How Might a Feminist Respond to a Collegial Mansplaining of Feminism? Anannya Dasgupta

Guest post by ANANNYA DASGUPTA

Scroll had recently featured the Foreword to a book, with the heading ‘What do allies write about when they write (poetry) about feminism?’ The descriptive tag read – Saikat Majumdar surveys a unique anthology in his Foreword to ‘Collegiality and Other Ballads’. What makes this anthology unique? Sometime in 2020, Shamayita Sen had circulated a call ‘seeking poems on feminist ideology’ from ‘non-women’. I remember thinking, surely the call will be revised; feminist allies must know that there is a problem with excluding women from a space meant to check the pulse of contemporary feminisms. Besides, who is non-woman enough to want to be a part of such a man-book? While the premise of the book was not revised, the category ‘non-woman’ has been. The title page of the anthology now reads: Collegiality and Other Ballads with a tag – feminist poetry by males and non-binary allies. The opening line of Majumdar’s Foreword adds to the uniqueness of this mostly male-only feminist anthology by attributing uniqueness to feminism itself: ‘Feminism is the name of a unique battle.’

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विराट की सौंदर्याभा के जल का स्पर्श!

मुक्तिबोध शृंखला:22

“… पहली कठिनाई यह है कि इस युग का संगीत टूट गया है और जिस निश्चिंतता के साथ लोग अब तक गाते और छंद बनाते आए थे, वह निश्चिंतता तेरे लिए नहीं है।

“…. भावों के तूफ़ान को बुद्धि की जंजीर से कसने की उमंग कोई छोटी उमंग नहीं है। तेरी कविता के भीतर जब भी तेरे दिमाग की चरमराहट सुनता हूँ, मुझे भासित होने लगता है, काव्य में एक नई लय उतर रही है, जो भावों के भीतर छिपकर चलनेवाले विचारों की लय है, जो कवि से एककार होकर उठनेवाले विचारों का संगीत है।

“… जब नीति और धर्म की मान्यताएँ सुदृढ़ होती हैं और लोगों  को उनके विषय में शंका नहीं रह जाती, तब साहित्य में क्लासिकल शैली का विकास होता है। … जब वायु असंतुष्ट और क्रान्ति आसन्न होती है, तब साहित्य की धारा रोमांटिक हो उठती है। … किन्तु तू जिस काल-देवता के अंक में बैठा है, उसकी सारी मान्यताएँ चंचल और विषण्ण हैं तथा उन्हें इस ज्ञान से भी काफी निराशा मिल चुकी है कि रोमांस की राह किसी भी निर्दिष्ट दिशा में जाने की राह नहीं है। … तू क्लासिकल बने तो मृत और रोमांटिक बने तो विक्षिप्त हो जाएगा। तेरी असली राह वही है जो तू अपनी अनुभूतियों से पीटकर तैयार कर रहा है।” (रामधारी सिंह दिनकर)

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Salaam Father Stan Swamy! Warrior for the soul of India

Numb and wordless in grief, filled with rage against the murderous regime of the RSS, led by Modi and Shah, we raise our fists in salute to a gentle, inspiring man.

Here is the statement  Stan Swamy made on the eve of his arrest by the NIA, stating that false evidence had been planted on his computer.  That this had indeed been done on a large scale to arrest people in the Bhima Koregaon case was soon established by an independent digital forensics firm based in the USA.

This is a criminal regime and the Prime Minister and the Home Minister should stand trial for war crimes against the people of India.

The fight will continue!

Release all political prisoners!

हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है

मुक्तिबोध शृंखला:21

जीवन में अनाह्लाद उत्पन्न होता है अगर हम उसे तत्त्व प्रणाली से बाँधने की कोशिश करें। सैद्धांतिक आत्मविश्वास एक प्रकार की ट्रेजेडी है क्योंकि वह जीवन की पेचीदगी के प्रति पूरी तरह लापरवाह होता है। वह अपने सिद्धांत की काट में जीवन को फिट करने की कोशिश करते हुए उसकी हत्या कर डालता है। जीवन जीने में ही आह्लाद है। कहीं किसी अंतिम बिंदु पर पहुँच जाने में नहीं। प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास, खुशी सच्ची कब है? जब वह स्वार्थ से परे जलनेवाली, असंतोष की वह्नि हो। स्वार्थमय प्रसन्नता निश्चय ही निःस्वार्थ प्रसन्नता से हीन है।

मुक्तिबोध की कविता में हर्ष और आह्लाद के क्षणों की भरमार है। ‘हरे वृक्ष’ कविता में सहचर मित्रों-से हरे वृक्ष की हरी आग हृदय के तल को डँस लेती है और

इनके प्राकृत औदार्य-स्निग्ध

पत्तों-पत्तों  से

स्नेह-मुग्ध

चेतना

प्राण की उठी जाग।”

उदारता से स्निग्ध पत्तों से स्नेह-मुग्ध चेतना जगती है। विशेषण मुक्तिबोध को बहुत प्रिय हैं और उनकी भाषा में जो ऐन्द्रिकता और मांसलता है, वह उस कारण भी है। वह विशेषणों से समृद्ध है। हेमिंग्वे परिश्रमपूर्वक विशेषण रहित गद्य में उपन्यास लिखना चाहते थे। मुक्तिबोध का काम उनके बिना नहीं चलता।  उन विशेषणों से ही वे उन भावों की रचना कर पाते हैं जो नितांत, उत्कट रूप से मानवीय हैं।

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अंगार-राग और मधु-आवाहन

मुक्तिबोध शृंखला: 20

मुक्तिबोध मृत्युशैय्या पर थे। उनके तरुण प्रशंसक मित्र उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित करने की तैयारी कर रहे थे। मुक्तिबोध के जीवन काल में ही यह हो रहा था लेकिन वे उसे प्रकाशित देखनेवाले न थे। नाम क्या हो किताब का? अशोक वाजपेयी ने इस घड़ी का जिक्र कई बार अपने संस्मरणों में किया है। श्रीकांत वर्मा और उन्हें यह तय करना था। खुद मुक्तिबोध जो नाम चाहते थे, वह था ‘सहर्ष स्वीकारा है।’ अशोकजी ने लिखा है,

हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध से जिस अनुबंध-पत्र पर दस्खत कराए थे, उसमें उनके पहले कविता संग्रह का शीर्षक था: सहर्ष स्वीकारा है। बाद में हमलोगों यानी नेमिजी, श्रीकांत वर्मा और मुझे लगा कि उनकी कविता में हर्ष और स्वीकार दोनों ही ज़्यादातर नहीं हैं, कोई और शीर्षक होना चाहिए। अंततः हम चाँद का मुँह टेढ़ा हैपर सहमत हुए।”

मुक्तिबोध इस पर कोई राय देने की हालत में न थे। कविता-संग्रह इसी नाम से छपा। मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद दिल्ली में हुई गोष्ठी में अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध पर अंग्रेज़ी में एक निबंध पढ़ा जो बाद में हिंदी में ‘भयानक खबर की कविता’ शीर्षक कविता से छपा। कविता संग्रह के इस शीर्षक ने और खुद मुक्तिबोध के अपने मित्रों ने मुक्तिबोध के बारे में एक धारणा बन जाने में जाने-अनजाने (?) मदद की: यह कि मुक्तिबोध भयावह, भयंकर, अस्वीकार, संघर्ष और क्रांति के कवि हैं।

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Hul Dibosh Convention by Ekusher Dak (Call of 21) Marks Anniversary of Santhal Rebellion

Poster in Santhali language for the Convention

We had reported earlier on the call for a convention to commemorate the anniversary of the historic Santhal Rebellion associated the immortal names of Sidhu and Kanu. The convention was organized by the recently constituted forum in West Bengal, Ekusher DakCall of 21 – which was formed in the run up to the recently held elections in the state. ’21’ of course, refers to the year 2021 when the elections were held and the initiative for a new/ different Left platform in the state was launched. But ’21’ also recalls the date 21 February 1952, the historic day of the Bhasha Andolan (the Language Movement) in what is now Bangladesh. It recalls the assertion of Bengali identity that overrides the religious divide that the BJP made every effort to exacerbate. The convention was held yesterday and really came like a whiff of fresh air. The film we embed below is a very short but powerful telling of the story of the revolt with graphics. Ekusher Daak Film Team – Arjun, Debalina, Maroona, Boro, Laboni, Malay, Mitali, Arundhati, Saikat, Baijayanta, and Swarnava -have produced the film. For those who would like to watch the proceedings of the Convention, the YouTube streaming link is here.

The film on Hul Dibosh

क्या इस तरह भारत में कोरोना कभी ख़त्म होगा? राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

पंद्रह दिन एक व्यस्क मरीज़ के साथ कोरोना वार्ड में गुज़ार के जब मैं अपने शहर पहुंचा तो पाया कि मेरे सैक्टर को ही कन्टेन्मन्ट ज़ोन बना रखा था. कन्टेन्मन्ट ज़ोन यानी ऐसा इलाका जिस में आने-जाने के रास्ते बंद किये हुए थे ताकि कोरोना पीड़ित इस सैक्टर में आवाजाही न हो सके. यह दावा कि मैंने 15 दिन कोरोना वार्ड में अपने मरीज़ के साथ गुज़ारे उन लोगों को अविश्वसनीय लग सकता है जो बड़े शहर के बड़े हस्पताल में दाखिल अपने कोरोना पीड़ित मरीज़ से संपर्क करने को तरसते रहे हैं. परन्तु यह सच है. मैंने भी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि कोरोना मरीज़ की देखभाल के लिए मुझे उस के साथ हस्पताल में रहना पड़ सकता है.  सरकार की कोरोना नीति की बहुत सारी आलोचना मैंने पढ़ी-सुनी और की थी पर मुझे इस का अहसास नहीं था कि बाकी मरीजों की तरह हस्पताल में दाखिल अपने कोरोना मरीज़ की देखभाल भी खुद करनी होती है. सच में भारत धुर विसंगतियों का देश है. एक ओर हमारी सरकार पूरे इलाके को ‘कन्टेनमेंट ज़ोन’ (नज़रबंद इलाका) घोषित कर सकती है ताकि वहां से कोरोना पीड़ित दूसरी जगह जा कर संक्रमण को फैला न सकें और दूसरी ओर हस्पताल में कोरोना पीड़ित मरीज़ की देखभाल के लिए किसी परिजन को उस के साथ रहना पड़ता है. चौबीस घंटे तो कोई एक व्यक्ति मरीज़ की देखभाल कर नहीं सकता था. इस लिए हम दो लोग अपने परिजन की देखभाल के लिए उस के साथ शिफ्टों में रहते थे जिस के चलते हमारा कोरोना वार्ड से घर आना जाना लगा रहता था. इस से न केवल हम परिचारकों के संक्रमित होने का ख़तरा था अपितु नियमित तौर पर घर आने जाने के कारण हम और लोगों को भी संक्रमित कर सकते थे.

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मनुष्यता: भाव और अभाव

मुक्तिबोध शृंखला:19

‘स्व’ के प्रश्न से मुक्तिबोध जीवन भर जूझते रहे। स्व के प्रति सचेत होना व्यक्ति बनने के लिए अनिवार्य है। और व्यक्तित्व तो उसके बाद ही बन सकता है। लेकिन वह क्या आसान है? उसमें बहुत मेहनत है। कौन इस पचड़े में पड़े? उससे बेहतर है खुद को भूल जाना। भूल जाने के खूबसूरत तरीके या बहाने खोजना भी क्या इतना मुश्किल है? एक अधूरी टिप्पणी में मुक्तिबोध लिखते हैं,

“कुछ बुद्धिमान कहते हैं कि भीड़ में व्यक्तित्व खो जाता है। लेकिन मैं कहता हूँ कि इसमें बुराई क्या है। मुझे तो भीड़ में अपने से मुक्ति मिल जाती है। चहल-पहल,रौनक, रफ़्तार,और शोर में ही क्यों न सही, खुद का भूलना तो होता ही है।”

यह भरम कई तरीकों से पैदा किया जा सकता है। आप कह सकते हैं कि मैं तो समाज में लगा हुआ हूँ, कोई  कह सकता है कि मैं राजनीति में व्यस्त हूँ और मुक्तिबोध व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि कलाकार भी खुद को इस धोखे में रख सकते हैं,

“बहुत से लेखक और कलाकार अपनी चेतना को इस तरह जगाते हैं कि निजी व्यक्तित्व आँखों से ओझल हो जाता है। यह तो कहने की बातें हैं कि हम उच्चतर स्तर पर जागे हुए हैं।”

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The Call of ’21 (একুশের ডাক) – A Novel Campaign and a Nucleus of the New

We publish a document ‘Demands of the People’ adopted by a novel campaign Ekusher Dak in West Bengal that has the potential to emerge as the nucleus of a new Left formation in the state. The draft document in Bangla is appended at the end of this post. Tomorrow, 30 June, Ekusher Dak or the Call of 21 will be organizing a programme, recalling the great Santhal Hool or the revolt of 30 June 1855.

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मैं बदल चला सहास, दीर्घ प्यास

मुक्तिबोध शृंखला:18

स्व का निर्माण, सृजन, परिष्कार आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है। स्व स्वायत्त है लेकिन अपने आप में बंद नहीं। उसकी प्राणमयता उसकी गतिशीलता में है। वह कभी भी पूरा बन नहीं चुका होता है। उसके अधूरेपन का अहसास क्या उसे निर्बल  करता है या उसे चुनौती देता है कि वह अपना विस्तार करता रहे?  ‘रबिन्द्रनाथ’ शीर्षक कविता में स्व की इस अनंत यात्रा को इस प्रकार प्रकट किया गया है:

“मैं बदल चला सहास

दीर्घ प्यास

मुझे देखना अरे अनेक स्थान

अभी मुझे कई बार मरण, और प्राण प्राप्त

कई बार शुरुआत, कई बार फिर समाप्त

मुझे अभी गूँजना क्षितिज तीव्र वायु

मुझे अभी अनेक पर्वतों-उभार पर अनेक साँझ बहुत प्रात

देखना। अपूर्ण आयु।

(अ)पूर्ण उर, अपूर्ण स्वर!”

यह कई बार का मरना क्या हो सकता है? कई बार मरकर फिर नए प्राण प्राप्त करना? यह एक नई ज़िंदगी हासिल करने की बड़ी प्यास है जो कभी बुझती नहीं? आत्मा की यात्रा जिसका कोई अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। उसमें तृप्ति नहीं है। पूर्णता का अहंकार नहीं है।

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यह असंतोष की वह्नि स्वार्थ से परे रही

मुक्तिबोध शृंखला:17

‘अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है’, इस पंक्ति पर ध्यान अटक गया। क्या अँधेरे वतन की बात की जा रही है? या अँधेरे की जो कवि का ख़ास वतन है? क्या इस अँधेरे को आग लग जाती है?  वह अँधेरा को कवि का स्वदेश है? मुक्तिबोध का जिक्र आते ही अँधेरा पहला शब्द है जो मन में उभरता है। अँधेरे के साथ और जो भाव आ सकते हैं, वे भी। आशंका, भय, असुरक्षा, आतंक! एक दूसरे प्रसंग में मुक्तिबोध अँधेरे के साथ अपने रिश्ते की बात कुछ इस तरह करते हैं:

“… मेरे लिए अन्धकार तो एक आकर्षण है। अतएव मैं इस ध्वांत  को चीरकर उसके सौंदर्य को नष्ट नहीं करना चाहता। मैं तो वस्तुओं को टटोलना चाहता हूँ और उन्हें वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसे वे हाथों को लग रही हैं।”

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अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है

मुक्तिबोध शृंखला:16

‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न से होता है कि वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो हमें आपको पालतू भालू बन्दर बनाकर नचाती रहती है। किसके हाथ हमारे गले के पट्टे की चेन है। हमारे ‘मैं’  की हत्या किस तरह कर दी जाती है। किस तरह हमें गुलामी बर्दाश्त करना सिखलाया जाता है। हम खुद इस दासता को न सिर्फ सहते हैं बल्कि दूसरों को उसमें दीक्षित करना अपना कर्तव्य मानने लगते हैं। जो अनुकूलित होने से इनकार करे, हमें अपना शत्रु नज़र आने लगता है और हम उसकी हत्या होते देखते ही नहीं, कई बार खुद उसकी हत्या को तैयार हो जाते हैं। चलते फिरते शिरविहीन कबंधों का यह संसार कितना उदास और कितना भयावह है। चारों ओर जाने कितने हताहत व्यक्तित्व हैं। कितने सत्यों की भ्रूण हत्या कर दी गई है।

मुक्तिबोध की शिकायत इस ज़माने से इसी वजह से है। प्रकृति ने मनुष्य के रूप में जिस संभावना को गढ़ा, मानव के रूप में जो स्वप्न देखा उसका ऐसा अनादर कैसे सहन किया जा सकता है?  उनकी कविता  “आ-आकर कोमल समीर!” में यह दुख इस प्रकार प्रकट होता है:

    “नित देख-देख उद्ध्वस्त शिखर जीवन के, जन के

  मैं आहत हो गया,

  प्राण का श्वास रुक गया।”

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‘Joblessness’ In The Post-Employment World – Urgent Need for Paradigm Change

Job seekers at a job-fair in Chinchwad, 2019, Image courtesy Reuters/ Danish Siddiqui

The ‘unemployment’ question, let us put it bluntly, is not just an innocent and neutral question today but a key arena of class war – the war of Capital on society at large. Capital has its plans but does “society” have one?

Enter the Post-Employment World

It was reported last week that top IT sector companies like TCS, Infosys, Wipro, HCL, Tech Mahindra and Cognizant are likely to slash 3 million jobs by next year. With large-scale resort to Artificial Intelligence (AI) based “robot process automation” (RPA), these companies, by shedding these jobs are expecting to “save a whopping USD 100 billion, mostly in salaries, annually” says the Indian Express report linked above. Citing NASSCOM (National Association of Software and Service Companies) the report tells us that the domestic IT sector employs around 16 million, of whom “around 9 million are employed in low-skill and BPO roles.”

Of these 9 million low-skilled services and BPO roles, 30 per cent or around 3 million will be lost by 2022, principally driven by the impact of robot process automation or RPA. Roughly 0.7 million roles are expected to be replaced by RPA alone and the rest due to other technological upgrades and upskilling by the domestic IT players, while it the RPA will have the worst impact in the US with a loss of almost 1 million jobs, according to a Bank of America report on Wednesday.”

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इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

मुक्तिबोध शृंखला : 15

‘पक्षी और दीमक’ कहानी में अपने पंख देकर दीमक मोल लेने वाले पक्षी की त्रासदी हमारी-आपकी, सबकी हो सकती है। कहानी सुनाते- सुनाते और उसके अंत तक पहुँचते ही ‘मैं’ को धक्का-सा लगता है। जब आप एक एक कर अपने पंख देते जाएँ तो फिर एक दिन रेंगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। पक्षी को तंबीह की गई थी कि दीमक उसका स्वाभाविक आहार नहीं। और कुछ हो, पक्षी को अपने पंख नहीं देने चाहिए। लेकिन उसे तो दीमक की चाट लग गई। फिर दीमक बेचनेवाले गाड़ीवान को दो दीमकों के बदले अपना एक पंख देने की उसकी आदत पड़ गयी। एक-एक कर अपने पंख गँवाते हुए वह उड़ने की ताकत खो बैठा। और फिर एक दिन एक बिल्ली का ग्रास बन गया।

कहानी के अंत तक पहुँचकर कहानी सुनानेवाले को धक्का लगता है। उसे जान पड़ता है कि कहीं वह अपनी ही कहानी तो नहीं कह रहा! वह संकल्प लेता है कि वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।

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जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

मुक्तिबोध शृंखला : 14

‘पक्षी और दीमक’ मुक्तिबोध के पाठकों की जानी हुई कहानी है। लेकिन जैसा मुक्तिबोध की कई रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है, इस कहानी में दो कहानियाँ हैं। और उनके बीच एक आत्म-चिंतन जैसा भी।

कहानी एक कमरे में शुरू होती है। लेकिन वह जितना कमरा है उतना ही किसी का मन भी हो सकता है। एक कमरा जिसके बाहर चिलचिलाती धूपभरी दोपहर है लेकिन भीतर ठंडी हलकी रौशनी। बाहर और भीतर के बीच सिर्फ एक खिड़की नहीं है, काँटेदार बेंत की झाड़ी और उससे लिपटी हुई बेल। मुक्तिबोध की रचनाओं को जन-संकुल माना जाता रहा है लेकिन कुदरत, जैसा हम पहले भी नोट कर आए हैं, उनकी बनावट को तय करती है। यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के बिना मुक्तिबोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह उनसे उसी कदर गुँथी हुई है जैसे इस बेंत की झाड़ी से यह बेल।

“बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।”

एक साथ इसमें कई संवेदनाएँ हैं- धूप की चिलचिलाहट का अनुमान, मद्धम उजाले की शीतलता, खिड़की का खुलापन, काँटेदार बेंत और आसमानी फूल।

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फिलिस्तीन के नाम क्षमा पत्र : मनोज कुमार झा

Guest Post: Manoj Kumar Jha

प्रिय फिलिस्तीनवासियो,

    हम चाहते हैं कि आप इस पत्र को करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दुःख और पछतावे की अभिव्यक्ति की तरह पढ़ें  जो हमें सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में प्रस्तुत किए गए फिलिस्तीन के प्रस्ताव में अनुपस्थित होने का है। हम न केवल गाजा पट्टी में हुई व्यापक हिंसा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव से अलग रहे,बल्कि हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों ने भारत-फिलिस्तीन के सम्बन्धों की उस समृद्ध विरासत से मुँह मोड़ लिया जो इतिहास के अनेक उतार चढ़ाव भरे दौरों में भी अक्षुण्ण रही है।

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क्लॉड ईथरली होने की संभावना

मुक्तिबोध शृंखला : 13

‘क्लॉड ईथरली’ मुक्तिबोध के पाठकों के लिए परिचित कहानी है. कहानी का पात्र मात्र क्लॉड ईथरली नहीं है. एक पात्र है लेखक. वह मुक्तिबोध भी हो सकता है और सिर्फ मुक्तिबोध की एक कृति भी. दूसरा एक जासूस. और तीसरा और केंद्रीय पात्र क्लॉड ईथरली. कहानी या उपन्यास पढ़ते वक्त हमारा ध्यान मात्र मानवीय पात्रों पर और उनके बीच घटित होनेवाले प्रसंगों पर टिका रहता है. बार-बार ध्यान दिलाया गया है कि कथा में उतनी ही भूमिका या उससे कम नहीं, उसकी होती है जिसे परिवेश कहा जाता है. हर कहानीकार के बारे में यह न भी कहा जाए तो मुक्तिबोध जैसे कथाकारों को बिना उस परिवेश के समझना संभव नहीं.

इस कहानी की शुरुआत में लेखक का ध्यान तेज धूप में चमकती एक ऊँची दीवार की तरफ जाता है. लेकिन वह सिर्फ दीवार ही नहीं देखता,

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कस्बे में ब्रह्माण्ड

मुक्तिबोध शृंखला : 12

“किसी और कवि की कविताएँ उसका इतिहास न हों, मुक्तिबोध की कविताएँ अवश्य उनका इतिहास हैं. जो इन कविताओं को समझेंगे उन्हें मुक्तिबोध को किसी और रूप में समझने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, ज़िंदगी के एक-एक स्नायु के तनाव को एक बार जीवन में दूसरी बार अपनी कविता में जीकर मुक्तिबोध ने अपनी स्मृति के लिए सैंकड़ों कविताएँ छोड़ी हैं और ये कविताएँ ही उनका जीवन वृत्तांत हैं.”

श्रीकांत वर्मा ने मुक्तिबोध के पहले संग्रह की भूमिका में यह लिखा है. साहित्य पढ़नेवाले जानते हैं कि लेखन और लेखक में घालमेल के कई खतरे हैं. लेखन का प्रमाण या उसके सूत्र लेखक के जीवन में खोजने से हम गलत नतीजों पर पहुँच सकते हैं. कई बार रचना रचनाकार के खिलाफ भी होती है. वह खुद अपने जीवन की आलोचना अपनी रचनाओं में करता हो सकता है. मुक्तिबोध ने खुद रचना के जन्म की प्रक्रिया पर लिखते हुए उसे उस बेटी की तरह बतलाया है जिसकी नाभिनाल कट जाने के बाद वह अपने रचनाकार से स्वतंत्र जीवन प्राप्त कर लेती है. कई बार जैसे संतानें पिता-माता की सबसे बड़ी आलोचक हो जाती हैं, वैसे ही रचना और रचनाकार का रिश्ता भी हो सकता है. अंतर्विरोध का सिद्धांत रचना को समझने में एक सीमा से आगे मदद नहीं करता.

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Sushant Singh Rajput, Hindu Rashtra and Bollywood

A slightly longer version of this post was published under a different title in  Southasia Multidisciplinary Academic Journal (Issue 24/25, 2020)

A young, successful, Hindi film actor died in tragic circumstances.  What followed was a sensational real life movie, scripted in the headquarters of Hindu Rashtra, as part of its larger campaign to control the cultural arena.

Sushant Singh Rajput was found hanging in his bedroom in a Mumbai flat in June 2020, and it was initially declared as suicide by the Mumbai police. Within days however, the hashtag Justice for SSR started trending, and suddenly thousands of devoted and inconsolable fans had sprung up all over social media, all attacking “Bollywood” (the Bombay film industry) for its “nepotism” which had deprived a talented actor of work, driving him to suicide. “Boycott Bollywood” was a key theme in this frenzied outpouring of apparent grief.  From here it escalated to claims that Rajput had been murdered, and that a drug cartel linked to Bollywood stars was involved in the crime. Soon these claims were all that one could see on social media, and on some Hindi, Marathi and English television channels, specially Republic and Times Now, which specialize in sensationalist and blatantly pro-Hindutva political reportage, including fake news (for one instance see Bajpai 2020). Continue reading Sushant Singh Rajput, Hindu Rashtra and Bollywood

मुक्तिबोध की भाषा : स्निग्धता और शक्ति का मेल

मुक्तिबोध:11

मुक्तिबोध की भाषा : स्निग्धता और शक्ति का मेल

मुक्तिबोध ने नेमिचंद्र जैन को लिखे पत्र में एक ध्वस्त किले के मलबे के बीच उगती वन्य वनस्पतियों  के रूप में अपनी कल्पना की थी. ‘हरे वृक्ष’ शीर्षक कविता इस पत्र के आस-पास लिखी गई मालूम पड़ती है :

ये हरे वृक्ष

सहचर मित्रों-से हैं बाँहें पसार

(ये आलिंगन-उत्सुक बाँहें फैली हज़ार)

अपने मर्मर अंगार-राग

से मधु-आवाहन के स्फुल्लिंग 

बिखरा देते हैं बार-बार..

डँस जाती है हृत्तल इनकी यह हरी आग.

यह स्नेहामंत्रण है. अपने को मिटा देने का, किसी विराट् में विलीन कर देने का आवाहन नहीं है. खुद को नया करने करने के लिए आवश्यक है मित्रता, कोई ऐसा जिसमें आपको सुनने की धैर्योत्सुकता हो. जो आपको आत्म-समीक्षा की राह पर ले जाए, लेकिन वह होगा ‘परसुएशन’, न कि भर्त्सना. इसीलिए तो पेड़ से स्फुल्लिंग बिखर रहे हैं. यह आग दिल के भीतर तक पहुँच जाती है. इसमें जलन है लेकिन प्रकाश भी है. ध्यान दिया जाना चाहिए कि आग हरी है.

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ध्वस्त किले में उगती वन्य वनस्पति

मुक्तिबोध शृंखला : 10

कहते हैं लोग-बाग बेकार है मेहनत तुम्हारी सब

कविताएँ रद्दी हैं.

भाषा है लचर उसमें लोच तो है ही नहीं

बेडौल हैं उपमाएँ, विचित्र हैं कल्पना की तस्वीरें

उपयोग मुहावरों का शब्दों का अजीब है

सुरों की लकीरों की रफ्तार टूटती ही रहती है.

शब्दों की खड़-खड़ में खयालों की भड़-भड़

अजीब समां बाँधे है!!

गड्ढों भरे उखड़े हुए जैसे रास्ते पर किसी

पत्थरों को ढोती हुई बैलगाड़ी जाती हो.

माधुर्य का नाम नहीं, लय-भाव-सुरों का काम नहीं

कौन तुम्हारी कविताएँ पढ़ेगा

मुक्तिबोध को प्रायः दुरूह कवि माना जाता रहा है. उनकी भाषा पर ऊबड़खाबड़पन, अनगढ़पन और शब्दबहुलता का आरोप लगाया जाता रहा है. प्राय: उनकी राजनीति के कारण मुक्तिबोध के प्रशंसक भी उनकी भाषा को लेकर असुविधा का अनुभव करते रहे हैं.  इसके पीछे कविता की एक विशेष समझ काम कर रही है जिसके मुताबिक कविता एक तराशी हुई कलाकृति है जिसकी सारी नोकें घिसकर गोल कर दी गई हैं. इस समझ के अनुसार कथा-रचना में तो भाषा में फैलाव हो सकता है, लेकिन कविता शब्दों का ऐसा प्रयोग है जो अनिवार्यता के सिद्धांत का पालन करता है. कविता में शब्द ही सबसे पहले है और वही अंतिम भी है, कवि ऐसे ही शब्द चुनता है जिनके बिना उसका काम नहीं चल सकता और जिन्हें दूसरे शब्दों से बदला नहीं जा सकता. हर कविता एक गठी हुई संरचना है, ऐसी इमारत है, जिसका एक-एक शब्द एक-एक ईंट की तरह है, जो खास तरह से एक पर एक जमाई जाती हैं और बीच से उनमें से किसी को खिसका देने से इमारत के भरभरा कर गिरने का खतरा है. कविता छोटी हो या लंबी, यह बात दोनों पर लागू होती है.

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DISSENT, DEBATE, CREATE