मुक्तिबोध शृंखला:16
‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न से होता है कि वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो हमें आपको पालतू भालू बन्दर बनाकर नचाती रहती है। किसके हाथ हमारे गले के पट्टे की चेन है। हमारे ‘मैं’ की हत्या किस तरह कर दी जाती है। किस तरह हमें गुलामी बर्दाश्त करना सिखलाया जाता है। हम खुद इस दासता को न सिर्फ सहते हैं बल्कि दूसरों को उसमें दीक्षित करना अपना कर्तव्य मानने लगते हैं। जो अनुकूलित होने से इनकार करे, हमें अपना शत्रु नज़र आने लगता है और हम उसकी हत्या होते देखते ही नहीं, कई बार खुद उसकी हत्या को तैयार हो जाते हैं। चलते फिरते शिरविहीन कबंधों का यह संसार कितना उदास और कितना भयावह है। चारों ओर जाने कितने हताहत व्यक्तित्व हैं। कितने सत्यों की भ्रूण हत्या कर दी गई है।
मुक्तिबोध की शिकायत इस ज़माने से इसी वजह से है। प्रकृति ने मनुष्य के रूप में जिस संभावना को गढ़ा, मानव के रूप में जो स्वप्न देखा उसका ऐसा अनादर कैसे सहन किया जा सकता है? उनकी कविता “आ-आकर कोमल समीर!” में यह दुख इस प्रकार प्रकट होता है:
“नित देख-देख उद्ध्वस्त शिखर जीवन के, जन के
मैं आहत हो गया,
प्राण का श्वास रुक गया।”
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