ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था! हाँ! हमें 2002 की गर्मियां ज़रूर याद हैं, मस्जिदों में चल रही पनाहगाह की याद है, याद हैं गम से खामोश और समझदार आँखें जो हमें देख रही थीं जो उनका दुःख बँटाने आए थे वहाँ, कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ वक्त गुजारने, फिर जो अपने घरों को लौट जाने को थे क्योंकि हमारे घर थे जहां हम लौट सकते थे, घर जो आपका इंतज़ार जितना करता है उससे कहीं ज़्यादा दिन-हफ्ते उससे बाहर गुजारते हुए आप उसका करते हैं. वे आँखें जानती थीं कि हमारे घर हैं लौटने को और उनके नहीं हैं. वे अशफाक, सायरा, शकीला होने की वजह से बार-बार घर खोजने को नए, सिरे से उन्हें बसाने को मजबूर हैं, कि उनको  और उनकी आगे की पीढ़ियों को इसका इत्मीनान दिलाने में यह धर्मनिरपेक्ष भारत,यह हिन्दुस्तान लाचार है. जिसकी हस्ती कभी नहीं मिटती, उस हिन्दुस्तान को बनाने वालों में कई को ज़रूर एक ज़िंदगी में कई जिंदगियां गढ़नी पड़ती हैं. एक घर के बाद कई घर बसाने पड़ते हैं. Continue reading “ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था: अपूर्वानंद”

Why Mayawati’s defeat is the BSP’s victory

Satish Chandra Mishra with Mayawati at a rally near Delhi during the Lok Sabha elections in 2009, amongst the last such appearances together

Even before the results came out, the Mayawati cabinet passed a resolution to dissolve the assembly. Never before has an incumbent shown such confidence about losing. Mayawati’s body language during the campaign was proof of the same lack of confidence. Mayawati was going to lose, the Samajwadi Party was in the air. And yet, Mayawati must be relieved right now. She knows that this defeat of hers is, ironically, a victory of the Bahujan Samaj Party and what it stands for. Here’s how.

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मायावती जी के मुख्यमंत्रित्व काल का एक संक्षिप्त विवरण: राम कुमार

This guest post by RAM KUMAR is a review of five years of Mayawati’s administration in Uttar Pradesh. An English translation has appeared in Fountain Ink magazine, here.

मुख्यमंत्री मायावती जी को 2007 में मिला स्पष्ट जनादेश  महज मुलायम सिंह यादव के खिलाफ एन्टी-इनकमवंसी फैक्टर ही नहीं था, बलिक अराजकता और गुंडागर्दी के खिलाफ भी जनादेश  था। सरकार का खुले रूप से एन्टी-दलित चरित्र और प्रदेश  के अन्दर सरकार  के एन्टी ब्राहम्ण टोन के चलते प्रदेश  में मुलायम सिंह की सरकार के खिलाफ दलित अति पिछड़े हो गये थे। मुलायम सिंह के  कल्याण सिंह प्रेम की वजह से माइनारिटी (अल्पसंख्यक) भी  मुलायम से नाराज हो  गए। बहन जी ने सर्वजन समाज का नारा देकर   विक्षुब्द तबकों को समेटा। सभी को समेटने में रणनीति के तहत अपना नारा बदल “हाथी नहीं गणेष है ब्रम्हा, विष्णु, महेष है” का नारा लगाया। सर्वजन  फार्मूला और मुलायम के खिलाफ गुस्सा बहन जी को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लेकर के आया।

बहन जी एक  सशक्त शासनकर्ता के रूप में जानी जाती थीं। इस बार भी बहन जी सत्ता में आयींऔर  सत्ता में आते ही तुरन्त उन्होनें  घोषणा की कि अराजकता और गुडागर्दी नहीं चलेगी, कानून का राज्य चलेगा। इसको  सिद्ध करने के लिये उन्होंने सबसे पहले जो राजनेता अपने साथ बहुत सारे शस्त्रधारियों को लेकर चलते थे,  उन पर प्रतिबंध  लगाया और एलान किया कि  कोई भी नेता सार्वजनिक स्थल पर तीन हथियार से  ज्यादा में दिखे तो उनके खिलाफ कार्यवाही की जायेगी। यही नहीं अपनी पार्टी के एम. पी. रमाकान्त यादव जो आजमगढ़ से हैं, एक गरीब मुसिलम के मकान पर जमीन कबजाने के चक्कर में जबरदस्ती बुलडोजर चलवाया इसकी खबर जब बहन जी को लगी उन्होंने रमाकान्त यादव को अपने मुख्यमंत्री आवास पर मिलने के लिये बुलाया और वहीं से उनको गिरफ्तार करवाया। यह संदेश  देने की कोशिशकी  कि सत्ताधारी दल के हों या विपक्षी पाटी के हों, कानून सबके लिये समान है। अपनी ही सरकार के खाधमंत्री और विधायक आनन्द सेन को एक महिला के अपहरण केस  में बर्खास्त कर जेल भिजवाया और अभी तक 26 प्रभावशाली नेता एवं मंत्रियों को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं। पिछली सरकार में हुयी 17,868 पुलिस जवानों की भर्ती में हुयी धांधली के चलते भर्ती  प्रक्रिया को निरस्त किया और 25 आई .पी.एस. अधिकारियों को भी सस्पेन्ड किया।

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An Election in Sarvajan Samaj

This photograph was taken by Salman Usmani in Ganguali village in Unnao near Lucknow, in early January. On the left is Prabhat Pandey and on the right, Ram Khilawan. Pandey is a Brahmin and Khilawan a Dalit. They’re the BSP’s men in this village, responsible for urging Brahmins and Dalits to vote for the BSP candidate, also a Brahmin. The photo was taken when I asked them to pose together. This is all the ‘brotherhood’ they could show before the camera.

Here’s my story on UP elections, seen through the prism of Brahmins and Dalits. Continue reading “An Election in Sarvajan Samaj”

History in Stone and Metal

Photo by Bhanu Pratap Singh / Round Table India

A prominent Dalit academic once told me that when a Dalit entered the seminar room, the rest of them should feel uncomfortable. Given the monumental oppression Dalits face, this should be the least consequence of Dalits getting a voice.

I am reminded of this when I think of Mayawati’s gigantic Dalit memorials that have changed Lucknow’s landscape.

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Rahul Gandhi and the Dalit votebank in Uttar Pradesh

This article by me has appeared (.pdf) in the Economic and Political Weekly.

On 14 April this year party general secretary Rahul Gandhi launched the Congress’ biggest campaign to revive itself since 1989. The date was carefully chosen, Ambedkar Jayanti, because he is trying to win over dalit votes in Uttar Pradesh (UP). In 1989 the Congress’ support base in UP was made up of a rainbow coalition of brahmins, Muslims and dalits. The Congress has to woo these communities again to regain power in UP.

The brahmin community took to the now ruling Bahujan Samaj Party (BSP) in small numbers in the 2007 Vidhan Sabha election primarily because there was no strong brahmin leader after Bharatiya Janata Party (BJP) leader Atal Behari Vajpayee became politically inactive. Brahmins see in Rahul Gandhi a potential “brahmin” leader. The UP Congress president, legislative leader and Youth Congress president in the state are all from the brahmin community.

Muslim support is no longer enchained to the Samajwadi Party (SP) because their bete noire, the BJP, is powerless these days in both the centre and the state. As a result the Muslim vote is being fought for, as a three-way contest between BSP, SP and Congress. BSP head and Chief Minister Mayawati’s stratagem is to therefore change her party’s core support base constructed out of the “brahmin-dalit” alliance into a Muslim-dalit alliance.

The dalits, wooed away en masse by the Kanshi Ram-Mayawati duo of the BSP for years, would be the hardest to win back for the Congress. In fact, a year ago the very idea would have sounded ludicrous. But today, Mayawati’s angry reaction to the Congress’ bid to woo dalits is indication that the Congress may be winning over dalits. How is this happening? Continue reading “Rahul Gandhi and the Dalit votebank in Uttar Pradesh”