‘Joblessness’ In The Post-Employment World – Urgent Need for Paradigm Change

Job seekers at a job-fair in Chinchwad, 2019, Image courtesy Reuters/ Danish Siddiqui

The ‘unemployment’ question, let us put it bluntly, is not just an innocent and neutral question today but a key arena of class war – the war of Capital on society at large. Capital has its plans but does “society” have one?

Enter the Post-Employment World

It was reported last week that top IT sector companies like TCS, Infosys, Wipro, HCL, Tech Mahindra and Cognizant are likely to slash 3 million jobs by next year. With large-scale resort to Artificial Intelligence (AI) based “robot process automation” (RPA), these companies, by shedding these jobs are expecting to “save a whopping USD 100 billion, mostly in salaries, annually” says the Indian Express report linked above. Citing NASSCOM (National Association of Software and Service Companies) the report tells us that the domestic IT sector employs around 16 million, of whom “around 9 million are employed in low-skill and BPO roles.”

Of these 9 million low-skilled services and BPO roles, 30 per cent or around 3 million will be lost by 2022, principally driven by the impact of robot process automation or RPA. Roughly 0.7 million roles are expected to be replaced by RPA alone and the rest due to other technological upgrades and upskilling by the domestic IT players, while it the RPA will have the worst impact in the US with a loss of almost 1 million jobs, according to a Bank of America report on Wednesday.”

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इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

मुक्तिबोध शृंखला : 15

‘पक्षी और दीमक’ कहानी में अपने पंख देकर दीमक मोल लेने वाले पक्षी की त्रासदी हमारी-आपकी, सबकी हो सकती है। कहानी सुनाते- सुनाते और उसके अंत तक पहुँचते ही ‘मैं’ को धक्का-सा लगता है। जब आप एक एक कर अपने पंख देते जाएँ तो फिर एक दिन रेंगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। पक्षी को तंबीह की गई थी कि दीमक उसका स्वाभाविक आहार नहीं। और कुछ हो, पक्षी को अपने पंख नहीं देने चाहिए। लेकिन उसे तो दीमक की चाट लग गई। फिर दीमक बेचनेवाले गाड़ीवान को दो दीमकों के बदले अपना एक पंख देने की उसकी आदत पड़ गयी। एक-एक कर अपने पंख गँवाते हुए वह उड़ने की ताकत खो बैठा। और फिर एक दिन एक बिल्ली का ग्रास बन गया।

कहानी के अंत तक पहुँचकर कहानी सुनानेवाले को धक्का लगता है। उसे जान पड़ता है कि कहीं वह अपनी ही कहानी तो नहीं कह रहा! वह संकल्प लेता है कि वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।

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जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

मुक्तिबोध शृंखला : 14

‘पक्षी और दीमक’ मुक्तिबोध के पाठकों की जानी हुई कहानी है। लेकिन जैसा मुक्तिबोध की कई रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है, इस कहानी में दो कहानियाँ हैं। और उनके बीच एक आत्म-चिंतन जैसा भी।

कहानी एक कमरे में शुरू होती है। लेकिन वह जितना कमरा है उतना ही किसी का मन भी हो सकता है। एक कमरा जिसके बाहर चिलचिलाती धूपभरी दोपहर है लेकिन भीतर ठंडी हलकी रौशनी। बाहर और भीतर के बीच सिर्फ एक खिड़की नहीं है, काँटेदार बेंत की झाड़ी और उससे लिपटी हुई बेल। मुक्तिबोध की रचनाओं को जन-संकुल माना जाता रहा है लेकिन कुदरत, जैसा हम पहले भी नोट कर आए हैं, उनकी बनावट को तय करती है। यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के बिना मुक्तिबोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह उनसे उसी कदर गुँथी हुई है जैसे इस बेंत की झाड़ी से यह बेल।

“बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।”

एक साथ इसमें कई संवेदनाएँ हैं- धूप की चिलचिलाहट का अनुमान, मद्धम उजाले की शीतलता, खिड़की का खुलापन, काँटेदार बेंत और आसमानी फूल।

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फिलिस्तीन के नाम क्षमा पत्र : मनोज कुमार झा

Guest Post: Manoj Kumar Jha

प्रिय फिलिस्तीनवासियो,

    हम चाहते हैं कि आप इस पत्र को करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दुःख और पछतावे की अभिव्यक्ति की तरह पढ़ें  जो हमें सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में प्रस्तुत किए गए फिलिस्तीन के प्रस्ताव में अनुपस्थित होने का है। हम न केवल गाजा पट्टी में हुई व्यापक हिंसा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव से अलग रहे,बल्कि हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों ने भारत-फिलिस्तीन के सम्बन्धों की उस समृद्ध विरासत से मुँह मोड़ लिया जो इतिहास के अनेक उतार चढ़ाव भरे दौरों में भी अक्षुण्ण रही है।

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क्लॉड ईथरली होने की संभावना

मुक्तिबोध शृंखला : 13

‘क्लॉड ईथरली’ मुक्तिबोध के पाठकों के लिए परिचित कहानी है. कहानी का पात्र मात्र क्लॉड ईथरली नहीं है. एक पात्र है लेखक. वह मुक्तिबोध भी हो सकता है और सिर्फ मुक्तिबोध की एक कृति भी. दूसरा एक जासूस. और तीसरा और केंद्रीय पात्र क्लॉड ईथरली. कहानी या उपन्यास पढ़ते वक्त हमारा ध्यान मात्र मानवीय पात्रों पर और उनके बीच घटित होनेवाले प्रसंगों पर टिका रहता है. बार-बार ध्यान दिलाया गया है कि कथा में उतनी ही भूमिका या उससे कम नहीं, उसकी होती है जिसे परिवेश कहा जाता है. हर कहानीकार के बारे में यह न भी कहा जाए तो मुक्तिबोध जैसे कथाकारों को बिना उस परिवेश के समझना संभव नहीं.

इस कहानी की शुरुआत में लेखक का ध्यान तेज धूप में चमकती एक ऊँची दीवार की तरफ जाता है. लेकिन वह सिर्फ दीवार ही नहीं देखता,

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कस्बे में ब्रह्माण्ड

मुक्तिबोध शृंखला : 12

“किसी और कवि की कविताएँ उसका इतिहास न हों, मुक्तिबोध की कविताएँ अवश्य उनका इतिहास हैं. जो इन कविताओं को समझेंगे उन्हें मुक्तिबोध को किसी और रूप में समझने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, ज़िंदगी के एक-एक स्नायु के तनाव को एक बार जीवन में दूसरी बार अपनी कविता में जीकर मुक्तिबोध ने अपनी स्मृति के लिए सैंकड़ों कविताएँ छोड़ी हैं और ये कविताएँ ही उनका जीवन वृत्तांत हैं.”

श्रीकांत वर्मा ने मुक्तिबोध के पहले संग्रह की भूमिका में यह लिखा है. साहित्य पढ़नेवाले जानते हैं कि लेखन और लेखक में घालमेल के कई खतरे हैं. लेखन का प्रमाण या उसके सूत्र लेखक के जीवन में खोजने से हम गलत नतीजों पर पहुँच सकते हैं. कई बार रचना रचनाकार के खिलाफ भी होती है. वह खुद अपने जीवन की आलोचना अपनी रचनाओं में करता हो सकता है. मुक्तिबोध ने खुद रचना के जन्म की प्रक्रिया पर लिखते हुए उसे उस बेटी की तरह बतलाया है जिसकी नाभिनाल कट जाने के बाद वह अपने रचनाकार से स्वतंत्र जीवन प्राप्त कर लेती है. कई बार जैसे संतानें पिता-माता की सबसे बड़ी आलोचक हो जाती हैं, वैसे ही रचना और रचनाकार का रिश्ता भी हो सकता है. अंतर्विरोध का सिद्धांत रचना को समझने में एक सीमा से आगे मदद नहीं करता.

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Sushant Singh Rajput, Hindu Rashtra and Bollywood

A slightly longer version of this post was published under a different title in  Southasia Multidisciplinary Academic Journal (Issue 24/25, 2020)

A young, successful, Hindi film actor died in tragic circumstances.  What followed was a sensational real life movie, scripted in the headquarters of Hindu Rashtra, as part of its larger campaign to control the cultural arena.

Sushant Singh Rajput was found hanging in his bedroom in a Mumbai flat in June 2020, and it was initially declared as suicide by the Mumbai police. Within days however, the hashtag Justice for SSR started trending, and suddenly thousands of devoted and inconsolable fans had sprung up all over social media, all attacking “Bollywood” (the Bombay film industry) for its “nepotism” which had deprived a talented actor of work, driving him to suicide. “Boycott Bollywood” was a key theme in this frenzied outpouring of apparent grief.  From here it escalated to claims that Rajput had been murdered, and that a drug cartel linked to Bollywood stars was involved in the crime. Soon these claims were all that one could see on social media, and on some Hindi, Marathi and English television channels, specially Republic and Times Now, which specialize in sensationalist and blatantly pro-Hindutva political reportage, including fake news (for one instance see Bajpai 2020). Continue reading Sushant Singh Rajput, Hindu Rashtra and Bollywood

मुक्तिबोध की भाषा : स्निग्धता और शक्ति का मेल

मुक्तिबोध:11

मुक्तिबोध की भाषा : स्निग्धता और शक्ति का मेल

मुक्तिबोध ने नेमिचंद्र जैन को लिखे पत्र में एक ध्वस्त किले के मलबे के बीच उगती वन्य वनस्पतियों  के रूप में अपनी कल्पना की थी. ‘हरे वृक्ष’ शीर्षक कविता इस पत्र के आस-पास लिखी गई मालूम पड़ती है :

ये हरे वृक्ष

सहचर मित्रों-से हैं बाँहें पसार

(ये आलिंगन-उत्सुक बाँहें फैली हज़ार)

अपने मर्मर अंगार-राग

से मधु-आवाहन के स्फुल्लिंग 

बिखरा देते हैं बार-बार..

डँस जाती है हृत्तल इनकी यह हरी आग.

यह स्नेहामंत्रण है. अपने को मिटा देने का, किसी विराट् में विलीन कर देने का आवाहन नहीं है. खुद को नया करने करने के लिए आवश्यक है मित्रता, कोई ऐसा जिसमें आपको सुनने की धैर्योत्सुकता हो. जो आपको आत्म-समीक्षा की राह पर ले जाए, लेकिन वह होगा ‘परसुएशन’, न कि भर्त्सना. इसीलिए तो पेड़ से स्फुल्लिंग बिखर रहे हैं. यह आग दिल के भीतर तक पहुँच जाती है. इसमें जलन है लेकिन प्रकाश भी है. ध्यान दिया जाना चाहिए कि आग हरी है.

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ध्वस्त किले में उगती वन्य वनस्पति

मुक्तिबोध शृंखला : 10

कहते हैं लोग-बाग बेकार है मेहनत तुम्हारी सब

कविताएँ रद्दी हैं.

भाषा है लचर उसमें लोच तो है ही नहीं

बेडौल हैं उपमाएँ, विचित्र हैं कल्पना की तस्वीरें

उपयोग मुहावरों का शब्दों का अजीब है

सुरों की लकीरों की रफ्तार टूटती ही रहती है.

शब्दों की खड़-खड़ में खयालों की भड़-भड़

अजीब समां बाँधे है!!

गड्ढों भरे उखड़े हुए जैसे रास्ते पर किसी

पत्थरों को ढोती हुई बैलगाड़ी जाती हो.

माधुर्य का नाम नहीं, लय-भाव-सुरों का काम नहीं

कौन तुम्हारी कविताएँ पढ़ेगा

मुक्तिबोध को प्रायः दुरूह कवि माना जाता रहा है. उनकी भाषा पर ऊबड़खाबड़पन, अनगढ़पन और शब्दबहुलता का आरोप लगाया जाता रहा है. प्राय: उनकी राजनीति के कारण मुक्तिबोध के प्रशंसक भी उनकी भाषा को लेकर असुविधा का अनुभव करते रहे हैं.  इसके पीछे कविता की एक विशेष समझ काम कर रही है जिसके मुताबिक कविता एक तराशी हुई कलाकृति है जिसकी सारी नोकें घिसकर गोल कर दी गई हैं. इस समझ के अनुसार कथा-रचना में तो भाषा में फैलाव हो सकता है, लेकिन कविता शब्दों का ऐसा प्रयोग है जो अनिवार्यता के सिद्धांत का पालन करता है. कविता में शब्द ही सबसे पहले है और वही अंतिम भी है, कवि ऐसे ही शब्द चुनता है जिनके बिना उसका काम नहीं चल सकता और जिन्हें दूसरे शब्दों से बदला नहीं जा सकता. हर कविता एक गठी हुई संरचना है, ऐसी इमारत है, जिसका एक-एक शब्द एक-एक ईंट की तरह है, जो खास तरह से एक पर एक जमाई जाती हैं और बीच से उनमें से किसी को खिसका देने से इमारत के भरभरा कर गिरने का खतरा है. कविता छोटी हो या लंबी, यह बात दोनों पर लागू होती है.

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व्यक्ति और भाषा: सक्षम, सप्राण और अर्थदीप्त

मुक्तिबोध शृंखला : 9

पढ़ रहा था मुक्तिबोध को और भटक गया अज्ञेय की ओर. दोष मेरा जितना नहीं उतना नामवर सिंह का है. “साहित्यिक की डायरी” की समीक्षा करते हुए अज्ञेय से उनकी तुलना करते हुए नामवरजी ने उनमें देखी है ‘अमानुषिकता की हद को छूनेवाली कलात्मक निःसंगता.’ वे ‘साहित्यिक की डायरी’ के आस पास ही प्रकाशित होनेवाली अज्ञेय की कृति ‘आत्मनेपद’ को पढ़ते हुए दो कवि व्यक्तित्वों को अगल बगल रखने को कहते हैं. एक है, यानी मुक्तिबोध: ‘सामाजिक स्तर पर एक नितांत सामान्य निम्न मध्य वर्गीय पारिवारिक प्राणी’. उसके लिए ‘कविता अलग से किसी साधना की चीज़ नहीं, बल्कि जीने की ही जटिल प्रक्रिया का ही एक सहज अंग है.’  दूसरी तरफ  ‘आत्मनेपद’ से उभरता है एक शब्दसाधक ‘एस्थीट’ अथवा सौंदर्यजीवी का रूप. वह एक ‘दायरे में जीवन से पूरी तरह संसक्त होते हुए भी अपने रचना जगत में सर्वथा निःसंग है.’

नामवरजी भी कोई कम बड़े शब्द साधक नहीं. साहित्य अगर शब्द साधना नहीं तो कुछ भी नहीं. बेगुसराय के उनके एक व्याख्यान का जिक्र नंदकिशोर नवल प्रायः किया करते थे जिसमें ‘क्रांतिकारी’ साहित्यकारों को झिड़की देते हुए उन्होंने कहा था, ‘जो दो वाक्य सुंदर नहीं बना सकते वे समाज क्या ख़ाक सुंदर बनाएँगे!’ लेखक या साहित्यकार होता ही शब्दसाधक है. यही तो उसका कार्य है, अगर हम कर्तव्य नहीं कहना चाहते मुक्तिबोध के कारण. मुक्तिबोध कर्तव्य के मोहल्ले के वासी नहीं बने रहना चाहते, वे कार्य के विस्तृत मैदान में विचरण करना चाहते हैं. मुक्तिबोध के सम्पूर्ण जीवन का कार्य व्यापार अगर शब्दों की साधना नहीं, सौंदर्य का संधान नहीं तो और क्या है! नामवरजी की समीक्षा में मात्र यह एक वाक्य है जिसमें मुक्तिबोध का महत्त्व स्थापन करने के लिए वे अज्ञेय पर आक्रमण आवश्यक मानते हैं.

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‘No More Poor People In a Rich Country’ – What Will Peru’s Left Victory Mean?

Supporters of Left Presidential candidate Pedro Castillo on the streets, image courtesy Reuters

Supporters of Left Presidential candidate Pedro Castillo take to the streets, image courtesy BBC and Reuters

It seems quite clear from the latest reports coming in from Peru that the Left-wing candidate Pedro Castillo is all set to win in what has been described as the most polarized election till date. With over 99 percent of the ballots counted, Castillo had taken a lead of approximately 80, 000 votes (50. 2 of the total) over his Right-wing rival Keiko Fujimori. The counting process, reports say, has already been considerably slowed down as ballots seem to be still arriving from abroad as well as from the remote rural areas. Votes of expatriates arriving from abroad are mostly right wing votes for Fujimori whereas the ones from the rural areas are likely to be overwhelmingly for Castillo. There also seem to be a huge number of contested votes that might need to be recounted, further slowing down the process.

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समाज और व्यक्ति की लयतालता

मुक्तिबोध शृंखला : 8

कवि अपने जीवन में एक ही कविता बार-बार लिखता रहता है, जैसे कथाकार एक ही कहानी कहता है. मुक्तिबोध की खोज क्या है जो उनकी हर कविता, कहानी, निबंध, आलोचनात्मक निबंध में अनवरत चलती रहती है? क्या वह सम्पूर्णता की तलाश है? क्या वह एक विशाल जीवन (जिसे वे एक जगह immense लिविंग कहते हैं) की खोज है, उसे जीने के उसूल और तरीके का पता करने की तड़प है? विशाल जीवन या भरपूर ज़िंदगी! वह क्या है?

भरपूर ज़िंदगी या परिपूर्ण जीवन वह है जो मानवीय अनुभवों की विविधताओं से बुना गया हो? जो इकहरा न हो, जो कह सके कि हाँ! मैंने दुनिया देखी है. देखी ही नहीं, उसे अपनी हड्डियों और खून में महसूस भी किया है. ज़िंदगी को देखना, भोगना एक चीज़ है और उसके साथ मायने के रिश्ते बनाना अलग चीज़. ऐसा रिश्ता जिसमें वह ज़िंदगी भी आपसे मायने हासिल करती है.

“मानव जीवन-स्रोत की मनोवैज्ञानिक तह में” मुक्तिबोध इस विशालता के रास्ते में रुकावट मानते हैं उस अंतर को जो जीवन और जगत के बीच है. क्या इसका मतलब यह है कि जगत को मेरा जीवन हो जाना चाहिए या मेरी ज़िंदगी का फैलाव इतना हो कि उसमें दुनिया के होने का गुमान हो? फिर जगत है क्या?

“क्या यह जगत केवल बाज़ार की सडकों पर घूमनेवाले, खरीदने के लिए आतुर जन-समुदाय, या सरकारी दफ्तरों में बैठनेवाले कृत्रिम महान् मनुष्यों तक ही सीमित है? इनसे बाहर, इनसे परे क्या जगत का फैलाव नहीं है?”

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Who Feels the Pain of the Injured?

India’s most prominent sports and entertainment figures have to traverse a long distance to achieve true greatness.

Who feels the Pain of the Injured?

Representational Image. Image Courtesy: Freepik

The racial bias in the American education system came under the scanner recently from an unexpected quarter. The occasion was a series of events to mark the 100th anniversary of an organised massacre of Blacks in Tulsa, Oklahoma, in 1921. Mobs of violent white supremacists had destroyed the prosperous black Greenwood neighbourhood in a well-planned and predetermined manner, many aided and abetted by city officials, who provided arsonists with weapons. Actor-filmmaker Tom Hanks, regarded as an American cultural icon, underlined the conspiracy of silence in the school curriculum around this tragic race massacre in which 300 Black people died, and 10,000 became destitute or homeless.

In his essay, “You Should Learn the Truth about Tulsa Race Massacre”, published this month in the New York Times, Hanks unpacks the systematic cover-up of the massacre and other instances of racial bias and discrimination that the school education system papers over. He writes that white teachers and school administrators prioritise white feelings over Black experiences, which helps them omit “volatile” topics and preserve the status quo. Hanks has not limited his focus to the racial bias in the American education system but admits the role of Bollywood in shaping “what is history and what is forgotten”.

Have the icons of entertainment in India ever taken a leaf out of Hank’s book and searched their soul about the exclusions, discriminations and humiliations rampant in Indian society and their “industry”? For example, forty-two people, most of them Dalit women and children, were killed in the Thanjavur district of Tamil Nadu in 1969 by local landlords. The Kilvenmani massacre took place more than a half-century ago. On its fiftieth anniversary, a series of remembrance events were held across the country, not unlike the events that marked the Tulsa race violence. The Thanjavur killings are said to be the first massacre of their kind in independent India. No perpetrator of this attack ever got punished. The court held that since the alleged attackers belonged to the upper strata of society, it was difficult to believe that they had walked into the village…(Read the full text here))

चाहिए मैत्री भाव का पाथेय

मुक्तिबोध शृंखला:7

मुक्तिबोध को जो स्नेह और आदर अपनी 47 साल की मुख़्तसर-सी ज़िंदगी में मिला, उससे किसी भी लेखक को  ईर्ष्या हो सकती है. वार्धक्य, आयु आदि को लेकर मुक्तिबोध के समय की समझ के मुताबिक़ वे बुजुर्ग हो चुके थे. आज 2021 में यह सोचकर आश्चर्य ही हो सकता है कि अपने चौथे दशक में ही उस वक्त के लेखक भी किस तरह खुद को प्रौढ़ मानने लगते थे. लंदन से लौटे नौजवान सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज आनंद से प्रेमचंद की बातचीत याद आती है. वे ठहरे नौजवान और प्रेमचंद बूढ़े, उनके साथ दौड़ने पर कहीं उनके घुटने न फूट जाएँ! यह वयस-बोध उस वक्त की खासियत है. “मैं अकेला, देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य वेला.” निराला की उम्र इस कविता के समय आखिर कितनी थी?

उम्र के इस अहसास को समझना आज ज़रा मुश्किल है क्योंकि युवापन काफी लंबे समय तक हम सब पर हावी रहता है. एक बड़ा तबका खुद को प्रौढ़ मानने से इंकार करता रहता है. यह भी कह सकते हैं पिछली जिसे हो जाना चाहिए, वह पीढ़ी आसानी से जगह छोड़ने को तैयार नहीं होती. लेकिन मुक्तिबोध जल्दी ही आदरणीय के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे. तरुणों में उन्हें लेकर जो आदर था, वह उनके समवयसी लेखकों में भी था.

नरेश मेहता का 1957 का पत्र है. मुक्तिबोध की मृत्यु उनसे 7 वर्ष दूर है. नरेश मेहता नागपुर के उनके साथ गुजारे गए दिन याद करते हैं और उन्हें भी:

“पता नहीं कि आपमें वह कहाँ और कौन-सा आदर्श उत्स है जिसे धार कर आप गजानन नहीं गंगाधर हो जाते हैं और कदाचित् इसीलिए पहाड़ों में हिमालय, देवों में शंकर और समकालीन लेखकों में गजानन के प्रति ही मेरा मस्तक नत हो जाता है…”

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ज्ञान की सरहद को तोड़ना

मुक्तिबोध शृंखला 6

आलोचना आत्मपरकता से मुक्त दीखना चाहती है. भावना मुक्त. पसंद-नापसंद से परे वस्तुनिष्ठता की खोज. है तो लेकिन वह आखिर देखने की एक क्रिया. देखने का यह व्यापार क्या ‘दर्शक कौन है?’ के प्रश्न को परे कर सकता है? क्या यह देखनेवाले के कद पर निर्भर है? उसका फैसला कौन करेगा? क्या जो देखता है क्या खुद को देखते हुए देख सकता है? यानी जब हम दीखनेवाली वस्तु का वर्णन कर रहे हैं तो क्या अपने बारे में भी कुछ बता रहे हैं?  जो देखता है, वह दीखता भी तो है!

मुक्तिबोध की ‘साहित्यिक की डायरी’ को नामवर सिंह ने ठीक ही ‘एकालाप और संलाप’ कहा है. आप मुक्तिबोध को खुद से बात करते हुए देख, सुन सकते हैं. जो निबंध या टिप्पणियाँ ‘साहित्यिक की डायरी’ में संकलित हैं वे मात्र साहित्य के बारे में मुक्तिबोध के कतिपय निष्कर्ष नहीं हैं, वे साहित्य के विषय में सिद्धांत निरूपण भी नहीं. हालाँकि उसके सूत्र इनमें मौजूद हैं. विचार की प्रक्रिया में पाठक को शामिल करने की इच्छा इनके पीछे है. या शायद वह भी नहीं. यह एक तरह की विचार सजगता है. लेखक खुद अपनी विचार प्रक्रिया की ‘एम आर आई’ कर रहा है. आपके सामने फिर जो है वह इसकी तस्वीर है. इसलिए अलग-अलग टिप्पणियों में पूर्णता की तलाश व्यर्थ है. अपूर्णता या तदर्थता इनका स्वभाव है.

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ज्ञान के दाँत और ज़िंदगी की नाशपाती

मुक्तिबोध शृंखला : 5

“मुझे समझ में नहीं आता कि कभी-कभी खयालों को, विचारों को भावनाओं को क्या हो जाता है! वे मेरे आदेश के अनुसार मन में प्रकट और वाणी में मुखर नहीं हो पाते.”

यह क्या सिर्फ मुक्तिबोध का ही संकट है? हम सबके साथ यह होता है कि प्रायः वह जो इतना स्पष्ट लगता है जब तक अव्यक्त है, मौक़ा आते ही सिफ़र में तब्दील हो जाता है. कारण क्या अतिरिक्त आत्म सजगता है? क्या अतिशय आत्म-समीक्षा है? ऐसी लगातार चलनेवाली समीक्षा जो मन में उठनेवाले हर खयाल, हर भावना की चीरफाड़ करती रहती हो और उसे मुखरता के योग्य ही न पाती हो?

मुक्तिबोध इस आरोप को स्वीकार नहीं करते. वे इस असमंजस या अनिर्णय के लिए मन को जिम्मेदार मानते हैं जो अपने भीतर डूबा नहीं रहता, बल्कि एक नेपथ्य-संगीत का आयोजन करता चलता है. मन के नेपथ्य की यह कल्पना बहुत दिलचस्प है. नेपथ्य में चलनेवाला व्यापार मन के मंच पर चल रहे कार्य व्यापार में हस्तक्षेप करता है या उसे पूर्ण करता है? नेपथ्य में एक अलगाव है. वह जो आपसे अलग है लेकिन जुड़ा हुआ भी. इस नेपथ्य के प्रति संवेदनशील रहना आवश्यक है. वरना जो व्यक्त होगा, वह किसी के अभाव में पूर्ण या न्यायसंगत न होगा:

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The Tarun Tejpal Judgement – where do we go from here? Abhinav Sekhri

Guest post by ABHINAV SEKHRI

In a 2013 opinion piece, Professor Pratiksha Baxi wrote about the injustice that victims of sexual assault have historically suffered at the hands of the criminal process in India, reminding us that even those cases which forced our laws to change were stories of sexual assaults never proven before the eyes of law. That opinion piece was written in the wake of allegations in the case registered as State v. Tarun Tejpal, where on 21.05.2021, the Court of the Additional Sessions Judge at Panaji acquitted the accused on all charges, i.e. for alleged commission of offences under 376(2)(f), 376(2)(k), 354, 354A, 354B, 341, and 342 of the Indian Penal Code 1860.

The judgment has been critiqued on the court’s consideration of the victim’s testimony [see, for instance, here, here and here]. It appears that an appeal has been filed by the state challenging the acquittal, where the High Court has initially directed that sections of the judgment ought to be redacted as they reveal the identity of the victim.

This post does not attempt a microscopic review of the merits of the case, not only because an appeal is pending, but also because the judgment does not give a clear conspectus of the entire evidence on record to allow for such an exercise. Instead, while making some broad observations on the judgment (to the extent possible based on the evidence extracted) it brings up three issues that the judgment throws into sharp relief: (i) appreciating evidence, with a focus on witness credibility and the handling of inadmissible evidence at trial; (ii) consideration of digital evidence from victims in sexual assault cases, and; (iii) consequences of “bad” orders on the system itself.

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कितनी कठिन है न्याय्य मैत्री!  

मुक्तिबोध शृंखला:4

“जगत और जीवन में अंतर इतना! मनुष्य की अपनी आतंरिक मौलिक प्यास क्या यों ही अँधेरे में रह जाए सिसकती सी?”

“मानव जीवन-स्रोत की मनोवैज्ञानिक तह में” नामक निबंध में मुक्तिबोध मनुष्य की ‘अपनी आतंरिक मौलिक प्यास’ के न बुझ पाने का सवाल उठाते हैं. उन्होंने निश्चय ही कार्ल मार्क्स की “1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि” नहीं देखी है. लेकिन जगत और जीवन में जो अंतर वे कर रहे हैं, वह वही है जिसे मार्क्स हमारे वक्त की सारी व्याधियों की जड़ मानते हैं. यह अंतर एक अलगाव पैदा करता है. अजनबीयत. यह दुनिया पराई-सी जान पड़ती है और अपनी खुदी भी अलग हो गई मालूम होती है. एक समय के बाद मैं खुद को नहीं पहचान पाता.

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CPI (M)’s History of Moving Away from Committed Leftism from its Birth: Sankar Ray

Guest post by SANKAR RAY

History apparently allows freaks, whims and hypocrisy, but only temporarily. After all, Hegel as very succinctly stated, ‘History is a slaughter house’. It spares none, not excluding India’s once most powerful Leftist party in the parliamentary arena, Communist Party of India (Marxist) that once had 44 MPs in the lower house of Indian parliament, Lok Sabha. It now faces  a crisis of identity and existence. Hypocrisy and falsehood in politics and ideological positions have been two main reasons for the vertical decline of party’s influence and image.
Ten years ago,  Indranil Chakraborty in his Master’s thesis –“The Market Odyssey: Why and How Was ‘The Market’ Discourse Incorporated in the Party Program of the Communist Party of India (Marxist) During the Days of the Communist Party of China’s ‘Market Socialism’?” referred to CPI(M)’s open criticism of ‘the development of the personality cult of Mao( Tse Tung) , and the problem of left adventurism during the Cultural Revolution. He pointed out that the criticism evaded ‘the question of the relationship between socialism and democracy, and the role of the Chinese people in deciding policy matters of the state’.  He quoted Harkishan Singh Surjeet’s article in the party’s theoretical monthly, The Marxist in 1993 commemorating Mao’s birth centenary – ‘We cannot make a subjective analysis of a personality in cases where errors have been committed in the application of the theory to practice.’

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हार्दिक अंधकार की आँखें

मुक्तिबोध शृंखला : 3

“न नेमि बाबू, इस प्रकार तो काम नहीं चलने का. आखिर frustration है तो रहे, वह इतनी बुरी चीज़ नहीं जितना उसका gloom. …पर ज़रा सोचिए तो सही. कि ज़िंदा रहने का हक तो हमें है ही.”

मुक्तिबोध नेमिचंद्र जैन को हौसला दिला रहे हैं. उन दोनों के बीच पत्राचार में ऐसे मौके कम दीखते हैं. नेमिजी को वे गुरु मानते हैं. उन्होंने उन्हें मार्क्सवाद में दीक्षित किया है. मुक्तिबोध के पत्रों से नेमिचंद्र जैन की तस्वीर एक गंभीर ज्येष्ठ की उभरती है जो मुक्तिबोध के भीतर के उबलते लावा को पी रहा हो. यहाँ वे उन्हें हिम्मत दिला रहे हैं. इस पत्र का संदर्भ देने की आवश्यकता मुक्तिबोध रचनावली के संपादक नेमिचंद्र जैन ने महसूस नहीं की. क्या यह तार सप्तक के प्रकाशन के बाद उनपर हुए आक्रमण के कारण है? मुक्तिबोध के किसी निकटस्थ ने अपने संस्मरण में, यहाँ तक कि नेमिजी ने भी यह नहीं बताया.

हमारा मकसद इस पत्र के संदर्भ के संधान का नहीं है. अपने ज़िंदा रहने के हक पर जोर देते हुए मुक्तिबोध आगे अपने मित्र को समझाते हुए लिखते हैं,

“…लोग हमारी वैलिडिटी नहीं मानते तो न मानें. अभी हमने किया ही क्या है? हम अभी पुस्तक के भाव हैं — अलिखित पुस्तक हैं. अभी से उसपर आलोचना कैसी?”

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मुक्तिबोध के ‘नौजवान का रास्ता’

मुक्तिबोध शृंखला:2

“मैं कुछ शिकायत करना चाहता था इस दुनिया के खिलाफ लेकिन मैं रुक गया, सोचते हुए कि आखिर मैं अपने को दुनिया से अलग क्यों मान लूँ. दुनिया का खाकर, दुनिया का पीकर, दुनिया के मनुष्य से प्रेम कर, उससे अलग समझना अपने स्व को ज़रूरत से अधिक ऊँचा रखना है—दुनिया ने हमको बनाया, अब हमीं दुनिया को बनाएँगे.”

‘आधुनिक समाज का धर्म’ नामक टिप्पणी की शुरुआत यों होती है. यह आत्मविश्वास कि हम इस दुनिया को बना सकते हैं इस विनम्रता से संयमित किया जाता है कि उसके साथ ही खुद को बनाने की जिम्मेवारी भी है. उसके साथ पहली शर्त इस ज़िंदगी से मोहब्बत. ‘नौजवान का रास्ता’ के आरम्भिक अंश की पंक्तियाँ हैं,

“ज़िंदगी बड़ी खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं. अच्छे आदमी क्यों दुःख भोगें—इतने नेक और इतने अभागे. दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब ज़िंदगी बहुत खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं.”

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