
घेरेबन्दी में पड़े अपने शहर के हालात को लेकर अपने जमाने का शायर कैसी प्रतिक्रिया देता है? अचानक इस बारे में कुछ कहना मुश्किल जान पड़ सकता है, अलबत्ता एक तरीका है फिलिस्तीन के महान कवि महमूद दरवेश के नक्शेकदम पर चलना, जिनकी लम्बी कविता ‘मेमरी फॉर फरगेटफुलनेस’ अर्थात ‘भुलक्कड़पन/स्मृतिलोप के लिए स्मृति’ वर्ष 1982 में लेबनान पर हुए इजरायली आक्रमण का चित्र खींचती है।
लेबनान की राजधानी बेरूत जहां वह रह रहे थे, बमबारी का शिकार हो रही थी। वे लिखते हैं, ‘‘बेरूत, इज़रायली टैंकों से और आधिकारिक अरबपस्ती से घिरा हुआ’, वह बेरूत ‘अन्दर से अपने आप को थामे हुए था ताकि ‘अरब उम्मीद की राजधानी के उसके मायने की चमक की हिफाज़त की जा सके।’ किताब में दरवेश फैज़ अहमद फैज़ के साथ अपना सम्वाद शुरू करते हैं, जो उन दिनों बेरूत में ही थे।
कलाकार कहां हैं? कौन कलाकार, फैज़, मैं पूछता हूं बेरूत के कलाकार तुम उनसे चाहते क्या हो? यही कि शहर की दीवारों पर युद्ध को उकेरना तुम्हें क्या हो गया है फैज़, मैं ताज्जुब प्रकट करता हूं। क्या तुम देख नहीं रहे हो दीवारें ही गिर रही हैं?
यह कविताएं लेखन (स्मृति से इतिहास, स्मृतिलोप, भुलक्कड़पन) के बीच एक रिश्ता कायम करती हैं। घेरेबन्दी के मध्य यह दृढ़ता, अटलता की यात्रा है। Continue reading घेरेबन्दी में पड़े देश और खेल के नये नियमों के बीच हम क्या कर सकते हैं?















