Guest Post by Kishore

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संसदीय कैबिनेट ने १३ मई को बाल श्रम प्रतिबंधन एवं नियमन कानून (CLPRA act) में संशोधन को मंजूरी दे दी. मुख्य सकारात्मक बदलावों में १४ वर्ष की आयु तक किसी भी व्यवसाय अथवा प्रक्रिया में बाल श्रम पर पूर्ण प्रतिबन्ध का प्रावधान किया गया है जो स्वागत योग्य है. साथ ही ज्यादा कठोर सजा एवं जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है जो कि सकारात्मक है. हालाँकि अभी भी यह बाल अधिकार समझौते की कसौटी पर खरा नहीं उतरता क्योंकि इसमें १४ से १८ साल के बच्चों को गैर खतरनाक उद्योगों में काम करने की अनुमति दी है पर फिर भी चौदह वर्ष तक पूर्ण प्रतिबन्ध एक प्रगतिशील कदम है.
चौदह वर्ष तक पूर्ण प्रतिबन्ध के बावजूद पारिवारिक व्यवसायों में बच्चों के काम करने को छूट दी गयी है .बच्चे पारिवारिक व्यवसायों में काम कर सकते हैं बशर्ते यह काम बच्चे स्कूल जाने के बाद करते हों. सरकार इस छूट का मुख्य कारण यह बता रही है कि इससे बच्चों को अपने पारंपरिक काम सीखने का मौके मिलेगा.
आइये इस बात की समीक्षा की जाये कि यह कारण कहाँ तक तार्किक है. सरकार पारंपरिक कौशल को लेकर कितनी चिंतित है यह तो पिछले बीस साल में हथकरघा और अन्य पारम्परिक पेशों के लिए बनाई गई नीतियों से स्पष्ट है. कोई उनसे पूछे की पिछले बीस सालो में घरेलू उत्पाद में पारंपरिक व्यवसायों का योगदान किस दर से बड़ा है? अगर सरकार को पारंपरिक कौशल के लुप्त होने का इतना ही डर है तो क्यों नहीं इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करती ? अगर इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये तो बच्चे पढाई के साथ साथ व्यावसायिक कौशल भी सीखेंगे जो उनके जीवन में काम आयेगा. साथ ही पढाई के साथ काम सीखने से पढ़े लिखे लोगों में श्रम को नीची नज़र से देखने के नज़रिए पर भी लगाम लगेगी और शिक्षा और शारीरिक श्रम के बीच का फासला घटेगा. Continue reading बाल श्रम कानून में बदलाव का औचित्य :किशोर




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