नीतीश कुमार और मीडिया दोनों एक-दूसरे को बहुत प्रिय हैं. (यहां मीडिया से तात्पर्य मुख्यतः बिहार के मुख्यधारा के बड़े अखबारों से है.) नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री मुख्यधारा की मडिया पर बिहार का खजाना लुटाते हैं और बदले में मीडिया अपना युगधर्म भूलकर उनकी झूठी-सच्ची तारीफ में लगा रहता है, उनके पक्ष में तर्क-कुतर्क गढ़ता है, अखबार संदर्भ-बेसंदर्भ उनकी बड़ी-बड़ी तसवीरें छापते हैं. वैसे नीतीश कुमार और मीडिया के बीच के मधुर रिश्ते की और भी दूसरी बड़ी वजहें भी हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी. फिलहाल इस रिश्ते का जिक्र इस कारण क्योंकि पिछले दिनों नीतीश अखबारों के पहले पन्नों पर दिखाई तो दे रहे थे, मगर कुछ दूसरे अंदाज में उनकी तस्वीरें छप रही थीं.
मामला कुछ यूं था. बिहार को विशेष राज्य दिलवाने की मांग (या कहें जिद) के लिए जन-समर्थन जुटाने जब इस बार नीतीश कुमार बिहार भर की ’अधिकार-यात्रा’ पर निकले तो जनता-जर्नादन को अपने अधिकारों की भी याद आ गई. (लिखत-पढ़त में यह उनकी सरकारी यात्रा नहीं थी!) मिथिलांचल इलाके से इस यात्रा के दौरान आम लोगों, खासकर नियोजित शिक्षकों ने अपने मांगों के समर्थन में नीतीश कुमार का ध्यान खींचना शुरू किया. गौरतलब है कि इस मंहगाई में नौकरी करते हुए भी मात्र छह-सात हजार मासिक पाने वाले ‘सरकारी’ शिक्षकांे को बिहार में कई महीनों से वेतन तक नहीं मिल रहा था. अब जनता का तो अपना तरीका होता है (कहीं-कहीं बहकावे में भी आ जाती है, कहीं-कहीं जनता की भीड़ में शरारती तत्व भी घुस जाते हैं), वह कहीं काला झंडा लहराने लगी तो कहीं मंच की ओर चप्पल दिखाने-उछालने लगी. उपेक्षा और परेशानियों से उपजे लोगों के आक्रोश ने खगड़िया जिले में रौद्र रूप धारण कर लिया. और खगड़िया के बाद ही नीतीश कुमार अखबारों में उस अंदाज में दिखाई देने लगे, जिस बदले रूप का ऊपर जिक्र है.
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