2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कुछ लोगों को हतप्रभ किया है और अनेक को चमत्कृत. इस जनादेश की व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि भारत की जनता ने विकास को तरजीह दी है और इस बडी मंदी के दौर में अपेक्षाकृत सुरक्षित चुनाव किया है. हमारे एक मित्र का कहना है कि इस असुरक्षा के समय में जनता जो हाथ में है , उसे ही संजोए रखना चाहती थी. भारतीय जनता पार्टी और तथाकथित तीसरे मोर्चे के ऊपर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनने के पीछे बिजली-पानी –सडक और जान-माल की हिफाजत की रोज़मर्रा की चिंताएं ज़रूर रही होंगी, लेकिन क्या यह इतना ही था? साधारण जनता क्या सिर्फ मामूली सवालों में ही उलझी रहती है और कभी अपने रोज़मर्रेपन से ऊपर नहीं उठती? बार-बार उसे इसी हद में बांधकर देखने की कोशिश की जाती हैहालांकि उसने कई बार यह बतलाया है कि उसके मुद्दे सिर्फ वही नहीं हैं जो व्याख्याकार बताते रहे हैं. साधारण जनता की उदात्तता की आकांक्षा आखिर किस रूप में व्यक्त होती है?
भारत में मोहनदास करमचंद गांधी ने शायद सबसे पहले साधारण के भीतर छिपी इस उदात्तता को ठीक-ठीक पहचाना था और उसका आदर किया था. क्रांतिकारियों या फिर कम्युनिस्ट विचार रखने वालों को साधारणता पर सन्देह ही था.
क्रांतिकारियों ने इसीलिए चुने हुए लोगों के दस्ते बनाए और कम्युनिस्ट खुद को जनता के एक अगुआ दस्ते के रूप में पेश करते रहे. शास्त्रकारों या सिद्धांतकारों को भी साधारणता को समझने में काफी दिक्कत होती रही है. इसलिए उनकी दिलचस्पी उन कोटियों के निर्माण में रहती है जो आसानी से सामूहिक आचरण की व्याख्या करने में सहायक हों. पिछले बीस वर्षों में भारतीय जनता के सारे निर्णयों को पहचान की कोटि के आधार पर समझने की कोशिश की गई है. यहां यह नहीं कहा जा रहा कि यह कोटि या इस तरह की सैद्धांतिक कोटियां बिलकुल अप्रासंगिक हैं, सिर्फ यही कहने की कोशिश की जा रही है कि इस प्रकार की किसी एक कोटि में किसी समूह को शेष कर देने से हम उसके भीतर छिपी सारी सम्भावनाओं को नज़रअंदाज़ देते हैं.
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