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Appeal to Join “JNU Chalo” on 15 Nov Marking One Month of Najeeb’s Disappearance: JNUSU

Guest Post by JNUSU (Jawaharlal Nehru University Students Union)

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Friends, on 14th October night, Najeeb Ahmed, a student of M.Sc. Biotechnology, JNU was brutally assaulted and violently threatened by a group of ABVP students. From 15th October morning, Najeeb went missing from the campus. The disappearance of a student from a central university in the national capital after assault and intimidation of right wing lumpens is no doubt an ominous reflection of the dark times we are living in. For past four weeks, students, teachers, staff members of JNU, and citizens of Delhi have been coming out on the streets demanding institutional accountability to bring back Najeeb.

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सामाजिक न्याय ही इस दौर की स्टूडेंट पॉलिटिक्स का मुख्य एजेंडा होगा: अनन्त प्रकाश नारायण

अतिथि पोस्ट: अनन्त प्रकाश नारायण

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद जे.एन.यू. में 16 दिन की एक भूख हड़ताल खत्म हुई. सभी तरह की सजाओ पर, जो जे.एन.यू. की उच्च स्तरीय जाँच कमिटी (HLEC) ने हम छात्र- छात्राओ पर लगा रखी थी, उन पर रोक लगा दी गई. इस आदेश को ले करके तमाम तरह की व्याख्याए/निर्वचन (Interpretation) है. इस भूख हड़ताल के दौरान कुछ ऐसी घटनाये घटी जिसे यह कैंपस हमेशा याद रखेगा जैसे एकेडेमिक कौंसिल को छोड़कर वाईस चांसलर द्वारा भाग जाना. एकेडेमिक कौंसिल में हमारी मांगे एकदम स्पष्ट थी. उच्च स्तरीय जाँच कमिटी को ख़ारिज करना, ओ.बी.सी. रिजर्वेशन को दोनों स्तर पर लागू करवाना, हॉस्टल में ओ.बी.सी. रिजर्वेशन और साक्षात्कार/ वाइवा के नंबर को कम करना इत्यादि. जब हम जे.एन.यू. की बात करते है तो हमे बिलकुल स्पष्ट हो जाना है कि जे.एन.यू. प्रशासन देश के किसी भी प्रशासन की ही तरह है और कई बार तो उससे भी बदतर. वह तो यहाँ का स्टूडेंट पॉलिटिक्स है जो कि इस कैंपस को समावेशी /इंक्लूसिव बनाने के लिए लड़ता है.
यह वही जे.एन.यू. प्रशासन है जिसने लगभग दस साल तक (1984-93) इस कैंपस से deprivation/ quartile पॉइंट्स को यह कहते हुए ख़त्म कर दिया था कि इस कैंपस में गाँवो से आने वाले स्टूडेंट्स के कारण यहाँ का अकादमिक स्तर ख़राब हो रहा है और कैंपस रेडिकलाईज़ हो रहा है. यह जे.एन.यू. का स्टूडेंटस मूवमेंट था जो की इसे जीत कर 1994 में वापस लाता है. हमने देखा इसी तर्ज़ पर किस तरह से प्रशासन ने ओ.बी.सी. रिजर्वेशन के मिनिमम ‘कट-ऑफ’/cut-off की गलत व्याख्या करके सैकड़ो पिछड़े वर्ग के छात्र- छात्राओ को 2008-2010 तीन वर्षो तक कैंपस से बाहर रखा. यह जे.एन.यू. स्टूडेंट्स मूवमेंट था जिसने कि एक लम्बे पोलिटिकल और लीगल बैटल के बाद एक सही व्याख्या को इस कैंपस में ही नही पूरे देश में लागू करवाया. मदरसा सर्टिफिकेट की लड़ाई हो या फिर अभी ओ.बी.सी. मिनिमम एलिजिबिलिटी का मामला हो, सारे मामले में प्रशासन हमारे खिलाफ ही खड़ा रहा है. आज जब हम ओ.बी.सी. रिजर्वेशन के उद्देश्य/स्पिरिट को इंश्योर कराने के लिए दोनों स्तर पर रिलैक्सेशन लागू कारवाने की कोशिश कर रहे है तब हम देखते है कि किस तरह से इस प्रशासन ने अपने सारी नैतिकता/ मर्यादा को एक तरफ रखते हुए पिछले वी.सी. के समय हुए स्टैंडिंग कमिटी के फैसले को बदल दिया और हद तो तब हुई जब जे.एन.यू. स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष और महासचिव ने यह दावा किया कि इनविटेसन लेटर पर उनके हस्ताक्षर फर्जी किये गये है.

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Choice, Agency and the Naming of Names – The Trap of ‘Immediate Identities’ and the Vision of a Democratic Revolution: Chintu Kumari & Umar Khalid

Paired Guest Posts by CHINTU KUMARI and UMAR KHALID

[ Every struggle goes through highs and lows. The students who are part of the  movements that are spreading out of universities in India – Hyderabad Central University, Jawaharlal Nehru University and Jadavpur University have had their share of internal debates and disagreements, even as they have found moments of significant victory. and solidarity

Students at JNU who have recently concluded their hunger strike to give time to the university authorities to respond reasonably to the High Court directives on the HLEC punishments are now being criticized for having ‘abandoned the struggle’ by some sections who claim to play a role within the broader students movement, when, in fact, nothing of that sort has actually happened.

The majority of the students who were on hunger strike (including several JNUSU office bearers, and others) have said that they have given up the hunger strike against the HLEC recommendations in keeping with the court order.  In doing so, they have never said that they are suspending the agitation against the attempts by the JNU administration to weaken OBC reservation in admissions, hostel seats and deprivation points for women and oppressed sections of society.

In fact it is not as if the HLEC punishments issue has taken precedence over the other issues. It is actually the other way round. The students have decided to give priority to the struggle for ’social justice’ within the campus, while simultaneously giving time to the university authorities to respond adequately to the court directive on the HLEC punishment question.The call for a demonstration against the University Authorities by the JNUSU to continue the struggle on the social justice issues on the 16th of May is indicative of this fact.

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The attacks and insinuations against the majority of the students at JNU who were on hunger strike have also featured a deliberate attempt to create divisions within the unified ‘Red-Blue’ / ‘Jai Bhim-Lal Salaam’ dynamics of the movement on the grounds of identity. Activists, such as Umar Khalid, on the left have been singled out for being ‘Savarna-Syed’, if they happen to bear a Muslim name, and for being ‘sold out to the Savarna left’ if they are Dalit, as happened with Chintu Kumari and Rama Naga. This attack has come primarily from individuals representing organizations like BAPSA that claim to speak from a ‘Dalit’ position, and it is given traction by several other individuals eager to flaunt their disdain for the ‘left’ students on Facebook and social media.  Continue reading Choice, Agency and the Naming of Names – The Trap of ‘Immediate Identities’ and the Vision of a Democratic Revolution: Chintu Kumari & Umar Khalid

Run Jaggu Run — The JNU VC Runs Away from the Academic Council Meeting

The 10th of May, the 13th Day of the Hunger Strike by JNU Students in protest against the HLEC Report was also the day scheduled for a meeting of the Academic Council of JNU. Students and faculty had resolved to stage a massive protest. Student and Faculty members of the Academic Council had also resolved to forcefully present issues related to the current crisis in the university at the AC Meeting. The events of the day are presented here through a series of videos and photographs uploaded by different people from JNU.

[ Video by Samim Asgor Ali, taken from his Youtube Channel ]

They tell the story of how students were generous with their tormentor, the VC, Jagadeesh Kumar, and how he ran away.

One day, his backers, Smriti Irani, Rajnath Singh and even Narendra Modi, and all the goons in the RSS headquarters at Mahal, Nagpur and Jhandewalan, Delhi will have to run for cover in a similar fashion when faced with the ‘gift’ of the fruits of their actions.

Photo by Samim Asgor Ali
Photo by Samim Asgor Ali

The students gathered on hunger strike collected their meals from their hotel messes and placed them in front of the AC meeting venue as a ‘gift’ to the Vice Chancellor, JNU and the university administration. Continue reading Run Jaggu Run — The JNU VC Runs Away from the Academic Council Meeting

रोहित वेमुला हम तुम्हारे दिखाए हुए रास्ते पर चल रहे हैं: अनन्त प्रकाश नारायण

अतिथि पोस्ट : अनन्त प्रकाश नारायण

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भूख हड़ताल का बारहवां दिन (12th Days) चल रहा है. प्रशासन कितना दवाब में है कुछ भी कहा नही जा सकता है. हाँ, अगल बगल के हालात देख कर, बात-चीत सुन कर इतना तो जरुर समझ में आ रहा है कि कुछ तो “अन्दर” जरुर चल रहा है. अध्यापक संघ हमारे साथ खड़ा है. उन्होंने हमारे समर्थन में एक दिन का भूख हड़ताल भी किया और अब क्रमिक भूख हड़ताल पर है. हमसे हमारे शुभचिंतको द्वारा बार बार आग्रह किया जा रहा है कि हम भूख हड़ताल को छोड़े. हम जब इस भूख हड़ताल पर बैठ रहे थे तो हमारे सामने की स्थिति ने हमे चेता दिया था कि ये करो या मरो की स्थिति है. इसलिए हमने नारा/स्लोगन भी दिया कि ये भूख हड़ताल हमारी मांगो तक या फिर हमारी मौत तक. हमारी मांग बिलकुल स्पष्ट है कि हम अलोकतांत्रिक, जातिवादी उच्चस्तरीय जांच कमिटी को नहीं मानते है. इसलिए इसके आधार पर हम कुछ छात्र-छात्राओ पर जो आरोप व दंड लगाये गए है उनको ख़ारिज किया जाये और प्रशासन बदले की भावना से इन छात्र-छात्राओ पर कार्यवाही करना बंद करे और जे.एन.यू. के एडमिशन पालिसी को लेकर कुछ मांगे है. सजा क्या है? कुछ का विश्वविद्यालय से निष्कासन, कुछ का हॉस्टल-निष्कासन और कुछ लोगों पर भारी जुर्माने की राशि और कुछ लोगों के उपर यह सब कुछ. अब जब हम आन्दोलन में है तो यह साफ़ साफ़ देख पा रहे है कि यही तो हुआ था हैदराबाद के साथियों के साथ. एक एक चीज हू-ब-हू बिलकुल इसी तरह. इसी तरह से हॉस्टल से निकल कर सड़क पर रहने के लिए विवश किया गया था. इसी तरह तो कोशिश की गई थी रोहित और उसके साथियों को देश और दुनिया के सामने एंटी-नेशनल के तमगे से नवाज देने की. नतीजा क्या हुआ सबके सामने है.

इस भूख हड़ताल के दौरान लोग हमसे मिलने आ रहे है. कुछ लोगों ने जुर्माने की राशि को जुटाने का प्रस्ताव दिया, तो कुछ लोगों ने खुद ही जुर्माने की राशि देने का प्रस्ताव दिया. हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं. लेकिन क्या यह लड़ाई कुछ दंण्ड/जुर्माने के खिलाफ लड़ाई है? नहीं, यह लड़ाई देश बचने की लड़ाई है. बहुत ही सरल शब्दों में कहा जाये तो इस लड़ाई से यह तय होगा कि इस सत्ता/सरकार के रहते इस देश में विरोध की आवाजो/dissents के लिए कोई जगह होगी की नहीं. जे.एन.यू का प्रोग्रेसिव स्टूडेंट मूवमेंट अपने क्रांतिकारी कलेवर के साथ अपनी पहचान लिए खड़ा रहता है. यह क्रांतिकारी स्टूडेंट मूवमेंट यह तय तो करता ही है कि इस कैंपस  को इतना समावेसित/इंक्लूसिव बना कर रखा जाये कि समाज के सबसे निचले तबके के लिए भी यह विश्वविद्यालय का गेट खुला रहे लेकिन साथ ही साथ इस छात्र-आन्दोलन ने अन्दर और बाहर के मुद्दे का भी भेद मिटा दिया और देश के सामने एक वैकल्पिक राजनीति का मॉडल ले करके सामने आया.

बीते दिनों इस स्टूडेंट-मूवमेंट के साथ साथ पूरे जे.एन.यू को निशाने पर लिया गया और इसे एक संस्थान के रूप में देश-विरोधी ठहरा देने का प्रयास हुआ. आखिर देश है क्या? आखिर हम देशभक्ति माने किसे? अभी कुछ दिनों पहले हम देश की विभिन्न जगहों पर कैम्पेन में थे. उन सभाओ व परिचर्चाओ के दौरान भी देशभक्ति चर्चा का एक गर्म विषय रहा. उन सवालों को करने वाले लोग ही कई बार इन सवालो का जवाब दे देते. वो भारत का नक्शा दिखा कर के और भारत की सीमाओं को दिखाते हुए बोलते इन सीमाओं के भीतर जो कुछ भी है देश है. इसका मतलब पेड़-पौधे, रेलगाड़ी, प्लेटफार्म, पहाड़, जंगल, कारखाने, यहाँ के लोग, खनिज-संपदा, नदियाँ, तालाब, इत्यादि सब कुछ देश है. इस दौरान मुझे अपवादिक रूप से भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने देश की इस परिभाषा से असहमति जताई. देश के लिए प्रतीक बने, संविधान बना, कानून बने और जैसे-जैसे यह देश बदलता जाता है, आगे बढ़ता जाता है, उसी के आधार पर प्रतीक से ले करके कानून तक सब चीज़ों में परिवर्तन होता जाता  है. देश के लिए प्रतीक होते हैं, प्रतीकों का कोई देश नहीं होता है. देश लगातार चलने वाली एक प्रक्रिया का हिस्सा है. देश रोज़ बनता है और हमेशा नये ढंग में हमारे सामने आता रहता है, जिसे इस देश का गरीब, किसान, मजदूर और बाकी मेहनतकश लोग बनाते है. अब लड़ाई इस बात की है कि यह देश किसका है? और इसका मालिक कौन होगा? इस देश की संपत्ति, संसाधनों पर हक किसका होगा? यही गरीब, मजदूर, किसान और मेहनतकश लोग जो रोज़ इस देश को बनाते है, जब अपने हक के लिए खडे होते है तो इस देश की सत्ता/सरकार चंद पूंजीपतियों के साथ क्यूँ खड़ी हो जाती है? और इस देश को बनाने वालों के हक में जब जे.एन.यू. जैसे संस्थान आवाज़ उठाते हैं तो उसे देशद्रोही करार देने की कोशिश क्यों होती है?

जिस समय जे.एन.यू. का मसला ही पूरे देश में चर्चा का विषय बना रहा उस समय जे.एन.यू. प्रशासन व इस देश की सत्ता ने बड़ी चालाकी से अपने मंसूबों को पूरा करने में इस समय का इस्तेमाल किया. यह सर्वविदित है कि  जे.एन.यू. अपनी एडमिशन पालिसी  के कारण ही अपना एक इनक्लूसिव/समावेशिक कैरेक्टर बना पाया है. लगभग 24 साल से चली आ रही इस पालिसी को प्रशासन ने बदल दिया और स्टूडेंट कम्युनिटी को कुछ खबर तक नहीं हुई. दूसरा, ओबीसी के मिनिमम एलिजिबिलिटी कट ऑफ, जिसको चार साल (4 years) के लम्बे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जा करके इस जे.एन.यू. प्रशासन के खिलाफ जीत कर लाया गया था और इसे सिर्फ जे.एन.यू. नही पूरे देश के संस्थानों के लिए अनिवार्य किया गया था, उसको ख़त्म कर दिया गया और किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई. इसी तर्ज पर दूसरी तरफ सत्ता में बैठे लोगों ने इस समय का फायदा विजय माल्या को इस देश के बाहर भेजने के लिए इस्तेमाल किया. ये सत्ता/सरकार की बहुत ही पुरानी तरकीब रही है कि अगर देश की कुछ रियल समस्याएँ हैं तो उसकी तरफ से ध्यान भटकाने के लिए कुछ ऐसा करो कि इस देश के लोगों का ध्यान उधर जाए ही ना. इस सरकार के 2 साल बीत जाने के बाद इनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस देश के लोगों के सामने गिना सके कि हमने क्या किया. ये चुनाव पर चुनाव हारते जा रहे हैं. तब इन्होने इस देश के लोगों का ध्यान उनकी विफलता से हटाने के लिए जे.एन.यू. “काण्ड” को गढ़ा. इस साजिश को साफ़ साफ़ समझा जा सकता है कि जब जे.एन.यू. का आन्दोलन चल रहा था उस समय भाजपा अध्यक्ष ने घोषणा की कि वह इस मामले को लेकर के यू.पी. के घर-घर में जाएंगे. यूपी के घर घर ही क्यूँ? क्यूंकि वहाँ चुनाव आने वाले हैं. धूमिल ने सत्ता/सरकार के इसी साजिश की ओर इशारा करते हुए हमे सावधान किया और लिखा कि

चंद चालाक लोगों ने

जिनकी नरभक्षी जीभ ने

पसीने का स्वाद चख लिया है,

बहस के लिए भूख की जगह भाषा को रख दिया है….

अगर धूमिल की इसी बात को और आगे बढाते हुए कहा जाए तो आज भूख की जगह प्रतीकों/सिम्बल्स/नारों को रखने की कोशिश चल रही है. यानि हमारे जीवन की रियल समस्याओ से ध्यान हटा देने की हर बार की तरह एक कोशिश, एक साजिश .

जे.एन.यू. में जब ये आन्दोलन चल रहा है तब इस आन्दोलन को लेकर तरह तरह की शंकाए/भय, जो कि बहुत  हद तक जायज़ भी है, ज़ाहिर किये जा रहे हैं. हमको यह कहा जा रहा है की इस प्रशासन से हमें कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि हमें इस प्रशासन से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. तब इस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? हमारे सामने क्या रास्ता है? हमारे ऊपर जो दंडात्मक कार्यवाहियां हुई है, उनको मान लेना चाहिये? हमारा यह साफ़ साफ़ मानना है कि ये दंडात्मक कार्यवाहियां हमारे उपर एक विचारधारात्मक कार्यवाही (ideological punishment) है. भले ही यह कार्यवाही कुछ छात्र-छात्राओं पर की गयी है लेकिन इसका निशाना पूरा जे.एन.यू. ही है. इसका कारण स्पष्ट है कि जे.एन.यू. साम्प्रदायिकता व साम्राज्यवाद विरोधी होने के कारण हमेशा से सत्ता के निशाने पर रहा है. यहाँ पर समाज के हर तबके की आवाज़ के लिए एक जगह है और इतना ही काफी है आरएसएस के लिए कि वह जे.एन.यू. विरोधी हो. जेएनयू के छात्र आन्दोलन की विशेषता है कि यह कैम्पस के मुद्दों को उठाने के साथ साथ देश दुनिया में चल रही प्रत्येक चीज़ पर सजग रहता है, और ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है और इसी का परिणाम है कि इस सरकार के सत्ता में आने से पहले और बाद में हमेशा से जब भी इन्होने इस देश के लोगों के खिलाफ कदम उठाएं हैं तब-तब इन्हें यहाँ के छात्रों के आन्दोलन/विरोध का सामना करना पडा है.

अब इन सारी चीज़ों को ध्यान में रखकर देखें तो हमें क्या करना चाहिए? नए कुलपति/वाईस-चांसलर साहब की नियुक्ति हुई है, वो अपने संघ के एजेंडे पर बेशर्मी और पूरी इमानदारी के साथ काम कर रहे है. उनको जे.एन.यू. के कैरेक्टर को ख़त्म करना है. ऐसे समय में छात्र-आन्दोलन की ज़िम्मेदारी क्या होगी? क्या हम लोग इस देश के छात्र-आन्दोलन के प्रति जवाबदेह नहीं है जबकि आज एक ऐतिहासिक जवाबदेही हमारे कंधो पर है. जे.एन.यू. के छात्र-आन्दोलन को इस देश में एक सम्मानजनक स्थान हासिल है. कई लोग तो इसे भारतीय छात्र-आन्दोलन का लाइट हाउस तक भी कह देते हैं. यह सही बात है कि हम जब किसी आन्दोलन में होते हैं तो हम यह तय करते है  कि इस आन्दोलन से हमें कम से कम क्या निकाल कर लाना है. लेकिन इस आन्दोलन में क्या कुछ कम-ज्यादा/ मिनिमम-मैक्सिमम जैसा कुछ भी है? यह तो पूरे जे.एन.यू. को बचाने की लड़ाई है. यह देश के लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है. यह आन्दोलन सिर्फ आये हुए संकट को टाल देने के लिए नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति जवाबदेही के लिए भी है. अगर इस आन्दोलन को लेकर सोचने का नज़रिया होगा तो यह बिलकुल नहीं होगा कि इस आन्दोलन से कैसे निकला जाए, बल्कि यह होगा कि इस आन्दोलन में कैसे और धंसा जाए और इसे और कैसे धारदार बनाया जाये. अगर “उन्होंने” कुछ तय कर लिया है तो हमें भी कुछ तय करना होगा. हम किसी मुगालते या भावुकता में भूख हड़ताल में नहीं बैठे हैं बल्कि पूरी तरह से सोची समझी गयी राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ हम इस आन्दोलन में गए हैं. हम भी नहीं जानते है कि हमारी लड़ाई का अंजाम क्या होगा. आज हम अपनी लड़ाई को रोहित वेमुला की लड़ाई से अलग करके नहीं देखते हैं. रोहित ने हमें संदेश दिया कि अगर बर्बाद ही होना है तो लड़ते हुए बर्बाद हो. रोहित हम तुम्हारे दिखाए हुए रास्ते पर चल रहे हैं.

अनन्त प्रकाश नारायण

(लेखक जे.एन.यू. के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ लॉ एंड गवर्नेंस के शोध-छात्र हैं और जे.एन.यू. छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष हैं.)

JNU Hunger Strike Day 12 : Game On – Students 1, Media, Authorities 0

The JNU Students’ Hunger Strike Enters Day 12. Ketone counts go up, Weight goes down, Morale stays miles high. Media fatigue shows that crusading news anchors are no match to hunger striking students when it comes to stamina, and, may we say, courage. The university authorities, the JNU VC and his gang, the government, the RSS-ABVP, remain what they are – losers.

(Images taken, with thanks, from the ‘We are JNU‘ Facebook Page, and the ‘Mothers Stand with JNU‘ Facebook Page.)

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MEANWHILE, RADIOSILENCE CONTINUES (BESIDES RAVISH KUMAR’S SHOW) ON MAINSTREAM MEDIA

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17 Faces of Hunger for Justice – Day 6 of the Indefinite Hunger Strike at JNU: ‘We Are JNU’

Guest Post by ‘We Are JNU

At the end of the 6th day of the Indefinite Hunger Strike by JNU Students, the ‘We Are JNU‘ Facebook Page uploaded a gallery of portraits of the 17 students on Hunger Strike, together with details of their medical conditions. We are sharing this post on Kafila in solidarity

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