उनकी बात छोड़ भी दें तो नौजवानों में इस राजनीतिक मताग्रह से दूषित विचारक्रम को देख कर चिंता होती है. नौजवान दिल -दिमाग आजाद होने चाहिए . किसी भी घटना या विचार पर प्रतिक्रिया देते समय उन्हें उसे ठीक-ठीक समझने की कोशिश करनी  चाहिए. दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं दीखता. अगर सिर्फ  शिक्षा से उदाहरण लें तो पांच साल पहले स्कूली शिक्षा के लिए बनाई गयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर हुई बहस में इस विचारहीन मताग्रह के अच्छे नमूने मिल जायेंगे. चूंकि उस प्रक्रिया का संचालन एक ऐसा व्यक्ति कर रहा था जिसे वामपंथी नहीं माना जाता, वामपंथी समूहों ने   २००५ की पाठ्यचर्या पर संगठित आक्रमण किया. प्रखर इतिहासकारों और अन्य  क्षेत्र के विद्वानों ने जिस तरह इस दस्तावेज पर हमला किया उससे इसका अहसास हुआ कि इसकी आज़ादी तो कतई नहीं कि आप बने-बनाए वैचारिक दायरों से निकल कर कुछ सोचने -समझने का प्रयास करें.
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धारा 377, यौनिकता और नेहरू – संतानोत्पत्ति से परे

[अगर आप मोज़िल्ला फायरफ़ॉक्स के ज़रिए नेट देखते हैं तो पढ़ते वक़्‍त फ़ॉंट बढ़ाने के लिए Ctrl + का इस्‍तेमाल करें]

धारा 377 अब स्वेच्छा से यौन संबंध बनाने वाले समलैंगिकों पर लागू नहीं होगी. दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय ने भारतीय समाज की नैतिकता की परिभाषाओं की चूल हिला दी है. फैसला आने के बाद हिन्दू , मुस्लिम और अन्य धार्मिक समूहों के कई नेताओं ने इसे खतरनाक बताया है और इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय तक जाने की धमकी दी है. कुछ तो जा भी चुके हैं। सरकार को भी कहा जा रहा है कि वह इस फैसले को चुनौती दे. अब तक के सरकार के रुख से ऐसा कुछ नहीं लग रहा कि वह इस दबाव के आगे झुकेगी.

फैसला ऐतिहासिक है. इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह एक विशेष संविधान को स्वीकार करके अपने-आपको एक राष्ट्र-राज्य के रूप में गठित करने वाले जन-समुदाय के रहने-सहने और जीने के तौर-तरीकों को निर्णायक रूप से उसके पहले के सामाजिक आचार-व्यवहार से अलगाता है. यह आकस्मिक नहीं है कि न्यायाधीश ने अपने फैसले के लिए जिन राष्ट्रीय नेताओं के दृष्टिकोण को आधार बनाया , वे हैं जवाहरलाल नेहरू और भीमराव  अम्बेडकर.  नेहरू औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद एक नए भारत के लिए आवश्यक  नैतिक और सांस्कृतिक बुनियादी तर्क खोजने की कोशिश कर रहे थे. इस खोज में सब कुछ साफ–साफ दिखाई दे रहा हो, ऐसा नहीं था और हर चीज़ को वे सटीक रूप से व्याख्यायित कर पा रहे हैं, ऐसा उनका दावा भी नहीं था. नेहरू के जिस वक्तव्य को फैसले में उद्धृत किया गया है, उसमें  भी शब्दों की   जादुई ताकत के  उल्लेख करने के साथ यह भी कहा गया है कि वे पूरी तरह से एक नए समाज की सारी आकांक्षाओं को व्यक्त कर पाने में समर्थ नहीं. वे निश्चितता से भिन्न विचार और मूल्यों के एक आभासी लोक की कल्पना करते हैं. राजनेता का विशेष गुण माना जाता है, फैसलाकुन व्यवहार. नेहरू, इसके बावजूद कि एक तानाशाह बन जाने के लिए उनके पास सारी स्थितियां थीं , हमेशा इससे बचते रहे कि चीज़ों को साफ-साफ और  अलग-अलग खाचों में डाल दिया जाए.
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इतिहास से साक्षात्कार की घड़ी;

लालगढ़ मुक्त कराया जा रहा है. पिछले आठ महीने से जिस इलाके में पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी सरकार की पुलिस नही घुस पा रही थी , उस पर केन्द्र सरकार के सशस्त्र बल की सहायता से अब बंगाल की पुलिस धीरे–धीरे कब्जा कर रही है. केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा ज़रूर था कि यह कोई युद्ध नहीं हो रहा है क्योंकि कोई भी राज्य अपनी ही जनता से युद्ध नहीं करता लेकिन लालगढ़ में अभी चल रहे सैन्य अभियान की रिपोर्ट दे रहे पत्रकार लगातार यह बता रहे है कि वहां स्थिति किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं है. गांव के गांव वीरान हो गए हैं.हजारों की तादाद में आदिवासी शरणार्थी शिविरों में पनाह ले रहे हैं. ध्यान देने की बात है कि ये शिविर भी राज्य सरकार नहीं चला रही है. पहले दो बडे शिविर तृणमूल कांग्रेस के द्वारा स्थापित किए गए. लालगढ़ की जनता के लिए शिविर स्थापित करने के बारे में बंगाल की सरकार अगर नहीं सोच पाई तो ताज्जुब नहीं क्योंकि उसके हिसाब से वह उसकी जनता नहीं है, वह तो शत्रु पक्ष की जनता है!दूसरे शब्दों में वह गलत जनता है. सही जनता वह है जो मार्क्सवादियों के साथ है.

लालगढ़ में पिछले आठ महीने से एक विलक्षण जन आंदोलन चल रहा था. बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले पर हमले के बाद पुलिस ने जिस तरह लालगढ़ के आदिवासियों को प्रताड़ित किया, उसने साठ साल से भी ज़्यादा से असह्य गरीबी और अमानुषिक परिस्थितियों को झेल रही आदिवासी जनता के भीतर सुलग रही असंतोष की आग को भड़का दिया. लेकिन ध्यान दें, इन पिछड़े आदिवासियों ने कितनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया! उन्होंने ‘पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण समिति’ बनाई और लगभग हर संसदीय राजनीतिक दल से सहयोग मांगा. वह उन्हें मिला नहीं. लालगढ़ ने कहा , यहां हमारा अपमान करने वाली पुलिस और हमारी उपेक्षा करने वाले प्रशासन का स्वागत नहीं है. पुलिस और प्रशासन की उनके जीवन में अप्रासंगिकता का आलम यह है कि राज्य विहीन आठ महीनों में इस समिति ने ट्य़ूबवेल लगवाया जो बत्तीस साल के जनपक्षी वाम शासन में नहीं हो सका था, स्कूल चलाया, सड़क बनाई जो बत्तीस साल से नहीं थी और इस बीच अपराध की किसी घटना की कोई खबर नहीं मिली. एक तरह से यह जनता का स्वायत्त शासन था.
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Where there is no police: Kumar Rana

This is a guest post by KUMAR RANA

Where there is no police – what a wonderful state that would be. It’s a place that many have dreamt of, at least at some point of time if not all through the life. What a wonderful land that would be where one can eat or fast,  sleep or remain awake,  work or rest, move in or move out  completely freely, where her wishes would not be monitored by the police. So the episodes in Khejuri in East Medinipur and Lalgarh, in West Bengal, had apparently made some of the citizens happy: what a relief, there is no police.

But, alas, it was only a dream. Because there was the state and a state without police is as alive as a dead animal, the khaki was quickly replaced by lungi or jeans, and the gun by perhaps more lethal AK47 and its sort.
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Don’t do unto others, what they do to you

Do I sound like a liberal simpleton when I criticize or condemn the violence that has been unleashed in Khejuri by the ‘people’ led by the Trinzmul Congress?

Offices belonging to the CPM have been razed to ground, burnt down and vandalized. Photographs of people tearing away grills from the windows of these offices and carrying them as ‘booty’ with smiling faces tell you that the same old story is being repeated. The plot remains the same; only the hunted have turned into hunters and the hunters of the past are now running for cover.

Roads to Khejuri are blocked, ministers and leaders of the CPM turned away, again by ‘the people’. The police as usual stands mute witness as they have been trained in this state not to go against the ‘will of the people’. How does it matter to them that now these people do not belong to the CPM, masters for last three decades? They have learnt to follow, not the law, but the party. And these days in Nandigram Trinamul is ‘The Party’. And the enemy territory of Khejuri has also been annexed. Victory is complete. Continue reading Don’t do unto others, what they do to you

जे पी आन्दोलन की भूल

नीतीश कुमार आलोचना से परे हैं. इतिहासकार, राजनीतिशास्त्री, समाजवैज्ञानिक या पत्रकार, अभी सब नीतीशजी के गुणगान में व्यस्त हैं. इसलिए आश्चर्य नहीं हुआ जब जे.पी. आन्दोलन से जुड़े लोगों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री ने पेंशन की घोषणा की, तो कहीं से आलोचना का कोई स्वर नहीं सुनाई पडा, एक जनसत्ता की सम्पादकीय टिप्पणी को छोड़कर. खबरों में यह बताया गया था कि कांग्रेस विरोधी उस आंदोलन में जो जेल गए या घायल हुए, उन्हें पेंशन दी जाएगी. जनसत्ता ने ठीक ही यह प्रश्न किया कि क्या जयप्रकाश के नेतृत्व वाले उस आन्दोलन को भारत के स्वाधीनता आंदोलन के समतुल्य माना जा सकता है. यह सवाल भी अपनी जगह ठीक था कि अगर बिहार अर्थ-संकट से जूझ रहा है, तो इस बेतुकी योजना के लिए पैसे कहाँ से निकल आए!

जे.पी. आन्दोलनकारियों के लिए पेंशन की इस योजना का लाभ किस एक दल या संगठन के लोगों को सबसे ज़्यादा मिलेगा, अंदाज करना कठिन नहीं है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या तत्कालीन जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी के सदस्य इस आंदोलन में बड़ी संख्या में थे. बल्कि यह आंदोलन पहला ऐसा बड़ा मौका था, जिसने आर.एस..एस और जनसंघ को राजनीतिक मान्यता दिलाने का काम किया. जयप्रकाश आर.एस.एस. के खतरनाक स्वभाव से परिचित न रहे हों, यह आरोप उनपर नहीं लगाया जा सकता. फिर भी कांग्रेस विरोध की राजनीति के कारण जयप्रकाशजी को आर.एस.एस. के साथ काम करने में हिचक नहीं हुई. १९७४ के पहले १९६७ वह बिंदु है, जिसे आर.एस.एस. को राजनैतिक वैधता दिलाने के सन्दर्भ में याद रखना चाहिए. कांग्रेस विरोध के प्लेटफार्म पर समाजवादियों और वामपंथियों को जनसंघ के साथ आने में कोई परेशानी नहीं हुई थी. तात्कालिक राजनीतिक यथार्थ और बाध्यताओं की दुहाई दी जा सकती है और इस तरह के गठजोड़ के पक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं. लेकिन क्या हम यह मान लें कि जनसंघ को राजनीतिक और आर.एस.एस. को सामाजिक वैधता दिलाने का परिणाम भारत को आगे जा कर भुगतना था, इसकी कल्पना करने की क्षमता जयप्रकाशजी में नहीं थी! अभी इस आन्दोलन की सम्यक समीक्षा होना बाकी है, लकिन मैं २००३ के दिसम्बर महीने में एक साथ तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद रांची के अपने मित्र, जे.पी. आन्दोलन के पहले दौर के कार्यकर्ता, पत्रकार फैसल अनुराग की बात भूल नहीं पाता हूँ. उन्होंने बड़ी तकलीफ के साथ कहा कि मैं अब सार्वजनिक रूप से यह कहने को तैयार हूँ की जे.पी. आंदोलन एक बहुत बड़ी भूल का शिकार था.
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The Collapse of Hegemony: Kumar Rana

[This is a guest post by KUMAR RANA. Kumar Rana is an activist and works with Pratichi]

At last, after 32 years, history repeated itself in West Bengal. It’s the history of routing of a prolonged political hegemony established by the CPIM led Left Front that replaced in 1977 another prolonged reign of the Congress.  The Left Front is now reduced to 15 seats from its 2004 tally of 35. The Trinamool Congress led by Mamata Banerjee, who severed her ties with the NDA to form an alliance with the Congress has swept through the elections to multiply her parties tally by 19 – she was the sole representative of her party in 2004. She made two alliances – one with the Congress that has managed to restore its position by winning six seats, and the other with SUCI, which too has won the seat allotted to it. The BJP has also secured a seat mainly through its bargain with the Gorkha Janmukti Parishad that has been fighting for a separate state of Gorkhaland. In other words, the opposition parties have now secured 27 out of 42 seats – more than two third – in the state.

Not that the change was fully unanticipated. There have been indications in the pre-poll surveys and other discourses that the Left Front was going to loose – but only to some extent (18-19 seats). None, including the opposition parties, did expect such a result. This writer too estimated the opposition seats to be 23-24, and could not imagine that the phrase – era jak (let they be dumped) – could have so routing effect on the ruling front.. Indeed, it’s the people who build up their own phrases, and this time it was “era jak”.
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साधारण की उदात्तता यानि जनादेश 2009

2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कुछ लोगों को हतप्रभ किया है और अनेक को चमत्कृत. इस जनादेश की व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि भारत की जनता ने विकास को तरजीह दी है और इस बडी मंदी के दौर में अपेक्षाकृत सुरक्षित चुनाव किया है. हमारे एक मित्र का कहना है कि इस असुरक्षा के समय में जनता जो हाथ में है , उसे ही संजोए रखना चाहती थी. भारतीय जनता पार्टी और तथाकथित तीसरे मोर्चे के ऊपर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनने के पीछे बिजली-पानी –सडक और जान-माल की हिफाजत की रोज़मर्रा की चिंताएं ज़रूर रही होंगी, लेकिन क्या यह इतना ही था? साधारण जनता क्या सिर्फ मामूली सवालों में ही उलझी रहती है और कभी अपने रोज़मर्रेपन से ऊपर नहीं उठती? बार-बार उसे इसी हद में बांधकर देखने की कोशिश की जाती हैहालांकि उसने कई बार यह बतलाया है कि उसके मुद्दे सिर्फ वही नहीं हैं जो व्याख्याकार बताते रहे हैं. साधारण जनता की उदात्तता की आकांक्षा आखिर किस रूप में व्यक्त होती है?

भारत में मोहनदास करमचंद गांधी ने शायद सबसे पहले साधारण के भीतर छिपी इस उदात्तता को ठीक-ठीक पहचाना था और उसका आदर किया था. क्रांतिकारियों या फिर कम्युनिस्ट विचार रखने वालों को साधारणता पर सन्देह ही था.
क्रांतिकारियों ने इसीलिए चुने हुए लोगों के दस्ते बनाए और कम्युनिस्ट खुद को जनता के एक अगुआ दस्ते के रूप में पेश करते रहे. शास्त्रकारों या सिद्धांतकारों को भी साधारणता को समझने में काफी दिक्कत होती रही है. इसलिए उनकी दिलचस्पी उन कोटियों के निर्माण में रहती है जो आसानी से सामूहिक आचरण की व्याख्या करने में सहायक हों. पिछले बीस वर्षों में भारतीय जनता के सारे निर्णयों को पहचान की कोटि के आधार पर समझने की कोशिश की गई है. यहां यह नहीं कहा जा रहा कि यह कोटि या इस तरह की सैद्धांतिक कोटियां बिलकुल अप्रासंगिक हैं, सिर्फ यही कहने की कोशिश की जा रही है कि इस प्रकार की किसी एक कोटि में किसी समूह को शेष कर देने से हम उसके भीतर छिपी सारी सम्भावनाओं को नज़रअंदाज़ देते हैं.
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जारी है ‘जनपक्षीय हिंसा’ का तान्डव

खबर मिली है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी हमले में ग्यारह से ज़्यादा पुलिस के जवान मारे गए हैं. इस महीने ऐसी हत्याओं की संख्या पचास से अधिक हो गयी है. इसके साथ ही बंगाल के चुनाव में हिंसा के समाचार किसी भी दूसरे राज्य से अधिक मिले हैं. बंगाल की हिंसा में  संसदीय राजनीति में भाग लेने वाले एक मार्क्सवादी दल के सदस्य शामिल हैं.संसदीय राजनीति को  भटकाव बताने वाले और उसे रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करने वाले, दोनों तरह के मार्क्सवादी या माओवादी दलों को हिंसा के अपने इस्तेमाल के जायज़ होने में कोई  शक नहीं है.दोहराव का खतरा उठाते हुए नंदीग्राम और सिंगुर में सीपीएम की हिंसा के पक्ष में उसके बुद्धिजीवियों के तर्कों को याद कर लेना  उचित होगा.इन तर्कों में एक तर्क रक्षात्मक हिंसा का था. इस बार चुनाव में अपने पक्ष में न होने के लिए सीपीएम ने नंदीग्राम में हत्याएं कीं और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सीपीएम के समर्थकों को  मारा.बंगाल के पिछले एक साल के अखबार को उठा कर देख लें, हिंसा उस समाज के स्वभाव को परिभाषित करती जान पड़ती है.
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‘Our’ Violence Versus ‘Their’ Violence

The first three phases of the 200 Lok Sabha elections have passed off peacefully. When we say peacefully, we do not take into account the killings of poll officials and police personnel involved in election related work by the Maoists. The Maoists gave a poll boycott call in areas where they thought they are strong but were not heeded by the people. Even many tribals of Lalgadh in Bengal decided to risk their lives to exercise their hard earned right to vote defying the Maoist boycott call. Unable to convince the masses, the Maoists have resorted to the old strategy of ambushing poll parties and burning and demolishing of public properties to register their presence. Jharkhand, Chhattisgarh, Orissa, Maharashtra, Bihar and Bengal have been witness to violence by armed groups of Maoists. Interestingly, we have not seen any statement by them owning up to these acts. Continue reading ‘Our’ Violence Versus ‘Their’ Violence

हिंसा की राजनीति के पैरोकार

२००९ के लोकसभा  चुनाव की अगर इसके पहले दो चरणों के आधार पर कोई खासियत बतानी हो तो कहना पडेगा कि समाज के पारम्परिक शक्ति संतुलन में विचलन के भय से तथाकथित ऊंची जातियों के द्वारा पहले  जो हिंसा होती थी, वह नहीं दिखी. बिहार और अन्य स्थानों पर चुनाव के वक्त बूथ पर होनेवाला खूनखराबा इस बार नहीं हुआ. फिर भी इस बार हत्याएं हुईं. और ये हत्याएं हिंसक वर्ग-युद्ध में विश्वास रखनेवाले माओवादी समूहों ने कीं. बिहार, झारखंड, ओडीसा, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र में इन समूहों के द्वारा हत्याएं की गईं, सार्वजनिक स्थलों को जलाया गया और दहशत फैलाई गई. पूरी ट्रेन का अपहरण कर लिया गया और अपना शक्ति प्रदर्शन करके फिर उसे छोड़ दिया गया. इस बीच उसके यात्रियों को जो भयंकर मानसिक यंत्रणा हुई होगी उसके लिए माओवादियों के पास कोई सहानुभूति का शब्द नहीं है. बंगाल में   सी.पी.एम. ने अपने हिंसक अहंकार में सिंगुर और नांदीग्राम और  उनके बाद लालगढ में जो कुछ किया उसने माओवादी समूहों को बंगाल में अपनी पकड मजबूत करने का मौका दिया. अब ये खबरें आम हैं कि बंगाल के गांवों और कस्बों में लोगों को सी.पी.एम. की सदस्यता छोड्ने को मजबूर किया जा रहा है और बात न मानने पर उनकी हत्या तक की जा रही है. ऐसी ही हत्याएं पिछले  साल बिहार  और झारखण्ड में की गयी थी. क्योकि माओवादी मारे गए लोगों  को ‘गलत पार्टियों’ में रहने नहीं देना चाहते थे. बंगाल में सी.पी.एम. की हिंसा का विरोध करनेवालों को शायद सी.पी. एम. के कार्यकर्ताओं की हत्या में  एक प्रकार का प्राकृतिक न्याय होता दीख रहा हो, वरना क्या वजह है कि अब तक इन हत्याओं की और दल छोडने को बाध्य करने की इस तरह की घटनाओं की कहीं से कोई भर्त्सना नहीं सुनाई पडी है !

“हिंसा को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता ,चाहे  उसका औचित्य कुछ भी क्यों न दिया जाए.” पिछ्ले दो साल से माओवादियों को मदद पहुंचाने के आरोप में जेल में बंद बिनायक सेन ने हाल में एक पत्रकार को यह कहा जब उसने माओवादी हिंसा के बारे में उनसे सवाल किया. बिनायक जब यह बातचीत कर रहे थे, उनके चेहरे पर वह दाढी नहीं थी  जिसने उन्हें एक रूमानी शक्ल दे रखी थी. दाढीविहीन  होकर भी बिनायक उतने ही आकर्षक लग रहे  थे, हालांकि उसके होने से जो एक रहस्य की आभा उनके इर्द-गिर्द थी, वह नहीं रह गयी थी.
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ग़ाज़ा, इस्राइल और इस्राइल बनने की मंशा

प्रणव मुखर्जी से किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या भारत पाकिस्तान में वैसी ही कार्रवाई करेगा जैसी इस्राइल गाज़ा में कर रहा है. शुक्र है कि हमारे विदेश मंत्री ने  यह कहना ज़रूरी समझा कि इस्राइल की तरह भारत ने किसी और की ज़मीन पर कब्जा नहीं कर रखा है. इस सादे से तथ्य को कहना आजकल गनीमत है क्योंकि हमारे आदर्श बनते जा रहे अमरीका में फिलीस्तीनीयों को ही इस रूप में पेश किया जा रहा है मानो वे ही शांति से रहने वाले इस्राइलियों को चैन से नहीं रहने दे रहे. तो क्या यह मान लिया जाय कि हमारी याददाश्त भी ‘गजनी’ की तरह सिर्फ पंद्रह मिनट की रह गई है? क्या हम यह भूल गए है कि गाज़ा के उस पतली सी पट्टी में जो पिछले साठ  साल से पीसे जा रहे हैं वे एक ज़िओनवादी राज्य इस्राइल की स्थापना के लिए उनकी अपनी ज़मीन से उखाड कर फेंक दिए गए लोग हैं?

ग़ाज़ा पर इस्राइली बामबारी, सा�ार बीबीसी
ग़ाज़ा पर इस्राइली बामबारी, साभार बीबीसी

अगर हम साठ साल की बात को याद नहीं रखना चाह्ते तो क्या हम यह भी भूल गए हैं कि  अभी दो ही साल बीते हैं कि फिलीस्तीन की जनता ने हमास को चुनाव में बहुमत दिया था! क्या हमें यह भी याद दिलाना होगा कि हमास की चुनावी जीत को इस्राइल, अमरीका , युरोप और उनके पिट्ठू फतह ने मान्यता देने से इंकार कर दिया था?

एपी
बमबारी का एक और नज़ारा, तस्वीर: एपी

हमास एक आतंकवादी संगठन नहीं है, जैसा अमरीका और इस्राइल चाह्ते हैं कि उसे माना जाए, वह फिलीस्तीनी जनता का वैध प्रतिनिधि है. क्या चुनाव में उसकी जीत को मानने से इनकार  वैसा ही नहीं जैसा मुजीबुर्रहमान की जीत को मानने से तब की पकिस्तानी हुकूमत का इंकार ? उसका नतीजा था  पाकिस्तान का  विभाजन और बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का जन्म. यहां अंतर सिर्फ यह है कि हमास ने गाज़ा पट्टी पर संघर्ष के बाद नियंत्रण कर लिया. तब से इस्राइल के कहने पर अमरीका समेत पूरे विश्व ने हमास का बहिष्कार कर रखा है. क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि भारत में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव में जीतने के बाद उसकी राजनीति से असहमति रखने के कारण उसे मान्यता न दी जाए?

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Textbooks and Intolerance, Communal and Secular

Once again, religious sentiments have been hurt. This time in the God’s own Country, Kerala . And the culprit is a small portion of a lesson from the social science textbook for class vii, part i. It has been alleged by groups claiming to represent Muslims and Christians that this particular lesson preaches atheism. It sticks because the government which is getting the textbooks published is led by Marxists and there is a perception that Marxists have a pathological hatred for religion. Kerala has been witness to a bitter controversy on the faith only recently in which the church and the CPM were at loggerheads. So, there is a background to the new battle over a small lesson in a class seven textbook. But first let us try to look at the facts.

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Textbooks Yet Again

The current agitation in Kerala demanding withdrawal of the class vii social science textbook has turned murderous. James Augustine, 45, a headmaster of a primary school was killed in an attack by the Indian Union Muslim League youth activists on a training program. And this was done even after the announcement by the Kerala government that it had decided to remove the controversial portion of the textbook. Will this utterly meaningless death of the teacher at their hands stop the agitators in their track? Will we allow warriors of different shades of identity politics a free run? Or, will the sacrifice of a life turn into an occasion for all of us to once again ponder over issues related not only to the politics of textbooks but also the principles on which textbooks in a diverse country like India should be prepared?

It is very easy to see that the allegation on this particular book that it promotes atheism cannot be substantiated as the text in question closes with the response of the parents of Jeevan, who belong to different religious identities that he would be free to choose his religion when he grows up. It only shows that they are very relaxed about his identity and are ready to give him freedom to decide on his identity. Surely the agitating groups are neither sure nor relaxed about their relationship with the members of their denominations. Do they fear that texts like the one dealing with the religious identity of Jeevan can give ideas to children about their right to take decisions in the matters of marriage and identity? Even if we leave this aside, the charge leveled by the opposition that the book is substandard deserves a reasoned discussion. It needs to take into account the role textbooks are expected to play in a country like India, the process of textbook writing, the implication of the federal character of India for school education in general and textbook writing in particular.

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Each day Binayak Sen spends in jail is one day less for democracy in India

ON DECEMBER 10 this year, the day internationally observed as Human Rights Day, the Supreme Court of India denied bail to the veteran rights activist, Dr Binayak Sen, incarcerated since May in Raipur jail under the Chhattisgarh Public Security Act and the Unlawful Activities Prevention Act. For those present, the 45-minute-long hearing was a horrible experience. We heard the prosecution claim that Dr Sen was part of the dreaded Maoist formation, and that giving him his freedom would mean setting him loose to spread subversion against the State. We saw, to our shock, how no verification was made of the prosecution’s claims, even as the government lawyer presented his summary of the contents of Dr Sen’s computer in the vilest terms, telling the court it contained letters describing how Dr Sen had helped organise an arms training camp at Nagpur. Defence counsel Rajeev Dhawan pointed out that the prosecution was distorting the letter’s contents, that Dr Sen had been in Nagpur in the course of a fact-finding mission into last year’s lynching of a Dalit family at Kherlanji and that he had nothing to do with any underground training. But the court felt that Dhawan’s arguments were matters to be looked into by the trial court, and it was satisfied that there was enough reason to deny Dr Sen bail.

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