(यह ब्योरा पिछले शनिवार को दिल्ली के हरियाणा भवन के सामने अटाली की मुस्लिम विरोधी हिंसा पर रोष जाहिर करने को किए गए प्रदर्शन के बाद लिखा गया था.तब से अब तक स्थिति में काफी बदलाव आया है.कल ही खबर आ गई थी कि मुसलमान गाँव लौट गए हैं.शर्तें अभी बहुत साफ़ नहीं हैं.कहा जा रहा है कि हमलावरों पर कार्रवाई भी होगी और मस्जिद भी बनेगी. एक खबर यह है कि मुसलमानों को आश्वस्त किया गया है कि मस्जिद की चहारदीवारी प्रशासन बनवाएगा.यह भी कि हालात बेहतर होने पर दोषियों को पकड़ा जाएगा.गाँव में हिंदुओं का एक तबका है जो इस हिंसा से दुखी और शर्मिंदा है.लेकिन नौजवानों को लेकर आशंका है.फिर भी यह मुज़फ्फरनगर से ‘बेहतर’ तो है ही.
सवाल कुछ हैं:
- क्या जांच की जाएगी कि यह हिंसा कैसे हुई?क्या यह स्वतःस्फूर्त थी या इसके पीछे एक तैयारी थी?
- क्या हरियाणा में,और जगहों की तरह ही, मुसलमानों के अत्यंत अल्पमत में होने के बावजूद मुस्लिम-विरोधी वातावरण का निर्माण किया जा रहा है?
- अटाली में जो मुसलमान लौटे हैं, उनके नुकसान की भरपाई का पैमाना क्या होगा?
- हमलावरों पर कार्रवाई होगी या लौटने दिए जाने और फिर गाँव में शांति से रहने के एवज़ में मुसलमानों को शिकायतें वापस लेनी होंगी या कमजोर करनी होंगी?
- क्या आस-पास के विश्वविद्यालय, राजनीतिक और सामाजिक संगठन मुसलमानों के लौटने की इस प्रक्रिया के बाद समाज में इस विषय पर विवेकपूर्ण संवाद की कोई पहल करेंगे?)
हम हरियाणा भवन के सामने हैं. एक ‘वाटर कैनन’ सामने खड़ी है.दिल्ली पुलिस के जवान लाठियों के साथ तैनात.महिला-पुलिस भी.मई की बेरहम धूप है जो जलती चादर की तरह हमें लपेटे हुए है.सामने किसी पुराने कार्यक्रम के फ्लेक्स-बैनर की दरी बना दी गई है.उस पर पचीस-तीस औरतें-मर्द सिकुड़कर एक दूसरे से सटे हुए बैठे हैं.एक छोटा बच्चा गोद में.ऐसे मौकों पर दीखनेवाले दिल्ली के पुराने पहचाने चेहरे.शबनम हाशमी देख रही हैं कि पानी का इंतजाम ठीक है कि नहीं.नासिरुद्दीन पीछे बैनर सीधा करवा रहे हैं.प्रेस-फोटोग्राफर जमा हो रहे हैं.दरी पर इकठ्ठा लोग धूप से बचने को चेहरा लपेट रहे हैं. एक ने कहा, “शुक्र है, नीम की छाँव है.” फिर सर उठाया, वृक्ष जैसे उसकी नाजानकारी पर सर हिला रहा था. “नहीं, नहीं, नीम नहीं है. कौन-सा पेड़ है?” कोई दिल्लीवाला बता नहीं पाता.सालों-साल छाया देने के बाद भी उसे न पहचानने पर पेड़ छाया समेट नहीं लेता. उदासीन इंसानों की इस जमात पर रहम का साया बनाए रखता है. फिर पेड़ से मुँह मोड़ हम घड़ी देखने लगते हैं. वृक्ष से अपरिचय से मनुष्यता की योग्यता में कमी तो नहीं आती, इसका आश्वासन हमें है. Continue reading अटाली और हम