Guest post by KULDEEP KUMAR
कुलदीप कुमार की यह पुस्तक समीक्षा समयांतर के अक्तूबर २०१३ अंक में छपी थी. इस विषय में चूँकि हमारी ख़ास दिलचस्पी है, लिहाज़ा, इसे हम यहाँ अपने पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं.
कोसांबी: कल्पना से यथार्थ तक, लेखक भगवन सिंह, आर्यन बुक्स इंटरनेशनल; पृ. ४०१, मूल्य: रु ७९५/-
हड़प्पा सभ्यता और वैदिक सभ्यता को एक ही मानने वाले भगवान सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के गणितज्ञ, विद्वत समाज में समादृत संस्कृतज्ञ एवं प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार दामोदर धर्मानंद कोसंबी पर एक पुस्तक लिखी है ‘कोसंबी: कल्पना से यथार्थ तक’। 401 पृष्ठों की इस पुस्तक को आर्यन बुक्स इन्टरनेशनल, पूजा अपार्टमेंट्स, 4 बी, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2 ने इसी वर्ष छापा है और इसका मूल्य 795 रु॰ है।
पुस्तक के ब्लर्ब में कहा गया है: “कोसंबी का नाम दुहराने वालों की कमी नही, उन्हें समझने का पहला प्रयत्न भगवान सिंह ने किया। वह कोसंबी के शिष्य हैं परंतु वैसे शिष्य जैसे ग्रीक परंपरा में पाए जाते थे।” इन दो वाक्यों में दो दावे किए गए हैं। पहला यह कि भगवान सिंह से पहले किसी ने भी कोसंबी को समझने का प्रयास नहीं किया, और दूसरा यह कि वह कोसंबी के शिष्य हैं, वैसे ही जैसे ग्रीक परंपरा में हुआ करते थे। कोसंबी के इस स्वघोषित शिष्य के अपने “गुरु” के बारे में क्या विचार हैं, यह जानना दिलचस्प होगा। भगवान सिंह कोसंबी के बारे में श्रद्धा से भरे अपने उद्गार कुछ यूं व्यक्त करते हैं: “…वह आत्मरति के शिकार थे, उन्हें अपने सिवाय किसी से प्रेम न था, न अपने देश से, न समाज से, न भाषा से, न परिवार से। उनका कुत्ता अवश्य अपवाद रहा हो सकता है। इसीलिए लोग उनसे डरते भले रहे हों, उन्हें कोई भी प्यार नहीं करता था। उनके अपने छात्र, पत्नी और बच्चे तक नहीं।” (पृ॰ 120) Continue reading डी डी कोसांबी पर भगवा हमला: कुलदीप कुमार →