Tag Archives: सत्यशोधक समाज

सत्य के अन्वेषी और ‘अंधेरे की आदत’ वाला समाज

…… ‘समाजवादियों ने हिन्दू राष्ट्र को किस तरह मुमकिन बनाया ?’

..समाजवादी धारा की यह परिणति भारत की वाम शक्तियों के सामने भी कुछ सवाल निश्चित ही खड़े करती है।

अगर 60 के दशक में समाजवादी धारा के अग्रणी कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए ‘शैतान के साथ भी हाथ मिलाने को तैयार होने’ की बात रख रहे थे, पहले उपचुनावों में और बाद में राज्य विधानसभा के चुनावों में भारतीय जनसंघ के साथ मंच साझा कर रहे थे, गठबंधन कायम कर रहे थे, उन उथल पुथल के दिनों में वाम की शक्तियों का क्या रूख था ?

क्या उन्होंने गैर कांग्रेसवाद के नाम पर संघ-भारतीय जनसंघ को वैधता दिलाने वाली सियासत का उसूली आधार पर विरोध किया या नहीं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अस्पष्टता के चलते या urgency के भाव के चलते मौन ही रहे ,  उसी ‘सिद्धांत’ से हमकदम चलते रहे ?

क्या हमारे लिए यह आत्मपरीक्षण का विषय होना नहीं चाहिए कि आपातकाल के बाद जिन जयप्रकाश नारायण को दूसरा महात्मा कहा गया था, यहां तक कि आपातकालविरोधी संघर्ष को ‘दूसरी आज़ादी’ के नाम से महिमामंडित किया गया था, जिसने एक तरह से पहली दफा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वैधता दिलायी, नयी  स्वीकृति प्रदान की और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी स्थान दिलवाया, उस जयप्रकाश नारायण को लेकर कम्युनिस्टों का रूख क्यों बहुत अस्पष्ट रहा ?

किसी परिघटना को समझने में हमारी भूल हो सकती है, किसी व्यक्ति-संगठन की असलियत जानने में हम गड़बड़ी कर सकते हैं, लेकिन यह बात समझ से परे है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके पीछे की फासीवादी प्रेरणाएं या स्वाधीनतापूर्व आन्दोलन तथा स्वाधीनता के बाद के आंदोलनों में उनकी निरंतर विवादास्पद भूमिका पर विस्तार से तथ्य पेश किए जाते रहने के बावजूद बाद के दिनों में क्या फौरी राजनीतिक लाभ के नाम पर उसके आनुषंगिक संगठनों के साथ जुड़ने से परहेज करने में प्रगतिशील ताकतें, वाम की शक्तियां सचेत रह पायीं ?.. ( Read the full text here : https://nayapath.in/seekers-of-truth-by-subhash-gatade/)

हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

( अकार, 51 – हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित)

‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये ! ..दार्शनिक आए ! फिर भी   अस्पृश्यता  , विषमता अमर है ! ..यह सब कैसे हो गया ? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आंखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ? ..बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदनशून्यता दुनिया भर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी ! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, सन्तों और राज करनेवालों को मंजूर थी ! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।

– बाबुराव बागुल /17 जनवरी 1930 –  26 मार्च 2008/

जानेमाने मराठी लेखक

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वर्ष 2014 में हिन्दी की प्रथम दलित कविता कही जानेवालीे एक कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1 के सौ साल पूरे हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सितम्बर माह में प्रकाशित अंक में यह कविता छपी थी।

हीरा डोम द्वारा रचित इस कविता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किस तरह यह कविता साहित्य में नयी जमीन तोड़ती है, धर्म, पूंजीवाद, सामाजिक गैरबराबरियों को वैधता प्रदान करती मौजूदा व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है, ढेर सारी बातें लिखी गयी हैं। फिलवक्त़ न मैं इसकी तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूं, न इस बहस की तरफ कि क्या उसे प्रथम दलित कविता कहा जा सकता है या नहीं ! साहित्य के सुधी पाठक एवं प्रबुद्ध आलोचक इसके बारे में मुकम्मल राय दे सकते हैं। /इतनाही याद रखना जरूरी है कि पत्रिका में छपनेवाली रचनाओं के बारे में संपादक के तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी काफी सख्त माने जाते थे। उनकी इस सख्ती का अन्दाज़ा इस बात से लगता है कि निराला – जो बाद में महाकवि के तौर पर सम्बोधित किए गए – उनकी चन्द कविताएं भी शुरूआत में उन्होंने लौटा दी थीं। लाजिम है कि हीरा डोम की इस कविता को प्रकाशित करने में भी उन्होंने अपने पैमानों को निश्चित ही ढीला नहीं किया होगा।/

कल्पना की जाए कि सरस्वती के अंक में अगर उपरोक्त कविता छपी नहीं होती तो हीरा डोम नामक वह शख्स ताउम्र लगभग गुमनामी में ही रहते। कोई नहीं जान पाता कि उत्पीड़ित समुदाय में एक ऐसे कवि ने जन्म लिया है, जिसकी रचनाओं में जमाने का दर्द टपकता है। Continue reading हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

महाड़ सत्याग्रह के नब्बे साल

‘‘जब पानी में आग लगी थी’’
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प्रस्तावना
‘क्या पानी में आग लग सकती है ?’’
किसी भी संतुलित मस्तिष्क व्यक्ति के लिए यह सवाल विचित्र मालूम पड़ सकता है। अलबत्ता सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों पर निगाह रखनेवाला व्यक्ति बता सकता है कि जब लोग सदियों से जकड़ी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ कर आगे बढ़ते हैं तो न केवल /बकौल शायर/ ‘आसमां में भी सुराख हो सकता है’ बल्कि ‘ पानी में भी आग लग सकती है।’
2017 का यह वर्ष पश्चिमी भारत की सरजमीं पर हुए एक ऐसे ही मौके की नब्बेवी सालगिरह है, जब सार्वजनिक स्थानों से छूआछूत समाप्त करने को लेकर महाड नामक जगह पर सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के लिए डा अंबेडकर की अगुआई में हजारों की तादाद में लोग पहुंचे थे। /19-20 मार्च 2017/ कहने के लिए यह एक मामूली घटना थी, लेकिन जिस तरह नमक सत्याग्रह ने आज़ादी के आन्दोलन में एक नयी रवानी पैदा की थी, उसी तर्ज पर इस अनोखे सत्याग्रह ने देश के सामाजिक सांस्कृतिक पटल पर बग़ावत के नए सुरों को अभिव्यक्ति दी थी।

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