Tag Archives: JNU student protests

रोहित वेमुला हम तुम्हारे दिखाए हुए रास्ते पर चल रहे हैं: अनन्त प्रकाश नारायण

अतिथि पोस्ट : अनन्त प्रकाश नारायण

12232699_240984726266767_438392505759428328_o

भूख हड़ताल का बारहवां दिन (12th Days) चल रहा है. प्रशासन कितना दवाब में है कुछ भी कहा नही जा सकता है. हाँ, अगल बगल के हालात देख कर, बात-चीत सुन कर इतना तो जरुर समझ में आ रहा है कि कुछ तो “अन्दर” जरुर चल रहा है. अध्यापक संघ हमारे साथ खड़ा है. उन्होंने हमारे समर्थन में एक दिन का भूख हड़ताल भी किया और अब क्रमिक भूख हड़ताल पर है. हमसे हमारे शुभचिंतको द्वारा बार बार आग्रह किया जा रहा है कि हम भूख हड़ताल को छोड़े. हम जब इस भूख हड़ताल पर बैठ रहे थे तो हमारे सामने की स्थिति ने हमे चेता दिया था कि ये करो या मरो की स्थिति है. इसलिए हमने नारा/स्लोगन भी दिया कि ये भूख हड़ताल हमारी मांगो तक या फिर हमारी मौत तक. हमारी मांग बिलकुल स्पष्ट है कि हम अलोकतांत्रिक, जातिवादी उच्चस्तरीय जांच कमिटी को नहीं मानते है. इसलिए इसके आधार पर हम कुछ छात्र-छात्राओ पर जो आरोप व दंड लगाये गए है उनको ख़ारिज किया जाये और प्रशासन बदले की भावना से इन छात्र-छात्राओ पर कार्यवाही करना बंद करे और जे.एन.यू. के एडमिशन पालिसी को लेकर कुछ मांगे है. सजा क्या है? कुछ का विश्वविद्यालय से निष्कासन, कुछ का हॉस्टल-निष्कासन और कुछ लोगों पर भारी जुर्माने की राशि और कुछ लोगों के उपर यह सब कुछ. अब जब हम आन्दोलन में है तो यह साफ़ साफ़ देख पा रहे है कि यही तो हुआ था हैदराबाद के साथियों के साथ. एक एक चीज हू-ब-हू बिलकुल इसी तरह. इसी तरह से हॉस्टल से निकल कर सड़क पर रहने के लिए विवश किया गया था. इसी तरह तो कोशिश की गई थी रोहित और उसके साथियों को देश और दुनिया के सामने एंटी-नेशनल के तमगे से नवाज देने की. नतीजा क्या हुआ सबके सामने है.

इस भूख हड़ताल के दौरान लोग हमसे मिलने आ रहे है. कुछ लोगों ने जुर्माने की राशि को जुटाने का प्रस्ताव दिया, तो कुछ लोगों ने खुद ही जुर्माने की राशि देने का प्रस्ताव दिया. हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं. लेकिन क्या यह लड़ाई कुछ दंण्ड/जुर्माने के खिलाफ लड़ाई है? नहीं, यह लड़ाई देश बचने की लड़ाई है. बहुत ही सरल शब्दों में कहा जाये तो इस लड़ाई से यह तय होगा कि इस सत्ता/सरकार के रहते इस देश में विरोध की आवाजो/dissents के लिए कोई जगह होगी की नहीं. जे.एन.यू का प्रोग्रेसिव स्टूडेंट मूवमेंट अपने क्रांतिकारी कलेवर के साथ अपनी पहचान लिए खड़ा रहता है. यह क्रांतिकारी स्टूडेंट मूवमेंट यह तय तो करता ही है कि इस कैंपस  को इतना समावेसित/इंक्लूसिव बना कर रखा जाये कि समाज के सबसे निचले तबके के लिए भी यह विश्वविद्यालय का गेट खुला रहे लेकिन साथ ही साथ इस छात्र-आन्दोलन ने अन्दर और बाहर के मुद्दे का भी भेद मिटा दिया और देश के सामने एक वैकल्पिक राजनीति का मॉडल ले करके सामने आया.

बीते दिनों इस स्टूडेंट-मूवमेंट के साथ साथ पूरे जे.एन.यू को निशाने पर लिया गया और इसे एक संस्थान के रूप में देश-विरोधी ठहरा देने का प्रयास हुआ. आखिर देश है क्या? आखिर हम देशभक्ति माने किसे? अभी कुछ दिनों पहले हम देश की विभिन्न जगहों पर कैम्पेन में थे. उन सभाओ व परिचर्चाओ के दौरान भी देशभक्ति चर्चा का एक गर्म विषय रहा. उन सवालों को करने वाले लोग ही कई बार इन सवालो का जवाब दे देते. वो भारत का नक्शा दिखा कर के और भारत की सीमाओं को दिखाते हुए बोलते इन सीमाओं के भीतर जो कुछ भी है देश है. इसका मतलब पेड़-पौधे, रेलगाड़ी, प्लेटफार्म, पहाड़, जंगल, कारखाने, यहाँ के लोग, खनिज-संपदा, नदियाँ, तालाब, इत्यादि सब कुछ देश है. इस दौरान मुझे अपवादिक रूप से भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने देश की इस परिभाषा से असहमति जताई. देश के लिए प्रतीक बने, संविधान बना, कानून बने और जैसे-जैसे यह देश बदलता जाता है, आगे बढ़ता जाता है, उसी के आधार पर प्रतीक से ले करके कानून तक सब चीज़ों में परिवर्तन होता जाता  है. देश के लिए प्रतीक होते हैं, प्रतीकों का कोई देश नहीं होता है. देश लगातार चलने वाली एक प्रक्रिया का हिस्सा है. देश रोज़ बनता है और हमेशा नये ढंग में हमारे सामने आता रहता है, जिसे इस देश का गरीब, किसान, मजदूर और बाकी मेहनतकश लोग बनाते है. अब लड़ाई इस बात की है कि यह देश किसका है? और इसका मालिक कौन होगा? इस देश की संपत्ति, संसाधनों पर हक किसका होगा? यही गरीब, मजदूर, किसान और मेहनतकश लोग जो रोज़ इस देश को बनाते है, जब अपने हक के लिए खडे होते है तो इस देश की सत्ता/सरकार चंद पूंजीपतियों के साथ क्यूँ खड़ी हो जाती है? और इस देश को बनाने वालों के हक में जब जे.एन.यू. जैसे संस्थान आवाज़ उठाते हैं तो उसे देशद्रोही करार देने की कोशिश क्यों होती है?

जिस समय जे.एन.यू. का मसला ही पूरे देश में चर्चा का विषय बना रहा उस समय जे.एन.यू. प्रशासन व इस देश की सत्ता ने बड़ी चालाकी से अपने मंसूबों को पूरा करने में इस समय का इस्तेमाल किया. यह सर्वविदित है कि  जे.एन.यू. अपनी एडमिशन पालिसी  के कारण ही अपना एक इनक्लूसिव/समावेशिक कैरेक्टर बना पाया है. लगभग 24 साल से चली आ रही इस पालिसी को प्रशासन ने बदल दिया और स्टूडेंट कम्युनिटी को कुछ खबर तक नहीं हुई. दूसरा, ओबीसी के मिनिमम एलिजिबिलिटी कट ऑफ, जिसको चार साल (4 years) के लम्बे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जा करके इस जे.एन.यू. प्रशासन के खिलाफ जीत कर लाया गया था और इसे सिर्फ जे.एन.यू. नही पूरे देश के संस्थानों के लिए अनिवार्य किया गया था, उसको ख़त्म कर दिया गया और किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई. इसी तर्ज पर दूसरी तरफ सत्ता में बैठे लोगों ने इस समय का फायदा विजय माल्या को इस देश के बाहर भेजने के लिए इस्तेमाल किया. ये सत्ता/सरकार की बहुत ही पुरानी तरकीब रही है कि अगर देश की कुछ रियल समस्याएँ हैं तो उसकी तरफ से ध्यान भटकाने के लिए कुछ ऐसा करो कि इस देश के लोगों का ध्यान उधर जाए ही ना. इस सरकार के 2 साल बीत जाने के बाद इनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस देश के लोगों के सामने गिना सके कि हमने क्या किया. ये चुनाव पर चुनाव हारते जा रहे हैं. तब इन्होने इस देश के लोगों का ध्यान उनकी विफलता से हटाने के लिए जे.एन.यू. “काण्ड” को गढ़ा. इस साजिश को साफ़ साफ़ समझा जा सकता है कि जब जे.एन.यू. का आन्दोलन चल रहा था उस समय भाजपा अध्यक्ष ने घोषणा की कि वह इस मामले को लेकर के यू.पी. के घर-घर में जाएंगे. यूपी के घर घर ही क्यूँ? क्यूंकि वहाँ चुनाव आने वाले हैं. धूमिल ने सत्ता/सरकार के इसी साजिश की ओर इशारा करते हुए हमे सावधान किया और लिखा कि

चंद चालाक लोगों ने

जिनकी नरभक्षी जीभ ने

पसीने का स्वाद चख लिया है,

बहस के लिए भूख की जगह भाषा को रख दिया है….

अगर धूमिल की इसी बात को और आगे बढाते हुए कहा जाए तो आज भूख की जगह प्रतीकों/सिम्बल्स/नारों को रखने की कोशिश चल रही है. यानि हमारे जीवन की रियल समस्याओ से ध्यान हटा देने की हर बार की तरह एक कोशिश, एक साजिश .

जे.एन.यू. में जब ये आन्दोलन चल रहा है तब इस आन्दोलन को लेकर तरह तरह की शंकाए/भय, जो कि बहुत  हद तक जायज़ भी है, ज़ाहिर किये जा रहे हैं. हमको यह कहा जा रहा है की इस प्रशासन से हमें कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि हमें इस प्रशासन से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. तब इस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? हमारे सामने क्या रास्ता है? हमारे ऊपर जो दंडात्मक कार्यवाहियां हुई है, उनको मान लेना चाहिये? हमारा यह साफ़ साफ़ मानना है कि ये दंडात्मक कार्यवाहियां हमारे उपर एक विचारधारात्मक कार्यवाही (ideological punishment) है. भले ही यह कार्यवाही कुछ छात्र-छात्राओं पर की गयी है लेकिन इसका निशाना पूरा जे.एन.यू. ही है. इसका कारण स्पष्ट है कि जे.एन.यू. साम्प्रदायिकता व साम्राज्यवाद विरोधी होने के कारण हमेशा से सत्ता के निशाने पर रहा है. यहाँ पर समाज के हर तबके की आवाज़ के लिए एक जगह है और इतना ही काफी है आरएसएस के लिए कि वह जे.एन.यू. विरोधी हो. जेएनयू के छात्र आन्दोलन की विशेषता है कि यह कैम्पस के मुद्दों को उठाने के साथ साथ देश दुनिया में चल रही प्रत्येक चीज़ पर सजग रहता है, और ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है और इसी का परिणाम है कि इस सरकार के सत्ता में आने से पहले और बाद में हमेशा से जब भी इन्होने इस देश के लोगों के खिलाफ कदम उठाएं हैं तब-तब इन्हें यहाँ के छात्रों के आन्दोलन/विरोध का सामना करना पडा है.

अब इन सारी चीज़ों को ध्यान में रखकर देखें तो हमें क्या करना चाहिए? नए कुलपति/वाईस-चांसलर साहब की नियुक्ति हुई है, वो अपने संघ के एजेंडे पर बेशर्मी और पूरी इमानदारी के साथ काम कर रहे है. उनको जे.एन.यू. के कैरेक्टर को ख़त्म करना है. ऐसे समय में छात्र-आन्दोलन की ज़िम्मेदारी क्या होगी? क्या हम लोग इस देश के छात्र-आन्दोलन के प्रति जवाबदेह नहीं है जबकि आज एक ऐतिहासिक जवाबदेही हमारे कंधो पर है. जे.एन.यू. के छात्र-आन्दोलन को इस देश में एक सम्मानजनक स्थान हासिल है. कई लोग तो इसे भारतीय छात्र-आन्दोलन का लाइट हाउस तक भी कह देते हैं. यह सही बात है कि हम जब किसी आन्दोलन में होते हैं तो हम यह तय करते है  कि इस आन्दोलन से हमें कम से कम क्या निकाल कर लाना है. लेकिन इस आन्दोलन में क्या कुछ कम-ज्यादा/ मिनिमम-मैक्सिमम जैसा कुछ भी है? यह तो पूरे जे.एन.यू. को बचाने की लड़ाई है. यह देश के लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है. यह आन्दोलन सिर्फ आये हुए संकट को टाल देने के लिए नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति जवाबदेही के लिए भी है. अगर इस आन्दोलन को लेकर सोचने का नज़रिया होगा तो यह बिलकुल नहीं होगा कि इस आन्दोलन से कैसे निकला जाए, बल्कि यह होगा कि इस आन्दोलन में कैसे और धंसा जाए और इसे और कैसे धारदार बनाया जाये. अगर “उन्होंने” कुछ तय कर लिया है तो हमें भी कुछ तय करना होगा. हम किसी मुगालते या भावुकता में भूख हड़ताल में नहीं बैठे हैं बल्कि पूरी तरह से सोची समझी गयी राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ हम इस आन्दोलन में गए हैं. हम भी नहीं जानते है कि हमारी लड़ाई का अंजाम क्या होगा. आज हम अपनी लड़ाई को रोहित वेमुला की लड़ाई से अलग करके नहीं देखते हैं. रोहित ने हमें संदेश दिया कि अगर बर्बाद ही होना है तो लड़ते हुए बर्बाद हो. रोहित हम तुम्हारे दिखाए हुए रास्ते पर चल रहे हैं.

अनन्त प्रकाश नारायण

(लेखक जे.एन.यू. के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ लॉ एंड गवर्नेंस के शोध-छात्र हैं और जे.एन.यू. छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष हैं.)

17 Faces of Hunger for Justice – Day 6 of the Indefinite Hunger Strike at JNU: ‘We Are JNU’

Guest Post by ‘We Are JNU

At the end of the 6th day of the Indefinite Hunger Strike by JNU Students, the ‘We Are JNU‘ Facebook Page uploaded a gallery of portraits of the 17 students on Hunger Strike, together with details of their medical conditions. We are sharing this post on Kafila in solidarity

This slideshow requires JavaScript.

Summer of Rage: JNU Students Begin Fast Unto Death against HLEC Report

13083178_1763261193905640_250606241251585686_n

Spring has given way to the beginning of a turbulent summer. April, is a cruel month. Temperatures have risen, and so has the level of rage in university campuses. The JNU University Authorities (and their masters – in the Ministry of Human Resources Development, the Prime Minister’s Office and the RSS Citadels in Mahal, Nagpur and Jhandewalan, Delhi) thought that they could break the resolve of the students by enacting a series of harsh measures against them just before exams begin and the university term ends in summer vacations.

Chintu Kumari, Anirban Bhattacharya and other students give the call to protest against the HLEC and call for a Hunger Strike. Photo, Courtesy, Azhar Amim
Chintu Kumari, Anirban Bhattacharya and other students give the call to protest against the HLEC and call for a Hunger Strike. Photo, Courtesy, Azhar Amim

13055719_10154616732485016_4978357478249045500_o

This is a time, they must have thought, when students will be busy with preparations, and the rising heat will discourage the kind of mass mobilizations that the campus has seen since February. Students in JNU resolved a few hours ago to prove them wrong, and decided to fight back . A massive gathering stood its ground at the Administrative Block, aptly re-christened, ‘Freedom Square’.

Rama Naga, Gen.Sec. JNUSU, (Centre) and JNU Students Calling for Indefinite Hunger Strike on April 27, 2016. Photo, Courtesy, Azhar Amim
Rama Naga, Gen.Sec. JNUSU, (Centre) and JNU Students Calling for Indefinite Hunger Strike on April 27, 2016. Photo, Courtesy, Azhar Amim

They have decided that a batch of students will sit on indefinite hunger strike – a ‘fast unto death’ – until the JNU authorities roll back the draconian measures listed in the HLEC Report.

The 20 students who will be sitting in indefinite hunger strike at JNU.

There’s no looking back now. Whatever happens from now on wards, will be seen as a consequence of the cruel, evil mindset of the current regime, which truly treats the lives of the young as dispensable ballast. Its time to prove them wrong. This is a call that goes out to all students and teachers, and sensible individuals, not just in JNU, not just in Universities and Colleges all across India and all the territories administered by the Indian republic, but to everyone reading this post anywhere in the world, to stand by the courageous students of JNU. It is our responsibility to see that the JNU Authorities see reason and back down. If anything untoward happens to any student, the university authorities, and the regime backing them, will be clearly culpable.

Here is Umar Khalid, speaking just before commencing his Hunger Strike

Here is Chintu, former Gen. Sec. JNUSU, speaking at the Mashaal Juloos, (Torchlight Procession) just before beginning the Hunger Strike.

Listen to Kanhaiya Kumar, President of the JNUSU – restating the reasons for the continuation of the movement.

Thanks to the ‘We are JNU Media Group’ and the AISA Youtube Channel, for the videos.

Long Nights of Revolution, Dancing, Music and Poetry are Ahead: Veer Vikram

[ Here are five joyous excerpts of recordings from a recent night on the JNU campus – after Kanhaiya Kumar came back –  recorded by a young person called Veer Vikram. We do not know who Veer Vikram is, but came across his Youtube Channel, and were struck by the raw freshness of the voices and of the footage. So we are sharing them with you, saluting the generosity of Veer Vikram, who recorded these and uploaded them on to Youtube for everyone to enjoy. May there be many long nights of joy, music, dancing and poetry – in campuses, factories and neighborhoods – everywhere  Think so what a beautiful sight a ‘vishaal jan jagaran’ (as distinct from a ‘bhagawati’ jagaran) can make in different corners of Delhi, and in every city and town where young people can no longer take the rubbish offered by TV channels and the Modi regime. The revolution will be danced, sang, dreamt, recorded, uploaded, downloaded, shared and enjoyed. No more words necessary ]

A Conversation about the Meaning of the word ‘Azadi’ (‘Freedom’) in the Wake of Events at JNU

Signal to Noise Ratio

There has been a lot of talk about what exactly ‘Azadi’ (freedom) means, especially in the wake of Kanhaiya Kumar’s post release midnight speech at JNU on the 4th of March. So lets talk some more. No harm talking. If there is noise, there must also be a signal, somewhere.

Kanhaiya Kumar clarified in his electrifying, riveting speech that his evocation of Azadi was a call for freedom ‘in’ India, not a demand, or even an endorsement of a demand for freedom ‘from’ India.

This may come as a sigh of relief to some, – Kanhaiya , the man of the moment, proves his ‘good’ patriotic credentials, leading to an airing of the by now familiar ‘good nationalist vs. bad nationalist’ trope. And everyone on television loves a nationalist, some love a good nationalist even more.

Perhaps this was a way of dealing with a bail order that was at the same time a gag order.

[ P.S. : Since writing this last night, a more careful reading of the bail order has suggested to me that the actual terms of bail are not so bad after all. Bail is in fact granted, as far as I can see, fairly unconditionally. Kanhaiya is not asked, for instance, to step down from his position in the students’ union, nor are restrictions placed on his movement and activity. So in technically legal sense, the bail provisions need not be interpreted in a tightly restricted manner. The egregious political hortations, the references to infection, antibiotics, amputation and gangrene, which are over and above the legal instructions, are indeed terrible, but operationally, they have no executive authority backing them.]

But to say just that the text of the bail order is what shaped Kanhaiya’s midnight speech would be ungenerous, and miserly, especially in response to the palpably real passion that someone like Kanhaiya has for a better world, and for a better future for the country he lives and believes in. I have no doubt about the fact that coming as he does from the most moderate section of the Indian Left (the CPI – well known for their long term affection for the ‘national bourgeoisie’ despite the national bourgeouisie’s long term indifference/indulgence towards them), Kanhaiya is a genuine populist nationalist patriot [I have corrected ‘nationalist’ to ‘patriot’ here in response to the criticism and suggestion held out by Virat Mehta’s comment – see below in the comments section] and a democrat moulded as he says, equally by Bhagat Singh and Dr. Ambedkar. There is a lot to admire in that vision, even in partial disagreement. And while some may not necessarily share his nationalism, this does not mean that one has to treat it with contempt either. I certainly don’t.

Continue reading A Conversation about the Meaning of the word ‘Azadi’ (‘Freedom’) in the Wake of Events at JNU

‘Feeling Seditious’: March on Parliament to #StandwithJNU

For the third time within a span of two weeks since the middle of February, thousands of people came out on the streets of Delhi to express their solidarity with the detained students of JNU (Kanhaiya Kumar, Umar Khalid and Anirban) and to voice their anger with the venal Modi regime.

Protest demonstrations (at least in northern India) tend to have something of the monotonous in them, the same cadence, the same rhythm and the same wailing, complaining tone. They tend to have an air of events staged by the defeated, for the defeated. But if we take the last three big protests in the city, and the many gatherings in JNU in the last two weeks or so,  as any indicator of what the pulse of our time is, we will have to agree that there has been a qualitative transformation in the language, vocabulary and  affect of protests. This afternoon, like the afternoon of the 18th (the first big JNU solidarity march), and of the 23rd of February (the Justice for Rohith Vemula March), was as much about the joy of togetherness and friendship as it was about rage and anger.

Continue reading ‘Feeling Seditious’: March on Parliament to #StandwithJNU

JNUSU Statement of Thanks for Global Support and Call for International Day of Protest and Action in Solidarity with Students in India on 2nd March 2016 : Shehla & Rama Naga (JNUSU)

Guest Post by Shehla (Vice-President, JNUSU) and Rama Naga (General Secretary, JNUSU)

To all Friends (in Delhi, India and the World) who have Supported the Struggle of JNU students and students elsewhere in India  in the past few weeks.

Thank you for your message of solidarity. In this hour of unprecedented attack on us, what has been a source of great strength are messages like these, which we have pasted all over the Administration Building. We have not been able to respond to each message because of being extremely overburdened. However, we are writing back today, in order to update you regarding the status of the struggle, and with a call to action on the 2nd of March, 2016 in your city.

Call for Global Day of Protest and March to Parliament for JNU - March 2nd, 2016
Call for Global Day of Protest and March to Parliament for JNU – March 2nd, 2016

Continue reading JNUSU Statement of Thanks for Global Support and Call for International Day of Protest and Action in Solidarity with Students in India on 2nd March 2016 : Shehla & Rama Naga (JNUSU)