मुक्तिबोध शृंखला:2
“मैं कुछ शिकायत करना चाहता था इस दुनिया के खिलाफ लेकिन मैं रुक गया, सोचते हुए कि आखिर मैं अपने को दुनिया से अलग क्यों मान लूँ. दुनिया का खाकर, दुनिया का पीकर, दुनिया के मनुष्य से प्रेम कर, उससे अलग समझना अपने स्व को ज़रूरत से अधिक ऊँचा रखना है—दुनिया ने हमको बनाया, अब हमीं दुनिया को बनाएँगे.”
‘आधुनिक समाज का धर्म’ नामक टिप्पणी की शुरुआत यों होती है. यह आत्मविश्वास कि हम इस दुनिया को बना सकते हैं इस विनम्रता से संयमित किया जाता है कि उसके साथ ही खुद को बनाने की जिम्मेवारी भी है. उसके साथ पहली शर्त इस ज़िंदगी से मोहब्बत. ‘नौजवान का रास्ता’ के आरम्भिक अंश की पंक्तियाँ हैं,
“ज़िंदगी बड़ी खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं. अच्छे आदमी क्यों दुःख भोगें—इतने नेक और इतने अभागे. दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब ज़िंदगी बहुत खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं.”
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