An open letter demanding action on the online targeting of Muslim women

A statement signed by 900 individuals and groups

We, the undersigned women’s rights groups and concerned individuals are outraged by the reprehensible targeting of Muslim women on GitHub, a free web platform, where Twitter handles, and photographs of Muslim women were uploaded with the explicit aim of directing sexualised hate and harm at these women. More than 80 women were profiled, their images were sought to be “auctioned” by soliciting users to take their pick on the “deal of the day”, on the basis of their identity and for their views. This is a conspiracy to target women by creating a database of those Muslim women journalists, professionals and students who were actively raising a voice on social media against right wing Hindutva majoritarianism. The intention is to silence their political participation.

This attempt to de-humanise and sexualise Muslim women is a systemic act of intimidation and harm. This is not the first time this has happened. Before Eid, similar cyber violence against Muslim women was organized by stealing pictures of Pakistani women from their social media handles.

This is a targeted hate campaign against Muslim women in India and abroad amounts to sexual harassment, criminal intimidation, and cyber stalking. It violates their right to privacy, which is a travelling right, and it is an act of censorship. It puts their life and liberty at risk.

This is a targeted campaign to regulate their political speech and political participation in democracy as full and equal citizens of this country. It is part of the project to push Muslim women out of public spaces, offline and online, by causing them harm and censoring their speech. Having witnessed the leadership and power of Muslim women in the anti-citizenship amendment act (CAA) movement, right wing Hindutva men have used social media as a political tool to deny Muslim women their right to lead our collective fight for secularism, peace and citizenship. Continue reading An open letter demanding action on the online targeting of Muslim women

ईमान का डंडा, बुद्धि का बल्लम, अभय की गेती और हृदय की तगारी!

मुक्तिबोध शृंखला:25

‘नए की जन्म कुंडली: एक’ में लेखक या वाचक की मुलाकात अपने एक मित्र से 12 वर्ष बाद होती है। ऐसा मित्र जिसे वह बहुत बुद्धिमान समझता था। वह ऐसा व्यक्ति था जो अपने विचारों को अत्यधिक गम्भीरतापूर्वक लेता:

 “वे उसके लिए धूप और हवा जैसे स्वाभाविक प्राकृतिक तत्त्व थे।दरअसल, उसके लिए न वे विचार थे, न अनुभूति। वे उसके मानसिक भूगोल के पहाड़, चट्टान, खाइयाँ, ज़मीन, नदियाँ, झरने, जंगल और रेगिस्तान थे।

विचारों के साथ उस मित्र का रिश्ता सतही न था:

वह अपने विचारों या भावों को केवल प्रकट ही नहीं करता था, वह उन्हें स्पर्श करता था, सूँघता था, उनका आकार-प्रकार, रंग-रूप और गति बता सकता था, मानो उसके सामने वे प्रकट, साक्षात् और जीवंत हों। उसका दिमाग़ लोहे का एक शिकंजा था या सुनार की एक छोटी-सी चिमटी, जो बारीक-से बारीक और बड़ी से-बड़ी बात को सूक्ष्म रूप से और मज़बूती से पकड़कर सामने रख देती है।” 

चूँकि विचारों के साथ उसका ऐसा, जीवन-मरण के प्रश्न जैसा रिश्ता था, वह सामान्य व्यक्ति तो नहीं ही था। विचारों के साथ इस गंभीर रिश्ते के कारण उसका इस ज़माने में मिसफिट रहना भी तय था। जिस ज़माने में हर वस्तु की कीमत उपयोगिता के आधार पर तय की जाती है, वहाँ विचारों के साथ इस तरह के उत्कट रिश्ते की कीमत चुकानी पड़ती है। या रिश्ता आख़िरकार आपको क्या हासिल देगा? दुनियादारी सिखलाती है कि वैसे विचारों से मुँह मोड़ लें या उन्हें कहने भीतर दफन कर दें जो जीने के रास्ते में आ जाते हों! विचारों को जो अपनी रक्त-मज्जा का इस प्रकार अंग बना लें, उनकी ज़िंदगी तकलीफदेह होना तय है। वे खुद को जाहिर करते हैं तो किसी बाहरी वजह से नहीं, इसलिए नहीं कि उसका कोई इस्तेमाल हो जाए। और वे खुद को प्रकट करने से घबराते भी नहीं इस आशंका से कि कहीं उनका कोई नुकसान न हो जाए।

Continue reading ईमान का डंडा, बुद्धि का बल्लम, अभय की गेती और हृदय की तगारी!

पूँजीवाद : तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ

मुक्तिबोध शृंखला : 24

मनुष्य इतना अकेला क्यों है? मनुष्यों में इतने फासले क्यों हैं? क्यों अमानवीय दूरियां हम सबको घेरे हुए हैं? या एक दूसरे से अलग किए हुए हैं? जीवन में इतना ओछापन क्यों हैं? सतहीपन, छिछलापन क्यों हैं? क्यों इंसान खुद को हासिल नहीं कर पाता? क्यों हम सब अपने बदले किसी और का जीवन जीते रहते हैं? क्यों अपना किया हुआ श्रम अकारथ लगता है? क्यों हर नई सुबह मन में स्फूर्ति नहीं जगती? क्यों हमेशा कुछ खो गए होने का अहसास दीमक की तरह मन को चाटता रहता है? हमारे चारों तरफ व्यक्तित्वों के खँडहर क्यों? ज़िंदगी क्यों ढहकर मलबा बन जाती है? क्यों हम आँख उठाकर अपने चारों तरफ जो कुदरत का नूर है, उसे देख नहीं पाते, उसमें डूब नहीं पाते? क्यों भव्यता, ऊँचाई का दर्शन करने में हमारी गर्दन दुखने लगती है? क्यों हम अपनी खोह में दुबके रहना चाहते हैं? जीवन के विस्तार का आभास हमें क्यों नहीं हो पाता?

यह तो सोचो कि वह कौन मैनेजर है जो हमें-तुम्हें, सबको रीछ-शेर-भालू-चीता-हाथी बनाये हुए है?”  

‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न पर होता है। कहानी में एक दूसरे को खा जाने, एक दूसरे पर चढ़ बैठने का नाटक करने की कवायद कराई जाती है। यह नाटक है। लेकिन सच तो यह है कि हम ऐसी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं जिसमें हर कोई दूसरे को खा डालना चाहता है, वह उसका भोज्य है। हर पड़ोसी दूसरे पर निगाह रखता है, वह जासूस या खबरी है। किसी की तरक्की की शर्त किसी का और नीचे धँस जाना है?

Continue reading पूँजीवाद : तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ

प्रभात के कपोलों को हृदय के दाह-चुंबन से लाल कर दूँगा मैं

मुक्तिबोध शृंखला:23

लिखना और पढ़ना मुक्तिबोध के साहित्य संसार में विशालता के स्पर्श का एक जरिया है। ‘आ-आकर कोमल समीर’ कविता के आरम्भ में ही एक टेबल पर झुका सर दिखलाई देता है जिसके उलझे बालों को समीर आ-आकर सहलाता रहता है। यह तूफ़ान नहीं है जो मुक्तिबोध की कविता के प्रचलित स्वभाव के लिहाज़ से स्वाभाविक होता, वह झकझोरता नहीं है। टेबल पर जो बैठा है, वह गंभीर काम में तल्लीन है। इसलिए समीर बहुत दुलार से उसके बालों को सहला रहा है। वह एक गंभीर काम में, जो मेहनत का काम है,लगा जो है। फिर कवि का कैमरा जिस टेबल पर सर झुका है, उसपर अपनी निगाह ले जाता है:

“विद्रूप अक्षरों की बाँकी-

टेढ़ी टाँगों के बल चलती,

स्याही के नीले धब्बों से जो रँगी हुई

पीले कागज़ की दुनिया है,”

यह पीले कागज़ पर लिखे जाते जो टेढ़े-मेढ़े अक्षरों की दुनिया है। किसी-किसी को वह सिर्फ धब्बों से रंगा पीला कागज़ दिखलाई पड़ सकता है। लेकिन है वह ज़िंदगी से धड़कता एक संसार। यह दुनिया बनती कैसे है? 

Continue reading प्रभात के कपोलों को हृदय के दाह-चुंबन से लाल कर दूँगा मैं

Stan Swamy’s Custodial Murder – Joining the Dots From Santhal Hul To the Pathalgadi Movement

Fr. Stanislaus Lourduswamy aka Stan Swamy, image by Sarah Modak, courtesy Article 14

There are just no words left to express the anger and helplessness that overcame hundreds and thousands of people like me when they heard of the custodial murder of an ailing, frail, octogenarian, Fr Stanislaus Lourduswamy, known to the world as Stan Swamy. The various issues that arise from the virtual judicial abdication of responsibility has been powerfully articulated by former Delhi High Court Chief Justice, AP Shah and one can hardly add to that. What is perhaps the most shocking is not that the judiciary abdicated in observing its duty of upholding the Constitutional rights of a citizen but that it seems to have lost even the minimum grace and human concern.

“Medical reports taken on record clearly showed that Fr Swamy had the degenerative Parkinson’s disease, and could not even do basic tasks, such as holding a spoon, writing, walking or bathing. Indeed, the court noted that he had a severe hearing problem, and was physically very weak. But even that did not move them. Every regular bail application that was filed by his lawyers was unequivocally rejected.” 

This is shocking beyond words – or used to be once upon a time. But as each day of this regime passes, our threshold of taking shock increases by leaps and bounds. Are we really surprized now, that while this was how they treated Stan Swamy, a goon who had just the other day openly called for mob violence and “shooting down anti-nationals” has now been promoted to the Central ministry?

Continue reading Stan Swamy’s Custodial Murder – Joining the Dots From Santhal Hul To the Pathalgadi Movement

How Might a Feminist Respond to a Collegial Mansplaining of Feminism? Anannya Dasgupta

Guest post by ANANNYA DASGUPTA

Scroll had recently featured the Foreword to a book, with the heading ‘What do allies write about when they write (poetry) about feminism?’ The descriptive tag read – Saikat Majumdar surveys a unique anthology in his Foreword to ‘Collegiality and Other Ballads’. What makes this anthology unique? Sometime in 2020, Shamayita Sen had circulated a call ‘seeking poems on feminist ideology’ from ‘non-women’. I remember thinking, surely the call will be revised; feminist allies must know that there is a problem with excluding women from a space meant to check the pulse of contemporary feminisms. Besides, who is non-woman enough to want to be a part of such a man-book? While the premise of the book was not revised, the category ‘non-woman’ has been. The title page of the anthology now reads: Collegiality and Other Ballads with a tag – feminist poetry by males and non-binary allies. The opening line of Majumdar’s Foreword adds to the uniqueness of this mostly male-only feminist anthology by attributing uniqueness to feminism itself: ‘Feminism is the name of a unique battle.’

Continue reading How Might a Feminist Respond to a Collegial Mansplaining of Feminism? Anannya Dasgupta

विराट की सौंदर्याभा के जल का स्पर्श!

मुक्तिबोध शृंखला:22

“… पहली कठिनाई यह है कि इस युग का संगीत टूट गया है और जिस निश्चिंतता के साथ लोग अब तक गाते और छंद बनाते आए थे, वह निश्चिंतता तेरे लिए नहीं है।

“…. भावों के तूफ़ान को बुद्धि की जंजीर से कसने की उमंग कोई छोटी उमंग नहीं है। तेरी कविता के भीतर जब भी तेरे दिमाग की चरमराहट सुनता हूँ, मुझे भासित होने लगता है, काव्य में एक नई लय उतर रही है, जो भावों के भीतर छिपकर चलनेवाले विचारों की लय है, जो कवि से एककार होकर उठनेवाले विचारों का संगीत है।

“… जब नीति और धर्म की मान्यताएँ सुदृढ़ होती हैं और लोगों  को उनके विषय में शंका नहीं रह जाती, तब साहित्य में क्लासिकल शैली का विकास होता है। … जब वायु असंतुष्ट और क्रान्ति आसन्न होती है, तब साहित्य की धारा रोमांटिक हो उठती है। … किन्तु तू जिस काल-देवता के अंक में बैठा है, उसकी सारी मान्यताएँ चंचल और विषण्ण हैं तथा उन्हें इस ज्ञान से भी काफी निराशा मिल चुकी है कि रोमांस की राह किसी भी निर्दिष्ट दिशा में जाने की राह नहीं है। … तू क्लासिकल बने तो मृत और रोमांटिक बने तो विक्षिप्त हो जाएगा। तेरी असली राह वही है जो तू अपनी अनुभूतियों से पीटकर तैयार कर रहा है।” (रामधारी सिंह दिनकर)

Continue reading विराट की सौंदर्याभा के जल का स्पर्श!

Salaam Father Stan Swamy! Warrior for the soul of India

Numb and wordless in grief, filled with rage against the murderous regime of the RSS, led by Modi and Shah, we raise our fists in salute to a gentle, inspiring man.

Here is the statement  Stan Swamy made on the eve of his arrest by the NIA, stating that false evidence had been planted on his computer.  That this had indeed been done on a large scale to arrest people in the Bhima Koregaon case was soon established by an independent digital forensics firm based in the USA.

This is a criminal regime and the Prime Minister and the Home Minister should stand trial for war crimes against the people of India.

The fight will continue!

Release all political prisoners!

हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है

मुक्तिबोध शृंखला:21

जीवन में अनाह्लाद उत्पन्न होता है अगर हम उसे तत्त्व प्रणाली से बाँधने की कोशिश करें। सैद्धांतिक आत्मविश्वास एक प्रकार की ट्रेजेडी है क्योंकि वह जीवन की पेचीदगी के प्रति पूरी तरह लापरवाह होता है। वह अपने सिद्धांत की काट में जीवन को फिट करने की कोशिश करते हुए उसकी हत्या कर डालता है। जीवन जीने में ही आह्लाद है। कहीं किसी अंतिम बिंदु पर पहुँच जाने में नहीं। प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास, खुशी सच्ची कब है? जब वह स्वार्थ से परे जलनेवाली, असंतोष की वह्नि हो। स्वार्थमय प्रसन्नता निश्चय ही निःस्वार्थ प्रसन्नता से हीन है।

मुक्तिबोध की कविता में हर्ष और आह्लाद के क्षणों की भरमार है। ‘हरे वृक्ष’ कविता में सहचर मित्रों-से हरे वृक्ष की हरी आग हृदय के तल को डँस लेती है और

इनके प्राकृत औदार्य-स्निग्ध

पत्तों-पत्तों  से

स्नेह-मुग्ध

चेतना

प्राण की उठी जाग।”

उदारता से स्निग्ध पत्तों से स्नेह-मुग्ध चेतना जगती है। विशेषण मुक्तिबोध को बहुत प्रिय हैं और उनकी भाषा में जो ऐन्द्रिकता और मांसलता है, वह उस कारण भी है। वह विशेषणों से समृद्ध है। हेमिंग्वे परिश्रमपूर्वक विशेषण रहित गद्य में उपन्यास लिखना चाहते थे। मुक्तिबोध का काम उनके बिना नहीं चलता।  उन विशेषणों से ही वे उन भावों की रचना कर पाते हैं जो नितांत, उत्कट रूप से मानवीय हैं।

Continue reading हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है

अंगार-राग और मधु-आवाहन

मुक्तिबोध शृंखला: 20

मुक्तिबोध मृत्युशैय्या पर थे। उनके तरुण प्रशंसक मित्र उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित करने की तैयारी कर रहे थे। मुक्तिबोध के जीवन काल में ही यह हो रहा था लेकिन वे उसे प्रकाशित देखनेवाले न थे। नाम क्या हो किताब का? अशोक वाजपेयी ने इस घड़ी का जिक्र कई बार अपने संस्मरणों में किया है। श्रीकांत वर्मा और उन्हें यह तय करना था। खुद मुक्तिबोध जो नाम चाहते थे, वह था ‘सहर्ष स्वीकारा है।’ अशोकजी ने लिखा है,

हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध से जिस अनुबंध-पत्र पर दस्खत कराए थे, उसमें उनके पहले कविता संग्रह का शीर्षक था: सहर्ष स्वीकारा है। बाद में हमलोगों यानी नेमिजी, श्रीकांत वर्मा और मुझे लगा कि उनकी कविता में हर्ष और स्वीकार दोनों ही ज़्यादातर नहीं हैं, कोई और शीर्षक होना चाहिए। अंततः हम चाँद का मुँह टेढ़ा हैपर सहमत हुए।”

मुक्तिबोध इस पर कोई राय देने की हालत में न थे। कविता-संग्रह इसी नाम से छपा। मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद दिल्ली में हुई गोष्ठी में अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध पर अंग्रेज़ी में एक निबंध पढ़ा जो बाद में हिंदी में ‘भयानक खबर की कविता’ शीर्षक कविता से छपा। कविता संग्रह के इस शीर्षक ने और खुद मुक्तिबोध के अपने मित्रों ने मुक्तिबोध के बारे में एक धारणा बन जाने में जाने-अनजाने (?) मदद की: यह कि मुक्तिबोध भयावह, भयंकर, अस्वीकार, संघर्ष और क्रांति के कवि हैं।

Continue reading अंगार-राग और मधु-आवाहन

Hul Dibosh Convention by Ekusher Dak (Call of 21) Marks Anniversary of Santhal Rebellion

Poster in Santhali language for the Convention

We had reported earlier on the call for a convention to commemorate the anniversary of the historic Santhal Rebellion associated the immortal names of Sidhu and Kanu. The convention was organized by the recently constituted forum in West Bengal, Ekusher DakCall of 21 – which was formed in the run up to the recently held elections in the state. ’21’ of course, refers to the year 2021 when the elections were held and the initiative for a new/ different Left platform in the state was launched. But ’21’ also recalls the date 21 February 1952, the historic day of the Bhasha Andolan (the Language Movement) in what is now Bangladesh. It recalls the assertion of Bengali identity that overrides the religious divide that the BJP made every effort to exacerbate. The convention was held yesterday and really came like a whiff of fresh air. The film we embed below is a very short but powerful telling of the story of the revolt with graphics. Ekusher Daak Film Team – Arjun, Debalina, Maroona, Boro, Laboni, Malay, Mitali, Arundhati, Saikat, Baijayanta, and Swarnava -have produced the film. For those who would like to watch the proceedings of the Convention, the YouTube streaming link is here.

The film on Hul Dibosh

क्या इस तरह भारत में कोरोना कभी ख़त्म होगा? राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

पंद्रह दिन एक व्यस्क मरीज़ के साथ कोरोना वार्ड में गुज़ार के जब मैं अपने शहर पहुंचा तो पाया कि मेरे सैक्टर को ही कन्टेन्मन्ट ज़ोन बना रखा था. कन्टेन्मन्ट ज़ोन यानी ऐसा इलाका जिस में आने-जाने के रास्ते बंद किये हुए थे ताकि कोरोना पीड़ित इस सैक्टर में आवाजाही न हो सके. यह दावा कि मैंने 15 दिन कोरोना वार्ड में अपने मरीज़ के साथ गुज़ारे उन लोगों को अविश्वसनीय लग सकता है जो बड़े शहर के बड़े हस्पताल में दाखिल अपने कोरोना पीड़ित मरीज़ से संपर्क करने को तरसते रहे हैं. परन्तु यह सच है. मैंने भी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि कोरोना मरीज़ की देखभाल के लिए मुझे उस के साथ हस्पताल में रहना पड़ सकता है.  सरकार की कोरोना नीति की बहुत सारी आलोचना मैंने पढ़ी-सुनी और की थी पर मुझे इस का अहसास नहीं था कि बाकी मरीजों की तरह हस्पताल में दाखिल अपने कोरोना मरीज़ की देखभाल भी खुद करनी होती है. सच में भारत धुर विसंगतियों का देश है. एक ओर हमारी सरकार पूरे इलाके को ‘कन्टेनमेंट ज़ोन’ (नज़रबंद इलाका) घोषित कर सकती है ताकि वहां से कोरोना पीड़ित दूसरी जगह जा कर संक्रमण को फैला न सकें और दूसरी ओर हस्पताल में कोरोना पीड़ित मरीज़ की देखभाल के लिए किसी परिजन को उस के साथ रहना पड़ता है. चौबीस घंटे तो कोई एक व्यक्ति मरीज़ की देखभाल कर नहीं सकता था. इस लिए हम दो लोग अपने परिजन की देखभाल के लिए उस के साथ शिफ्टों में रहते थे जिस के चलते हमारा कोरोना वार्ड से घर आना जाना लगा रहता था. इस से न केवल हम परिचारकों के संक्रमित होने का ख़तरा था अपितु नियमित तौर पर घर आने जाने के कारण हम और लोगों को भी संक्रमित कर सकते थे.

Continue reading क्या इस तरह भारत में कोरोना कभी ख़त्म होगा? राजेन्द्र चौधरी

मनुष्यता: भाव और अभाव

मुक्तिबोध शृंखला:19

‘स्व’ के प्रश्न से मुक्तिबोध जीवन भर जूझते रहे। स्व के प्रति सचेत होना व्यक्ति बनने के लिए अनिवार्य है। और व्यक्तित्व तो उसके बाद ही बन सकता है। लेकिन वह क्या आसान है? उसमें बहुत मेहनत है। कौन इस पचड़े में पड़े? उससे बेहतर है खुद को भूल जाना। भूल जाने के खूबसूरत तरीके या बहाने खोजना भी क्या इतना मुश्किल है? एक अधूरी टिप्पणी में मुक्तिबोध लिखते हैं,

“कुछ बुद्धिमान कहते हैं कि भीड़ में व्यक्तित्व खो जाता है। लेकिन मैं कहता हूँ कि इसमें बुराई क्या है। मुझे तो भीड़ में अपने से मुक्ति मिल जाती है। चहल-पहल,रौनक, रफ़्तार,और शोर में ही क्यों न सही, खुद का भूलना तो होता ही है।”

यह भरम कई तरीकों से पैदा किया जा सकता है। आप कह सकते हैं कि मैं तो समाज में लगा हुआ हूँ, कोई  कह सकता है कि मैं राजनीति में व्यस्त हूँ और मुक्तिबोध व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि कलाकार भी खुद को इस धोखे में रख सकते हैं,

“बहुत से लेखक और कलाकार अपनी चेतना को इस तरह जगाते हैं कि निजी व्यक्तित्व आँखों से ओझल हो जाता है। यह तो कहने की बातें हैं कि हम उच्चतर स्तर पर जागे हुए हैं।”

Continue reading मनुष्यता: भाव और अभाव

The Call of ’21 (একুশের ডাক) – A Novel Campaign and a Nucleus of the New

We publish a document ‘Demands of the People’ adopted by a novel campaign Ekusher Dak in West Bengal that has the potential to emerge as the nucleus of a new Left formation in the state. The draft document in Bangla is appended at the end of this post. Tomorrow, 30 June, Ekusher Dak or the Call of 21 will be organizing a programme, recalling the great Santhal Hool or the revolt of 30 June 1855.

Continue reading The Call of ’21 (একুশের ডাক) – A Novel Campaign and a Nucleus of the New

मैं बदल चला सहास, दीर्घ प्यास

मुक्तिबोध शृंखला:18

स्व का निर्माण, सृजन, परिष्कार आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है। स्व स्वायत्त है लेकिन अपने आप में बंद नहीं। उसकी प्राणमयता उसकी गतिशीलता में है। वह कभी भी पूरा बन नहीं चुका होता है। उसके अधूरेपन का अहसास क्या उसे निर्बल  करता है या उसे चुनौती देता है कि वह अपना विस्तार करता रहे?  ‘रबिन्द्रनाथ’ शीर्षक कविता में स्व की इस अनंत यात्रा को इस प्रकार प्रकट किया गया है:

“मैं बदल चला सहास

दीर्घ प्यास

मुझे देखना अरे अनेक स्थान

अभी मुझे कई बार मरण, और प्राण प्राप्त

कई बार शुरुआत, कई बार फिर समाप्त

मुझे अभी गूँजना क्षितिज तीव्र वायु

मुझे अभी अनेक पर्वतों-उभार पर अनेक साँझ बहुत प्रात

देखना। अपूर्ण आयु।

(अ)पूर्ण उर, अपूर्ण स्वर!”

यह कई बार का मरना क्या हो सकता है? कई बार मरकर फिर नए प्राण प्राप्त करना? यह एक नई ज़िंदगी हासिल करने की बड़ी प्यास है जो कभी बुझती नहीं? आत्मा की यात्रा जिसका कोई अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। उसमें तृप्ति नहीं है। पूर्णता का अहंकार नहीं है।

Continue reading मैं बदल चला सहास, दीर्घ प्यास

यह असंतोष की वह्नि स्वार्थ से परे रही

मुक्तिबोध शृंखला:17

‘अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है’, इस पंक्ति पर ध्यान अटक गया। क्या अँधेरे वतन की बात की जा रही है? या अँधेरे की जो कवि का ख़ास वतन है? क्या इस अँधेरे को आग लग जाती है?  वह अँधेरा को कवि का स्वदेश है? मुक्तिबोध का जिक्र आते ही अँधेरा पहला शब्द है जो मन में उभरता है। अँधेरे के साथ और जो भाव आ सकते हैं, वे भी। आशंका, भय, असुरक्षा, आतंक! एक दूसरे प्रसंग में मुक्तिबोध अँधेरे के साथ अपने रिश्ते की बात कुछ इस तरह करते हैं:

“… मेरे लिए अन्धकार तो एक आकर्षण है। अतएव मैं इस ध्वांत  को चीरकर उसके सौंदर्य को नष्ट नहीं करना चाहता। मैं तो वस्तुओं को टटोलना चाहता हूँ और उन्हें वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसे वे हाथों को लग रही हैं।”

Continue reading यह असंतोष की वह्नि स्वार्थ से परे रही

अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है

मुक्तिबोध शृंखला:16

‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न से होता है कि वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो हमें आपको पालतू भालू बन्दर बनाकर नचाती रहती है। किसके हाथ हमारे गले के पट्टे की चेन है। हमारे ‘मैं’  की हत्या किस तरह कर दी जाती है। किस तरह हमें गुलामी बर्दाश्त करना सिखलाया जाता है। हम खुद इस दासता को न सिर्फ सहते हैं बल्कि दूसरों को उसमें दीक्षित करना अपना कर्तव्य मानने लगते हैं। जो अनुकूलित होने से इनकार करे, हमें अपना शत्रु नज़र आने लगता है और हम उसकी हत्या होते देखते ही नहीं, कई बार खुद उसकी हत्या को तैयार हो जाते हैं। चलते फिरते शिरविहीन कबंधों का यह संसार कितना उदास और कितना भयावह है। चारों ओर जाने कितने हताहत व्यक्तित्व हैं। कितने सत्यों की भ्रूण हत्या कर दी गई है।

मुक्तिबोध की शिकायत इस ज़माने से इसी वजह से है। प्रकृति ने मनुष्य के रूप में जिस संभावना को गढ़ा, मानव के रूप में जो स्वप्न देखा उसका ऐसा अनादर कैसे सहन किया जा सकता है?  उनकी कविता  “आ-आकर कोमल समीर!” में यह दुख इस प्रकार प्रकट होता है:

    “नित देख-देख उद्ध्वस्त शिखर जीवन के, जन के

  मैं आहत हो गया,

  प्राण का श्वास रुक गया।”

Continue reading अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है

‘Joblessness’ In The Post-Employment World – Urgent Need for Paradigm Change

Job seekers at a job-fair in Chinchwad, 2019, Image courtesy Reuters/ Danish Siddiqui

The ‘unemployment’ question, let us put it bluntly, is not just an innocent and neutral question today but a key arena of class war – the war of Capital on society at large. Capital has its plans but does “society” have one?

Enter the Post-Employment World

It was reported last week that top IT sector companies like TCS, Infosys, Wipro, HCL, Tech Mahindra and Cognizant are likely to slash 3 million jobs by next year. With large-scale resort to Artificial Intelligence (AI) based “robot process automation” (RPA), these companies, by shedding these jobs are expecting to “save a whopping USD 100 billion, mostly in salaries, annually” says the Indian Express report linked above. Citing NASSCOM (National Association of Software and Service Companies) the report tells us that the domestic IT sector employs around 16 million, of whom “around 9 million are employed in low-skill and BPO roles.”

Of these 9 million low-skilled services and BPO roles, 30 per cent or around 3 million will be lost by 2022, principally driven by the impact of robot process automation or RPA. Roughly 0.7 million roles are expected to be replaced by RPA alone and the rest due to other technological upgrades and upskilling by the domestic IT players, while it the RPA will have the worst impact in the US with a loss of almost 1 million jobs, according to a Bank of America report on Wednesday.”

Continue reading ‘Joblessness’ In The Post-Employment World – Urgent Need for Paradigm Change

इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

मुक्तिबोध शृंखला : 15

‘पक्षी और दीमक’ कहानी में अपने पंख देकर दीमक मोल लेने वाले पक्षी की त्रासदी हमारी-आपकी, सबकी हो सकती है। कहानी सुनाते- सुनाते और उसके अंत तक पहुँचते ही ‘मैं’ को धक्का-सा लगता है। जब आप एक एक कर अपने पंख देते जाएँ तो फिर एक दिन रेंगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। पक्षी को तंबीह की गई थी कि दीमक उसका स्वाभाविक आहार नहीं। और कुछ हो, पक्षी को अपने पंख नहीं देने चाहिए। लेकिन उसे तो दीमक की चाट लग गई। फिर दीमक बेचनेवाले गाड़ीवान को दो दीमकों के बदले अपना एक पंख देने की उसकी आदत पड़ गयी। एक-एक कर अपने पंख गँवाते हुए वह उड़ने की ताकत खो बैठा। और फिर एक दिन एक बिल्ली का ग्रास बन गया।

कहानी के अंत तक पहुँचकर कहानी सुनानेवाले को धक्का लगता है। उसे जान पड़ता है कि कहीं वह अपनी ही कहानी तो नहीं कह रहा! वह संकल्प लेता है कि वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।

Continue reading इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

मुक्तिबोध शृंखला : 14

‘पक्षी और दीमक’ मुक्तिबोध के पाठकों की जानी हुई कहानी है। लेकिन जैसा मुक्तिबोध की कई रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है, इस कहानी में दो कहानियाँ हैं। और उनके बीच एक आत्म-चिंतन जैसा भी।

कहानी एक कमरे में शुरू होती है। लेकिन वह जितना कमरा है उतना ही किसी का मन भी हो सकता है। एक कमरा जिसके बाहर चिलचिलाती धूपभरी दोपहर है लेकिन भीतर ठंडी हलकी रौशनी। बाहर और भीतर के बीच सिर्फ एक खिड़की नहीं है, काँटेदार बेंत की झाड़ी और उससे लिपटी हुई बेल। मुक्तिबोध की रचनाओं को जन-संकुल माना जाता रहा है लेकिन कुदरत, जैसा हम पहले भी नोट कर आए हैं, उनकी बनावट को तय करती है। यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के बिना मुक्तिबोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह उनसे उसी कदर गुँथी हुई है जैसे इस बेंत की झाड़ी से यह बेल।

“बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।”

एक साथ इसमें कई संवेदनाएँ हैं- धूप की चिलचिलाहट का अनुमान, मद्धम उजाले की शीतलता, खिड़की का खुलापन, काँटेदार बेंत और आसमानी फूल।

Continue reading जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

फिलिस्तीन के नाम क्षमा पत्र : मनोज कुमार झा

Guest Post: Manoj Kumar Jha

प्रिय फिलिस्तीनवासियो,

    हम चाहते हैं कि आप इस पत्र को करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दुःख और पछतावे की अभिव्यक्ति की तरह पढ़ें  जो हमें सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में प्रस्तुत किए गए फिलिस्तीन के प्रस्ताव में अनुपस्थित होने का है। हम न केवल गाजा पट्टी में हुई व्यापक हिंसा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव से अलग रहे,बल्कि हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों ने भारत-फिलिस्तीन के सम्बन्धों की उस समृद्ध विरासत से मुँह मोड़ लिया जो इतिहास के अनेक उतार चढ़ाव भरे दौरों में भी अक्षुण्ण रही है।

Continue reading फिलिस्तीन के नाम क्षमा पत्र : मनोज कुमार झा

DISSENT, DEBATE, CREATE

%d bloggers like this: