कुछ वक्त पहले देश के एक बड़े शिक्षा संस्थान की विद्वत् परिषद् ने कोई एक साल पहले पाठ्यक्रम में की गई बड़ी और महत्वाकांक्षी तब्दीली को खारिज करते हुए पुराने पाठ्यक्रम को वापस बहाल करने का फैसला किया. यह वही परिषद् थी जिसने पहले के पाठ्यक्रम की आलोचना को दरकिनार करते हुए पिछला परिवर्तन किया था.उस वक्त इस निर्णय की आलोचना करने वाले अध्यापकों से राजनीतिक और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने प्रश्न किया था: यह निर्णय अत्यंत शिक्षित,अपने ज्ञान-क्षेत्रों में सुपरिचित विद्वानों ने सुचिंतित ढंग से किया क्यों किया जब आप इसे अकादमिक दृष्टि से कमजोर बताते हैं? एक तरह से विश्वविद्यालय के अकादमिक समुदाय ने स्वेच्छा से यह फैसला किया. लेकिन भिन्न परिस्थिति में इसी निर्णय को इसी परिषद् ने फिर उतने ही निर्द्वन्द्व भाव से कैसे रद्द कर दिया?
अभी दो महीने हुए, देश के प्रधानमंत्री ने शिक्षक दिवस के दिन बच्चों से सीधे बात करने का निर्णय किया. केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह कोई सरकारी फरमान नहीं है, स्वैच्छिक है. लेकिन केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा समिति, केंद्रीय विद्यालय संगठन,आदि ने इसे लागू करना अनिवार्य कर दिया. अनेकानेक निजी विद्यालयों ने भी, जो अपने काम-काज में सरकार से आज़ाद हैं,इसे अपने बच्चों के लिए निर्विकल्प कर दिया. Continue reading आज्ञाकारिता की संस्कृति

The Swachh Bharat Abhiyan (Clean India Campaign) is powerful in its simplicity, and problematic for the same reason. The absence of complexity in the presentation of the campaign, and the inherent contradictions between Modi’s consumerist growth agenda and SwachhBharat’s objectives fuels my skepticism and raises many questions: Which parts of India will be cleaned, which not and why not? What will we do with the wastes we remove? Where will we put it?