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कल्पना करें कि किसी मुल्क के प्रधानमंत्राी की पत्नी, एक सूबे में जहां सत्ताधारी पार्टी की ही सरकार है, एक संगठन के कार्यक्रम में उसके बुलावे पर पहुंचती है और आयोजन अधबीच में ही समाप्त कर दिया जाता है।
ऐसी किसी ख़बर पर सहसा यकीन करना मुश्किल हो सकता है, मगर पिछले दिनों ऐसा ही वाकया 120 करोड़ आबादी के इस मुल्क में ही नमूदार हुआ जब ‘नमो इंडिया सेना’ – जो जनाब मोदी के मुरीदों का संगठन है – द्वारा सूरत में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सुश्री जसोदाबेन नरेन्द्रभाई मोदी पहंुची और सात दिन के लिए चलनेवाला उपरोक्त कार्यक्रम तीसरे ही दिन समाप्त कर दिया गया। /देखें, ‘शी हू बीजेपी कनाट स्टमक’, द टेलीग्राफ, 12 जून 2015/
ख़बर के मुताबिक जैसे ही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ शीर्षक उपरोक्त कार्यक्रम में जसोदाबेन पहुंची, जहां उन्हें बात रखने के लिए कहा गया था, मगर आयोजकों ने ही उन्हें मना कर दिया और कुछ समय बाद आयोजकों को स्थानीय भाजपा नेताओं ने बुलाया और उन्हें कार्यक्रम तत्काल खतम करने के लिए कहा। समाचार के मुताबिक आयोजकों की बात भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से भी करवा दी गयी। आखिर अचानक ऐसा क्यों हुआ कि सूरत के भाजपा नेताओं ने एक ऐसे संगठन के कार्यक्रम में सीधे हस्तक्षेप किया जो किसी भी रूप में भाजपा का आनुषंगिेक संगठन नहीं था और किस वजह से मुख्य आयोजक को सहारनपुर स्थित अपने घर जाने की ‘सलाह’ भी दी गयी। Continue reading जसोदाबेन मोदी से क्यों ‘डरती है’ भाजपा ?








One reason not to dwell deeper on these numbers maybe that the percentage of women as full professors today should depend on the percentage of women as assistant professors say fifteen years back. But as the figure above shows that the numbers for each category remain more or less the same throughout the fifteen years. Also if we look at similar numbers confining ourselves to only top 10 or top 20 Economic departments in the sample, the ‘pipeline’ is even more ‘leakier’. 
