Kishore Jha is a development professional and is working in the field of children’s rights for the last two decades. This piece was originally published on the NSI blog.
सन २०११ में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन में उमड़े हजारों लोगों की तस्वीरें आज भी ज़ेहन में ताज़ा है। उन तस्वीरों को टी वी और अख़बारों में इतनी बार देखा था कि चाहें तो भी नहीं भुला सकते। लोग अपने-अपने घरों से निकल कर अन्ना के समर्थन में इक्कठे हो रहे थे और गली मोहल्लों में लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे। इंडिया गेट से अख़बारों और न्यूज़ चैनलों तक पहुँचते पहुँचते सैकडों समर्थकों की ये तादात हजारों और हजारों की संख्या लाखों में पहुँच जाती थी। तमाम समाचार पत्र इसे दूसरे स्वतंत्रता आन्दोलन की संज्ञा दे रहे थे और टी वी देखने वालों को लग रहा था कि हिंदुस्तान किसी बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है और जल्द ही सूरत बदलने वाली है। घरों में सोयी आवाम अचानक जाग गयी थी और राजनीति को अछूत समझने वाला मध्यम वर्ग राजनैतिक रणनीति का ताना बाना बुन रहा था। यहाँ मैं आंदोलन के राजनितिक चरित्र की बात नहीं कर रहा बल्कि ये याद करने की कोशिश कर रहा हूँ कि उस आंदोलन को उसके चरम तक पहुचाने वाला मीडिया अपने पड़ोस बांग्लादेश में उठ रहे जन सैलाब के जानिब इतना उदासीन क्यों है और कुछ ही महीने पहले बढ़ी आवाम की राजनैतिक चेतना आज कहाँ है? Continue reading बंगलादेशी जनउभार और भारत की मुर्दाशान्ति: किशोर झा






अपनी किताब‘ द जर्मन आइडिओलोजी’ (रचनाकाल 1845-46) मार्क्स एवं एंगेल्स इतिहास की अपने भौतिकवादी व्याख्या का निरूपण करते है। किताब की शुरूआत 19 वीं सदी के शुरूआत में जर्मनी के दार्शनिक जगत पर हावी हेगेल की आदर्शवादी परम्परा एवं उसके प्रस्तोताओं की तीखी आलोचना से होती है जिसमें यह दोनों युवा इन्कलाबी चेतना एवं अमूर्त विचारों पर फोकस करनेवाले और सामाजिक यथार्थ के उससे निःसृत होने की उनकी समझदारी पर जोरदार हमला बोलते हैं। इस ऐतिहासिक रचना से नामसादृश्य रखनेवाली पेरी एण्डरसन (थ्री एसेज़, 2012) की किताब ‘द इण्डियन आइडिओलोजी’ का फ़लक भले ही दर्शन नहीं है, मगर अपने वक्त़ के अग्रणी विचारकों द्वारा भारतीय राज्य एवं समाज की विवेचना की आलोचना के मामले में वह उतनी ही निर्मम दिखती है।
The village of Majure, in Chitradurga district, Karnataka, is once again in the news. It made the national headlines in 1998 when dalits in the village lodged a police complaint against members of the dominant Vokkaliga and Lingayat castes for an attack on their hamlet. As a consequence, several people were 
