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सी पी एम के भीतर जनतांत्रिक विरोध के अधिकार का प्रश्न – जगमती सांगवान के बहाने

सी पी एम या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पिछले दिनों अपनी एक सदस्य की वजह से खबर में रही. अनुशासनहीनता के कारण जगमती सांगवान को पार्टी से निकालने का निर्णय किया गया,ऐसी सूचना उसके वक्तव्य में दी गई है. जगमती पार्टी की केन्द्रीय समिति की सदस्य थीं.

जगमती सांगवान को पार्टी से निकाला बाद में गया, केन्द्रीय समिति की बैठक के दौरान ही पहले वे बाहर निकल आई थीं और प्रेसवालों के सामने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया था.लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी में ही नहीं,किसी भी पार्टी में शायद ही किसी सदस्य को खुद पार्टी से अलग होने का गौरव लेने दिया जाता रहा हो! यह फैसला पार्टी ही कर सकती है कि सदस्य का रिश्ता पार्टी से कैसा और कितना लंबा होगा.इसलिए कम से कम इस आधार पर सी पी एम की आलोचना करने के पहले पार्टियों के तंत्र की आलोचना करने की आवश्यकता होगी. Continue reading सी पी एम के भीतर जनतांत्रिक विरोध के अधिकार का प्रश्न – जगमती सांगवान के बहाने

जीत की राजनीति की जीत

आम आदमी पार्टी में  जो कुछ भी हुआ उससे वे ही हैरान हैं जो पार्टियों की अंदरूनी ज़िंदगी के बारे में कभी विचार नहीं करते. किसी भी पार्टी में कभी भी नेतृत्व के प्रस्ताव से अलग दूसरा प्रस्ताव शायद ही कबूल  होता हो .कम्युनिस्ट पार्टियों पर नेतृत्व की तानाशाही का आरोप लगता रहा है लेकिन कांग्रेस हो या कोई भी और पार्टी, नेतृत्व के खिलाफ खड़े होने की कीमत उस दल के सदस्यों को पता है. ऐसे अवसर दुर्लभ हैं जब नेतृत्व की इच्छा से स्वतंत्र या उसके विरुद्ध कोई प्रस्ताव स्वीकार किया गया हो. जब ऐसा होता है तो नेतृत्व के बदलने की शुरुआत हो जाती है.

भारत में पार्टियों के आतंरिक जीवन का अध्ययन नहीं के बराबर हुआ है.ऐसा क्यों नहीं होता  कि निर्णयकारी समितियों के सदस्य खुलकर, आज़ादी और हिम्मत के साथ अपनी बात कह सकें? यह अनुभव उन सबका है जो पार्टियों में भिन्न मत रखते ही ‘डिसिडेंट’ घोषित कर दिए जाते हैं.यह भी समिति की बैठक के दौरान जो उनके खिलाफ वोट दे चुके हैं वे अक्सर बाहर आकर कहते हैं कि आप तो ठीक ही कह रहे थे लेकिन हम क्या करते!  हमारी मजबूरी तो आप समझते ही हैं ! Continue reading जीत की राजनीति की जीत

AAP’s Divide & Rule: Satya Sagar

Guest post by Satya Sagar

While the Indian media goes ballistic over the possibility of a split in the Aam Aadmi Party and ardent supporters stand demoralised, for me this is probably the best news I have heard since the party’s historic win in the recent Delhi assembly elections. I love anything with ‘splittist tendencies’.

The reason is simple. For anyone even vaguely familiar with the nature of living systems, particularly microbial life (and this is a bacterial planet we live on) one of its fundamental characteristics is ‘divide and rule’. Let me explain in more detail, before Markandeya Katju accuses me of being a ‘British agent’.

Basically, anything that possesses life, propagates and spreads its influence only through the process of splitting itself repeatedly till it finds its true balance within the larger ecosystem. All of evolution is possible only because of the constant churning, that results in repeated mutation of basic genetic structures, from which the most durable and relevant ones survive.

Lifeless, inanimate objects on the other hand, by definition, do not possess any internal contradictions and can move around only when pushed by external forces. In political terms it is simple to understand this point – when was the last time the Congress, BJP or for that matter CPI or CPM split anywhere?  If there is no opinion at all, there can’t be a ‘difference of opinion’ too. Continue reading AAP’s Divide & Rule: Satya Sagar

क्या निराश हुआ जाए?

क्या निराश हुआ जाए? कल सुबह से हजारी प्रसाद द्विवेदी  का एक अन्य  प्रसंग में किया गया यह प्रश्न मन में घूम रहा है. चुनाव नतीजों के पहले ही चरण में पिता ने फोन पर कहा: “यह तुम्हारा पहला कड़ा इम्तहान है.”पिता ने, जो अब जीवन की सांध्य वेला में हैं, कहा, “हम तो किनारे पर खड़े लोग हैं, तुम सब अभी इस जिंदगी के रेले के ठीक बीचो-बीच हो, भागने का न तो कोई उपाय है और ऐसी कोई भी इच्छा कायरता होगी. इसका सामना करो और इसे समझो.” हजारीप्रसाद जी और अपने पिता को कहना चाहता हूँ, वह जो रवींद्रीय ब्रह्मांडीय उदारहृदयता का स्वप्न आप सबने दिखाया था, कामकाजी रोजमर्रापन की तेज रौशनी में खो गया जान पड़ता है. शायद हम सब अब तक सो रहे थे,अचानक जगा दिए गए हैं. निराश या हताश होने की सुविधा नहीं है. समझने की कोशिश ही शायद इस यथार्थ का सामना करने के साधन देगी! Continue reading क्या निराश हुआ जाए?

Elections, Propaganda and Education

The Aam Aadmi Party was reluctant to include the issue of the rights of the LGBT people in its Delhi manifesto due to strategic reasons. Explaining the absence, the party officials said that conservative voters might turn away from the party if they find it supporting the LGBT cause. The LGBTs also seem to ‘understand’ the constraints of the poor party. The election meetings could have served as a wonderful platform had the party decided to talk to the people about this issue, telling them why it is important for us to ensure liberty to individuals to decide about their bodies. It would have been an educational exercise. Given the fact that people are ready to listen to this new party and its ideas, this reluctance on its part to take up this role says a lot not only about it, but also about the health of our polity.

The AAP candidate challenging Rahul Gandhi is harping on the bad condition of the roads of Amethi and lack of electricity there. One wonders whether Rahul Gandhi, in his response, would have the courage of a now-forgotten former Congressman. Abdul Ghafoor, once Chief Minister of Bihar, was campaigning in Siwan in a Parliamentary election. At a meeting, voters started complaining about the bad condition of roads and sanitation. He told them bluntly that he was there to seek their approval for his candidature for the membership of the Parliament and they should not waste their votes on him if they expected him to fix these problems. The problems they cited were something a municipal councilor was supposed to look after. It is a different story that he lost the election. Continue reading Elections, Propaganda and Education

सतत क्रान्ति की पैरोडी

पिछले कुछ समय से नागार्जुन और हरिशंकर परसाई की याद बेइंतहा सता रही है: भारतीय राजनीति के इस दौर का वर्णन करने के लिए हमें उनकी कलम की ज़रूरत थी !

क्रान्ति सतत चलने वाली प्रक्रिया है और असली विद्रोही वह है जो छह महीने बाद अपनी कुर्सी खुद उलट दे. आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के मुखिया ने केंद्र सरकार के खिलाफ़ बगावत की शुरुआत की,तो ऐसा ही लगा. दिल्ली के केंद्र में रेल भवन के पास दिल्ली की पूरी सरकार  अपने समर्थकों के साथ दस दिनों के धरने पर बैठ गए. उन्होंने धमकी दी कि वे राजपथ को लाखों लोगों से पाट देंगे और केंद्र सरकार की नींद हराम कर देंगे.किसान और सैनिक जब मिल जाएं तो क्रांति शुरू हो जाती है. इसकी पैरोडी करते हुए अरविंद ने दिल्ली के पुलिसवालों को वर्दी उतार कर धरने पर शामिल होने का आह्वान किया. कुछ लोगों को जयप्रकाश नारायण की याद आ गई. एक साथ लेनिन, लोहिया,क्रोपाटकिन और जयप्रकाश का तेज अरविंद केजरीवाल के रूप में पुंजीभूत हुआ. गांधी का आभा वलय अन्ना हजारे से हट कर अरविंद के माथे के पीछे पीछे तो तब ही लग गया था जब उनका भरपूर इस्तेमाल कर ठिकाने लगा दिया गया. क्या यह 2014 का भारतीय तहरीर चौक होने जा रहा है?

दिल्ली के मुख्य मंत्री ने एक बार फिर  आज़ादी की  नई लड़ाई की घोषणा की.यह दृश्य क्रांतिकारियों,समाजवादियों,अराजकतावादियों, सबके के लिए एक पुराने सपने के  पूरा होने जैसा ही था. एक पुरानी, दबी हुई इच्छा के पूरा होने का क्षण!यह आज़ादी झूठी है वाले नारे , वंदे मातरम और भारत माता का जयकार से रोमांचित होने का सुख!! Continue reading सतत क्रान्ति की पैरोडी

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था! हाँ! हमें 2002 की गर्मियां ज़रूर याद हैं, मस्जिदों में चल रही पनाहगाह की याद है, याद हैं गम से खामोश और समझदार आँखें जो हमें देख रही थीं जो उनका दुःख बँटाने आए थे वहाँ, कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ वक्त गुजारने, फिर जो अपने घरों को लौट जाने को थे क्योंकि हमारे घर थे जहां हम लौट सकते थे, घर जो आपका इंतज़ार जितना करता है उससे कहीं ज़्यादा दिन-हफ्ते उससे बाहर गुजारते हुए आप उसका करते हैं. वे आँखें जानती थीं कि हमारे घर हैं लौटने को और उनके नहीं हैं. वे अशफाक, सायरा, शकीला होने की वजह से बार-बार घर खोजने को नए, सिरे से उन्हें बसाने को मजबूर हैं, कि उनको  और उनकी आगे की पीढ़ियों को इसका इत्मीनान दिलाने में यह धर्मनिरपेक्ष भारत,यह हिन्दुस्तान लाचार है. जिसकी हस्ती कभी नहीं मिटती, उस हिन्दुस्तान को बनाने वालों में कई को ज़रूर एक ज़िंदगी में कई जिंदगियां गढ़नी पड़ती हैं. एक घर के बाद कई घर बसाने पड़ते हैं. Continue reading ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद