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Waiting for the Director:Indian Premiere of ‘No Fire Zone: The Killing Fields of Sri Lanka’

On 7th November the full length version of the documentary “No Fire Zone: The Killing Fields of Sri Lanka’ will be premiered at the India International Center for the first time in India and discussed by eminent thinkers, journalists and activists. Callum Macrae, the Director of ‘No Fire Zone’, a film on the last days of the civil war in Sri Lanka has not received his visa to come to India and participate in the discussions despite applying over eight months ago! 

Two years ago when Channel 4 in the UK first aired the documentary, it sent shockwaves through the international community. The Sri Lankan civil war, which ended in mid-2009 with the decimation of the LTTE by the Sri Lankan army was supposed to have been a ‘glorious’ chapter in the vanquishing of a ‘terrorist’ force. Continue reading Waiting for the Director:Indian Premiere of ‘No Fire Zone: The Killing Fields of Sri Lanka’

सामूहिक अपराध और जवाबदेही

मुज्ज़फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी तय करने का मसला पेचीदा होता जा रहा है.क़त्ल हुए हैं,बलात्कार की रिपोर्ट है, घर लूटे और बर्बाद किए गए हैं.हजारों मुसलमान अपने घरों और गावों से बेदखल कर दिए गए हैं.यह सब कुछ अपने आप तो नहीं हुआ होगा.किसी भी अपराध के मामले में इंसाफ की प्रक्रिया की शुरुआत अभियुक्तों की पहचान और उनकी नामजदगी से होती है.मुज्ज़फरनगर के हिंदू ग्रामीणों को इस पर ऐतराज है.उनका दावा है कि शिकायतें, जो मुस्लिम उत्पीड़ितों ने दर्ज कराई हैं और जिनके आधार पर अभियुक्तों को चिह्नित किया गया है,गलत हैं.वे और उनके लोग निर्दोष हैं और इसलिए पुलिस को धर पकड़ की अपनी कार्रवाई से बाज आना चाहिए.

अभियुक्तों को गिरफ्तार करने गई पुलिस पर हमले किए जा रहे हैं और पकड़े गए लोगों को छुड़ा लिया जा रहा है.हथियारों के साथ औरतें सड़क पर हैं,कहते हुए कि वे अपने बच्चों और मर्दों के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगी.किसी तुलना के लिए नहीं,लेकिन ऐसे सामूहिक प्रतिरोध के बारे में राय कायम करने एक लिए क्या हम किसी दहशतगर्द हमले में शक की बिना पर किसी मुस्लिम बस्ती में की जा गिरफ्तारी के इसी तरह के सामूहिक विरोध की कल्पना कर सकते हैं?उस समय हम उसे उस समूह की  अविचारित सामूहिक प्रतिक्रिया ही मानेंगे. Continue reading सामूहिक अपराध और जवाबदेही

Rajendra Yadav:An era passes on

Rajendra Yadav,the last surviving member of the trio of the Nai Kahani,a major trend in Hindi literature, is gone. The large crowd which assembled at the Lodhi Road crematorium to bid adieu to him consisted of people from different age groups,a fair number of them being youth and women, with diverse professional and political backgrounds. It demonstrated the huge popularity he had earned for himself in the last quarter of his life as the editor of Hans, a literary monthly in Hindi. Continue reading Rajendra Yadav:An era passes on

From dynasty to plain nasty: Satya Sagar

  Guest post by SATYA SAGAR

The shocking spectacle of Siddharth Varadarajan, the Editor of The Hindu, being forced out of his post by a cabal of its owners is a brutal reminder to journalists all over the country that however fine a professional you may be you will always remain at the mercy of media proprietors.

Just around two years ago when N. Ram, the then Editor of The Hindu, passed on the mantle to Varadarajan, a highly respected and independent journalist, he had touted the move as a radical shift away from being a family run outfit to one headed by professionals.

Ram’s motives were neither clear nor very noble, engaged as he was in a bitter struggle with his siblings over control of the newspaper. Still, for the newspaper to move away from its long tradition of tight family control was a welcome, positive departure in a land where dynasties run everything from politics and religion to cricket and cinema.

Unfortunately, this flowering of corporate democracy was not to last too long. Ultimately the family managed to strike back with a vengeance, ganging up in a Board of Director’s meeting to demote Siddharth from the post of Editor to ‘Contributing Editor and Senior Columnist’ prompting his immediate resignation. Continue reading From dynasty to plain nasty: Satya Sagar

पड़ोसी और अजनबी

पड़ोसी कब पड़ोसी न रह कर अजनबी बन जाता है ? या वह हमेशा ही एक अजनबी रहता है जिस पर मौक़ा मिलते ही हमला करने में ज़रा हिचक नहीं होती ? हम अपना पड़ोस चुनते कैसे हैं? क्या पड़ोस मात्र एक भौगोलिक अवधारणा है? क्या जो भौगोलिक दृष्टि से हमारे करीब है, वही हमारा पड़ोसी होगा? पड़ोस चुनना क्या हमारे बस में नहीं? क्या पड़ोस कुछकुछ धर्म या भारतीय जाति की तरह है जिसके साथ जीवन भर जीने को हम बाध्य हैं? क्या पड़ोस का अर्थ हमेशा आत्मीयता ही है? क्या पड़ोस का मतलब एक दूसरे का ख़याल रखना,आड़े वक्त एक दूसरे के काम आना ही है? या यह रिश्ता अक्सर उदासीनता का होता है , जिसमें हमें दरअसल अपने पड़ोसी में दिलचस्पी नहीं होती? क्या इस उदासीनता के हिंसा में बदल जाने के लिए कोई भी कारण काफी हो सकता है? यह प्रश्न जितना शहर के सन्दर्भ में प्रासंगिक है उतना ही भारतीय गाँव के सन्दर्भ में भी पूछे जाने योग्य है. एक बार फिर, मुज़फ्फरनगर के गाँव में हुई हिंसा के बाद, पड़ोस के मायने पर बात करना ज़रूरी हो उठा है. Continue reading पड़ोसी और अजनबी

भगत सिंह और गांधी

क्या भगत सिंह और गांधी पर एक साथ बात की जा सकती है? परस्पर विरोधी विचारों और व्यक्तित्वों का ऐसा युग्म शायद ही मिले.एक को हिंसा का पक्षधर और दूसरे को हिंसा का घोर विरोधी माना जाता है.एक की छवि चिरयुवा की है,दूसरे की एक स्थिर वार्धक्य की. एक अधैर्य का प्रतीक माना जाता है,दूसरा धीरज की प्रतिमूर्ति.एक समाजवादी क्रान्ति का पैरोकार है तो दूसरा सह्य पूंजीवाद का वकील ठहराया गया है जिसके लिए उसने ट्रस्टीशिप की खूबसूरत आड़ ली.

असमानताएं यहीं खत्म नहीं होतीं.भगत सिंह ने औपचारिक शिक्षा न के बराबर ली, हालाँकि वे भयंकर अध्ययनशील थे,गांधी ने एक भले इंसान की तरह पूरी पढ़ाई की और फिर एक पेशेवर वकील की ज़िन्दगी बसर करने की कोशिश की. भगत सिंह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण बचपन से ही ब्रिटिश साम्राज्य के घोर विरोधी थे.गांधी के जीवन के आरंभिक वर्ष ब्रिटिश साम्राज्य के वफादार के थे और वे उसकी बुनियादी अच्छाइयों में यकीन करते थे.भगत सिंह का ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ होना ही स्वाभाविक और तर्कसंगत था, गांधी कई संयोगों और दुर्घटनाओं के रास्ते इस नतीजे पर पहुंचे. Continue reading भगत सिंह और गांधी

भगत सिंह और आज का नौजवान: अपूर्वानंद

कभी कभी हर समाज में ऐसे क्षण  आते हैं जब उसे अपने अस्तित्व के तर्क की पड़ताल करनी पड़ती है. उस समय वह अपने किन बौद्धिक संसाधनों का प्रयोग करता है और किन स्रोतों से तर्क की सामग्री जुटाता है, यह  काफी महत्वपूर्ण है.क्या एक समाज के रूप में भारत के लिए अभी ऐसा ही कोई क्षण उपस्थित हो गया है? एक ऐसा तबका है जो भारत नामक किसी एक सामाजिक इकाई के बौद्धिक औचित्य को ही नहीं मानता. उसकी बात जाने दें.भारत अभी भी अनेकानेक लोगों के लिए एक यथार्थ है जिसकी अपनी भावनात्मक और बौद्धिक वैधता है.वे उसे बार-बार समझने और अपने लिए आयत्त करने की कोशिश करते हैं.इस क्रम में वे किनकी ओर  देखते हैं? Continue reading भगत सिंह और आज का नौजवान: अपूर्वानंद

भाषा का फासीवाद

भाषा का कार्य न तो प्रगतिशील होता है और न प्रतिक्रियावादी, वह  फासिस्ट है: क्योंकि फासिज़्म अभिव्यक्ति पर पाबंदी नहीं लगाता, दरअसल वह बोलने को बाध्य करता है. रोलां बार्थ का यह वक्तव्य पहली नज़र में ऊटपटांग और हमारे अनुभवों के ठीक उलट जान पड़ता है. हम हमेशा से ही फासिज़्म को अभिव्यक्ति का शत्रु मानते आए हैं. लेकिन बार्थ के इस वक्तव्य पर गौर करने से, और हमारे आज के सन्दर्भ में खासकर, इसका अर्थ खुलने लगता है. इसके पहले कि हम आगे बात करें, यह भी समझ लेना ज़रूरी है कि बार्थ की खोज कुछ और थी. वे अर्थापन की नई विधि या पद्धति की तलाश में थे. अंततः उनकी खोज अर्थ से मुक्ति की थी, एक असंभव संधान लेकिन दिलचस्प: स्पष्टतः वह एक ऐसी दुनिया का स्वप्न देखता है जिसे अर्थ से मुक्ति हासिल होगी( जैसे किसी को अनिवार्य सैन्यसेवा से छूट मिली होती है). हम हिन्दुस्तानियों के लिए इसका पूरा अभिप्राय समझना कठिन  है लेकिन एक अमेरीकी या रूसी या इस्राइली के लिए नहीं. उन्हें पता है कि वयस्क होते ही राज्य उनको  सेना में भर्ती होने के लिए बाध्य कर सकता है. प्रसंगवश अनेक न्यूनताओं के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के पक्ष में  यह बात भी है कि उसने अपने नागरिक को सैन्य पदावली में परिभाषित नहीं किया. भारतीय होने की शर्त या उसकी कीमत अपना सैन्यीकरण नहीं है. Continue reading भाषा का फासीवाद

विनोद रायना

मेरी मिट्टी जब मिट्टी में मिल रही हो तो मुझे तसल्ली रहे और मेरे दोस्तों को भी कि इसने वाकई अपने आप को खाक कर दिया था. मेरी आखें जो और जितना देख सकती हों, देख चुकी हों, मेरी त्वचा जितने स्पर्शों का अनुभव कर सकती थी, कर चुकी हो, मेरे पैर जितना चल सकते थे, चल चुके हों ;मेरे हरेक अंग और एक-एक इंद्रिय ने, कुदरत ने जो कुछ उन्हें बख्शा था और फिर उन्होंने खुद जो कुछ भी उस नेमत में जोड़ा था, सब का सब लौटा दिया हो.मैं अपने आखिरी लम्हे में मिट्टी के अलावा कुछ और न रह जाऊं , अपने साथ जो कुछ कमाया था, उसमें से कुछ बचा ले जाने का अफ़सोस न रह जाए. मैं ऐसी ही मौत और ऐसी ही ज़िंदगी चाहता हूँ.

4916512513_64a025b94b_mक्या विनोद रायना ने लैटिन अमरीकी कवि हिमनेज के जीवन-सिद्धांत की इस कसौटी पर खुद को कस कर इत्मीनान की आख़िरी साँस ली होगी?विनोद रायना सिर्फ तिरसठ साल के थे. कैंसर ने जब उनकी हंगामाखेज ज़िंदगी पर शिकंजा कसना शुरू किया होगा और उन्हें इसकी भनक लगी होगी,उन्होंने भी जवाब में अपनी रफ़्तार चौगुनी कर दी होगी,ऐसा मुझे लगता है. क्या एक साल को चार साल के बराबर जिया जा सकता है? क्या आप एक घंटे में चौबीस घंटा कस दे सकते हैं ? विनोद ने जैसे यही करना तय कर लिया हो. लेकिन यह वे कोई अभी ही कर रहे हों,कैंसर की पहली आहट जब उन्होंने अपने शरीर में सुनी होगी, ऐसा नहीं है. हम उनसे मजाक किया करते कि हिन्दुस्तान के ऐसे कोने का नाम बताइये जो आपके चरण रज से पवित्र न हुआ हो! विनोद हमेशा कहीं-से-कहीं के बीच में होते थे. फिर भी आप जब इस बीच उनसे मिल रहे होते तो वे आपसे इतने इत्मीनान से बात करते कि इसका अहसास ही नहीं हो पाता कि यह शख्स अभी एक घंटा पहले ट्रेन या हवाई यात्रा करके आया है और इसे घंटे भर बाद ही कहीं और के लिए रवाना हो जाना है. व्यक्तित्व में यह इत्मीनान दुर्लभ है,विशेषकर उनमें जो ‘एक्टिविस्ट’ कहे जाते हैं. इस वजह से उनसे मिलने वाले किसी में कभी न तो हीनता बोध आया और न अपराध बोध. यह भी विरल है. अक्सर ऐसी मुलाकातों के बाद आप आत्म-भर्त्सना के शिकार हो सकते हैं कि आपकी ज़िंदगी उस एक्टिविस्ट के मुकाबले हेच है, आप किसी काम के नहीं. विनोद ने सामनेवाले को कभी यह अहसास होने नहीं दिया, बल्कि इसका उलटा ज़्यादा ठीक है : हर किसी को यह विश्वास दे पाना कि वह सार्थक जीवन जी रहा है और उसमें संभावना है. Continue reading विनोद रायना

परिसर, प्रेम और हिंसा : अपूर्वानंद

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय – जे. एन.यू. में एक छात्र द्वारा अपनी सहपाठिनी पर प्राणघातक हमले और आत्महत्या की घटना ने विश्वविद्यालय के अलावा बाहरी दुनिया  को भी  हिला दिया है.जे.एन.यू. के शिक्षक और छात्र आत्मनिरीक्षण कर रहे हैं.आखिर जे.एन.यू. में, जो उदारवादी, ‘कॉस्मोपौलिटन’मूल्यों का परिसर माना जाता है, ऐसी घटना हो ही कैसे सकती थी! अनेक लोगों को बरसों पहले लिखी उदय प्रकाश की कहानी ‘ रामसजीवन की प्रेम कथा’ की याद हो आई. कहानी की पृष्ठभूमि में जे.ने.यू. के परिसर का जीवन ही है. गाँव से आया और दिल्ली से चौंधियाया हुआ रामसजीवन एक अंग्रेज़ी माध्यम के परिवेश से आई छात्रा के इर्द-गिर्द प्रेम की एक फंतासी बुन लेता है और उसे सच मानने लगता है. कहानी के विस्तार में जाने की ज़रूरत यहाँ नहीं है, लेकिन उसमें एक चेतावनी तो थी जिसे ठीक से सुना नहीं गया. उसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है: परिसर को अपने आप में उदार, आधुनिक मूल्यों का वाहक मानना भ्रामक स्थितियों को जन्म दे सकता है. जे. एन.यू. में ही अनेक प्रकार के सामाजिक स्तर  हैं और ऐसा नहीं कि वहाँ की शिक्षा इन्हें कमज़ोर ही करती हो. वे और सख्त भी होते जा सकते हैं. ये स्तर आर्थिक कारणों से लेकर भाषाई सम्पन्नता तक से जुड़े हुए हो सकते हैं. मसलन अंग्रेज़ी माध्यम के छात्रों का एक अलग वर्ग-स्वभाव अपने आप ही बन जाता है. उससे बाहर रह गए छात्रों में वंचित रह जाने की भावना हिंसा को जन्म दे सकती है. दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि अपनी भाषाई और वर्गपृष्ठभूमि का अतिक्रमण करने की सम्भावना यहाँ दिखलाई पड़ने लगती है और इसलिए उससे मुक्त होने की आकांक्षा उसी पृष्ठभूमि के छात्र मित्रों से अलगाव भी पैदा कर सकती है. इसके कारण भी हिंसा जन्म ले सकती है. हमेशा वह व्यक्त ही हो, आवश्यक नहीं. अव्यक्त रूप में रह कर भी वह व्यक्तित्व को विकृत कर सकती है. Continue reading परिसर, प्रेम और हिंसा : अपूर्वानंद

A Guantanamo of the Intellect

 

Close on the heels of the axing by Calicut Uniersity of a poem from an English textbook, for the alleged ‘terrorist links’ of the poet, comes the news of cancellation of a scheduled lecture of Dr. Amina Wadud , a US based Islamic scholar by the authorities of the Madras University.

Calicut University succumbed  to the demand of the ‘Shiksha Bachao Andolan’ , one of the many outfits of the RSS pariva,r that the poem ‘ Ode to the Sea’ be removed from the textbook ‘ Literature and Contemporary Issues’ as its author Ibrahim al- Rubaish was a ‘terrorist’. It was also demanded that the persons responsible for the selection of the poem be identified to ‘uncover’ the network of the ‘sympathizers’ of terrorists in the board of studies and academic council of the university. Continue reading A Guantanamo of the Intellect

आत्ममुग्ध क्रांतिकारिता और वरवर राव : अपूर्वानंद

हर वर्ष इकतीस जुलाई को दिल्ली में ‘हंस’ पत्रिका की ओर से किसी एक विषय पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया जाता रहा है. बातचीत का स्तर जो हो, यह एक मौक़ा होता है तरह-तरह के लेखकों, पाठकों और साहित्यप्रेमियों के एक-दूसरे से मिलने का. कई लोग तो वहीं सालाना मुलाकातें करतें है. मेरी शिकायत हंस के इस कार्यक्रम से वही रही है जो दिल्ली में आमतौर पर होने वाले हिंदी साहित्य से जुड़े अन्य कार्यक्रमों से है: इंतजाम के हर स्तर पर लापरवाही और लद्धड़पन जो निमंत्रण पत्र में अशुद्धियों और असावधानी से लेकर कार्यक्रम स्थल पर  अव्यवस्था, मंच संचालन में अक्षम्य बेतकल्लुफी तक फैल जाता है.प्रायः वक्ता भी बिना तैयारी के आते हैं और जैसे नुक्कड़ भाषण देकर तालियाँ बटोरना चाहते हैं.ऐसे हर कार्यक्रम से एक कसैला स्वाद लेकर आप लौटते हैं. श्रोताओं के समय, उनकी बुद्धि के प्रति यह अनादर परिष्कार के विचार का मानो शत्रु है. मैं हमेशा अपने युवा  छात्र मित्रों को ऐसी जगहों पर देख कर निराशा से भर उठता हूँ : ये सब यहाँ से हमारे बारे में क्या ख्याल लेकर लौटेंगे?

यह भी हिंदी के कार्यक्रमों की विशेषता है कि जितना वे अपने विषय के कारण नहीं उतना आयोजन , आयोजक और प्रतिभागियों के चयन से सम्बद्ध इतर प्रसंगों के कारण चर्चा में बने रहते हैं. चटखारे लायक मसाला अगर उसमें नहीं है तो शायद ही मंच पर हुई ‘उबाऊ’ चर्चा को कोई याद रखे. अक्सर सुना जाता है कि फलां को तो बुलाया ही इसलिए गया था कि  विवाद पैदा हो सके. विवाद अपने आप में उतनी भी नकारात्मक चीज़ नहीं अगर उससे कुछ विचार पैदा हो. लेकिन प्रायः विवाद और कुत्सा में अंतर करना हम भूल जाते हैं. विवाद में फिर  भी मानसिक श्रम लगता है, कुत्सा में मस्तिष्क को  हरकत में आने की जहमत नहीं मोल लेनी पड़ती. Continue reading आत्ममुग्ध क्रांतिकारिता और वरवर राव : अपूर्वानंद

आतंकवादी कविता के विरुद्ध युद्ध: अपूर्वानंद

‘शिक्षा बचाओ आन्दोलन’ ने आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय युद्ध में नई जीत हासिल की है. वह कालीकट विश्वविद्यालय के स्नातक स्तर की  अंग्रेज़ी की पाठ्यपुस्तक –‘लिटरेचर एंड कंटेम्पररी इश्यूज’ से ‘अल कायदा से जुड़े एक आतंकवादी’ इब्राहिम अल रुबाईश की कविता ‘ओड टू द सी’ को निकलवा देने में सफल रहा है.  आन्दोलन की केरल इकाई के सचिव ने इस कविता को पाठ्यपुस्तक में शामिल करने को ‘गंभीर मामला’ बताते हुए कहा था कि किताब को वापस लेने और विश्वविद्यालय द्वारा माफी माँगने के बाद इसकी जांच होनी चाहिए कि ‘बोर्ड ऑव स्ट्डीज़’ और अकेडमिक काउन्सिल’ में आतंकवादियों के समर्थक कौन हैं जिससे इस तरह की सामग्री के चुनाव के पीछे की साजिश का पर्दाफ़ाश हो सके.

कुलपति ने फौरन अपने डीन प्रोफ़ेसर एम.एम. बशीर को मामले की जांच करने को कहा. उन्होंने कहा कि ऊपर से निर्दोष लगने वाली इस  कविता में रुबाइश ने अत्यंत अर्थगर्भी प्रतीकों का इस्तेमाल किया है जो खतरनाक भी हो सकते हैं.मसलन, उसने ‘फेथलेस’ शब्द का प्रयोग किया है जो अरबी शब्द ‘काफिर’ का अंग्रेज़ी अनुवाद है. फिर जैसा आज का अकादमिक रिवाज है, वे इंटरनेट पर गए और पता किया कि इस कवि  ने अमरीका के खिलाफ जंग का आह्वान भी किया था. भला इसके बाद और सोचने की ज़रूरत ही क्या रह जाती है?पाठ्यपुस्तक के संपादकद्वय में से एक ने लगभग माफी माँगते हुए कहा कि डेढ़ साल पहले इसे संपादित करते वक्त रुबाइश के बारे में ज़्यादा सामग्री ‘ऑनलाइन’ मौजूद न थी. अगर उन्हें कवि के  राजनीतिक रुझान  का जरा भी अंदाज होता तो वे इसे कतई न चुनते. Continue reading आतंकवादी कविता के विरुद्ध युद्ध: अपूर्वानंद

The BJP’s very own Stalin

Yashwant  Sinha is a worried man these days. He is apprehensive of his leader Narendra Modi being taken for a ride by the Congress party. He says that the Congress party is laying a trap for him, a trap of the binary of Communalism and Secularism and  fears that his upward looking Narendra Modi might fall in it. So, well  wisher that he is of Narendra Bhai, he wants to alert him: do not get  entangled in the conspiracy of the wily Congress. He appeals to Narendra Modi to stick to people’s issues and not let the political discourse  shift to the terrain of the Secularism  versus Communalism debate. Continue reading The BJP’s very own Stalin

मुकदमा क्या सिर्फ मीना कुमारी पर चले ?: अपूर्वानंद

मीना कुमारी पुलिस हिरासत में हैं.उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 120 के तहत मामला दर्ज किया गया है. यानी उन पर छपरा के गंडामन गाँव के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय में पढने वाले तेईस बच्चों की ,जो स्कूल का मध्याह्न भोजन खाने के बाद मारे गए, इरादतन ह्त्या और उनकी ह्त्या के लिए आपराधिक षड्यंत्र का आरोप है.उन पर मुकदमा चलने और साक्ष्यों के स्थापित होने के  पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने दल के कार्यकर्ताओं के समक्ष शिक्षा मंत्री के षड्यंत्र के सिद्धांत को दुहराया है. आज , जब मैं जनसत्ता में छपी अपनी टिप्पणी को देख रहा हूँ, मुख्यमंत्री ने इसे दुर्घटना मानने से इनकार किया है. लेकिन वे इसे बाहरी साजिश का नतीजा मानते हैं. पहले ही इशारे किए जा चुके हैं. मीना कुमारी के पति के राष्ट्रीय जनता दल से सम्बन्ध की बात बार-बार कही जा रही है. कहा जा रहा है कि दुर्घटना वाले दिन वह स्कूल आया था और यह भी कि भोजन सामग्री की खरीदारी वही किया करता था. पहले यह खबर लगातार चलाई गई कि भोजन-सामग्री उसकी दुकान से खरीदी जाती थी. सच यह है कि उसकी कोई दुकान नहीं है. यह भी कोई  नहीं पूछ रहा कि आखिर मीना कुमारी का पति  सामान न खरीदता तो और कौन था यह काम करने वाला? क्या यह काम भी मीना कुमारी को ही करना चाहिए था?

मीना कुमारी की तस्वीर खलनायिका की बन चुकी है: रसोई बनाने वाली के संदेह के बावजूद  खाना उसी तेल में बनाने और फिर बच्चों की हिचक के बाद भी उन्हें खाने को मजबूर करने वाली औरत हत्यारी नहीं तो और क्या हो सकती है! Continue reading मुकदमा क्या सिर्फ मीना कुमारी पर चले ?: अपूर्वानंद

The buck should not stop with Meena Kumari

Let us recount some facts to understand the circumstances that led to the death of 23 children at a primary school at Gandaman, Chapra . First, some micro-facts :

  • The primary school struck by the  tragedy  is  a NAV SRJIT VIDYALAYA, a  newly created school. In fact, it is a break away from an earlier existing middle school   in the village.
  • This school, if you care to call it by this name, is a single room structure  with a floor full of potholes.
  • There is neither a kitchen nor a   facility to store the raw food-items in the school.
  • There is no source of clean drinking water in the school. There is a hand pump there but you get hard water from it.
  • Meena Kumari was NOT the headmistress of the school . She was only the teacher –in-charge of the school.
  • The school has two women teachers including Meena Kumari. The other one was on maternity leave  at the time of the incident. Meena Kumari was the only teacher left to look after more than 60 children, from class one to five who study there , a duty which includes teaching, supervising Mid-Day Meal (MDM) and other administrative duties. Continue reading The buck should not stop with Meena Kumari

पाकिस्तानी गाली नहीं है : अपूर्वानंद

लखनऊ के बारहवीं कक्षा के एक छात्र आदित्य ठाकुर ने हाल में विदेश मंत्रालय के सचिव को हाल में  एक पत्र लिखकर तकलीफ जताई  है कि भारत का संचार तंत्र , विशेषकर टेलिविज़न पड़ोसी मुल्कों के खिलाफ नफरत का प्रचार करता है. आदित्य ने यह पत्र ‘इंडिया न्यूज़’ नामक  टी. वी. चैनल  के एक कार्यक्रम से दुखी होकर लिखना तय किया. कार्यक्रम पाकिस्तान में पोलियो की बीमारी की समस्या पर केंद्रित था. ऊपरी तौर पर एक गंभीर मसले पर चर्चा करने के लिए बनाए इस कार्यक्रम का शीर्षक था, ‘लंगड़ा पाकिस्तान’. आदित्य ने लिखा है पूरा  कार्यक्रम  पाकिस्तान के बारे में प्रचलित ‘स्टीरियोटाइप’, उसके प्रति अपमानजनक  और सनसनीखेज प्रसंगों से भरा पड़ा था.रिपोर्ट लगातार पाकिस्तान को ‘दुनिया को तबाह करने के सपने देखने वाला’ कह कर संबोधित कर रही थी. ‘बम का क्या करोगे पाकिस्तान , खाओगे?’ और ‘दो बूँद से मत डरो पाकिस्तान’ जैसे संवादों से कार्यक्रम की पाकिस्तान के प्रति घृणा जाहिर थी. Continue reading पाकिस्तानी गाली नहीं है : अपूर्वानंद

आत्मा से मुठभेड़ की चुनौती: अपूर्वानंद

इशरत जहाँ एक उन्नीस साल की लड़की थी जब वह मारी गई.शायद उसके बारे में इसके अलावा इस निश्चितता के साथ हम कुछ और कभी नहीं जान पाएंगे. इसकी वजह सिर्फ यह है कि जिन्हें इस देश में सच का पता लगाने का काम दिया गया है वे एक लंबे अरसे से झूठ को सच की तरह पेश करने का आसान रास्ता चुनने के आदी हो गए हैं. उनके इस मिथ्याचार पर कभी सवाल न खड़ा किया जा सके इसका सबसे अच्छा तरीका है राष्ट्र रक्षक की अपनी छवि का दुरुपयोग निस्संकोच करना. जो राष्ट्र की रक्षा करता है उसे उसकी रक्षा के लिए किसी को मात्र संदेह के आधार पर मार डालने का हक है, यह हमारे देश का सहज बोध है. सिर्फ अशिक्षितों का नहीं, उसने कहीं ज़्यादा राजनीति शास्त्र की किताबों से नागरिक अधिकारों का ज्ञान प्राप्त किए हुए स्नातकों का. उन सबका जिन्हें देश की जनता के पैसे से संविधान की हिफ़ाजत के लिए अलग-अलग काम सौंपे जाते हैं. और भी साफ़ कर लें, इन स्नातकों में भी उनका जो प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी हैं, जासूसी के अलग-अलग महकमों से जुड़े ऑफिसर हैं, जिनकी असली पहचान कभी उजागर नहीं हो पाती. अगर दूसरे मुल्क में वे पकड़े जाएं तो वही देश उनसे हाथ धो लेता है जिसकी सुरक्षा में वे अपनी असली पहचान छिपाए फिरते हैं.

क्या कोई यह कहने की हिमाकत कर सकता है कि राष्ट्र-राज्य के खिलाफ साजिशें नहीं होतीं, कि राष्ट्र-विरोधी शक्तियों का अस्तित्व ही नहीं! यह बिलकुल अलग बात है कि राष्ट्र विरोधी का बिल्ला किन पर आसानी चस्पां किया जा सकता है और किन पर वह बिलकुल चिपकता ही नहीं. मसलन, इस्लामी राष्ट्र का तस्सवुर धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के बिलकुल खिलाफ है, क्या इसके लिए किसी अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है? लेकिन यह समझना और समझाना टेढ़ी खीर है कि हिन्दू राष्ट्र की कल्पना भी उतनी ही राष्ट्रविरोधी है! आज से बीस साल पहले और आज भी   खालिस्तान का ख़याल इस्लामी राष्ट्र जितना ही राष्ट्र विरोधी माना जाता था. Continue reading आत्मा से मुठभेड़ की चुनौती: अपूर्वानंद

DU’s FYUP shall only increase chaos: Abha Dev Habib

Guest post  by ABHA DEV HABIB: Delhi University has been in a state of utter chaos and confusion ever since admissions to the Four Year Undergraduate Programme (FYUP) started with the announcement of the first cut-off list on 27 June 2013. For the first time windows were closed before time on the aspirants because of over admissions in various courses across colleges. Colleges could not have broken the rules in this manner without the backing of the DU administration. Students and parents knocked on every door including the Vice Chancellor’s but without any effect. Demanding justice, parents and students staged a dharna in one of the colleges – this too fell on deaf years. This was bound to happen with the situation of lawlessness at the University increasing day by day. The DU administration, with the support of the Government, has assumed a role beyond the bounds of rule books. Continue reading DU’s FYUP shall only increase chaos: Abha Dev Habib

दलाल स्ट्रीट और जे. एन. यू. : अपूर्वानंद

क्या जे.एन. यू.( जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ) दरिद्रता या दरिद्र्तावाद की दलाल स्ट्रीट है? अगर एक प्रभावशाली संपादक और एक लोकप्रिय दलित चिन्तक की मानें तो यही उसका डी.एन.ए. है. वह लोगों के आत्म- निर्भर होने के खयाल के खिलाफ है. आत्मनिर्भरता का अर्थ क्या है? क्यों सारे दलित बराबरी के लिए पूंजीवाद नामक रामबाण को नहीं अपना लेते और क्यों वे बराबरी को जितना आर्थिक, उतना ही राजनीतिक और सांस्कृतिक मसला समझते हैं, इस पर बात कभी और की जा सकती है. इस पर भी कि क्यों ऐसा मानना खराब अर्थों में मार्क्सवादी होना है. भारत के मार्क्सवादी ही नहीं अनेक उदार लोकतांत्रिक विचारों वाले लोगों को पूंजी की शक्ति पर जो भरोसा था, उससे उबारने के लिए उन्हें दया पवार , नामदेव ढसाल, कुमुद पावड़े, शरण कुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे लेखकों को अपनी कहानी सुनानी पड़ी. वह कहानी कितनी लंबी है, यह रोज़ ऐसे लेखकों की आमद से पता चलता है जो खुद को लेखक नहीं, दलित लेखक ही कहलाना चाहते हैं. अलग-अलग भाषाओं में कही जा रही यह कहानी पाठकों को ‘एक-सी’ लगती है. इन्हें पढ़ते हुए वे ‘दुहराव’ और ‘ऊब’ की शिकायत भी करते हैं. इन आख्यानों में ‘सर्जनात्मकता और कल्पनाशीलता की कमी’ मालूम पड़ती है. लेखक के अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के दर्शन उन्हें नहीं हो पाते. Continue reading दलाल स्ट्रीट और जे. एन. यू. : अपूर्वानंद

विश्वविद्यालय और उत्कृष्टता के प्रश्न

पद ग्रहण करने के बाद लगभग हर पखवाड़े हमारे राष्ट्रपति किसी न किसी शिक्षा संस्थान में दीक्षांत समारोह में भाग ले रहे हैं। इससे शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा के प्रति उनके  लगाव और चिंता का प्रमाण  मिलता है।  हर जगह उन्होंने इस पर व्यथा जताई है कि हमारे  विश्वविद्यालय के दो सौ श्रेष्ठतम शिक्षा संस्थानों में कहीं नहीं हैं। चिंता कोई  नई नहीं है। हमारे विश्वविद्यालयों में प्रथम श्रेणी का शोध नहीं होता, हम मौलिक खोज नहीं कर पाते , ज्ञान भंडार में हमारे योगदान के प्रमाण की तलाश हमें लज्जित करती है! शिकायतों की  फेहरिस्त और लम्बी हो सकती है। इस पर ताज्जुब ज़रूर किया जा सकता है कि पलक झपकते ही  समितियां और क़ानून बनाने की अभ्यस्त व्यवस्था ने इस प्रश्न पर विचार करने के लिए अब तक कोई समिति क्यों नहीं बनाई !

एक प्रवृत्ति इस सवाल से कतराने की  रही है। इस राष्ट्रवादी रवैये के मुताबिक़ हमारी अपनी परिस्थितयां है और हमें श्रेष्ठता के अपने पैमाने बनाए चाहिए,   पराए पर्यावरण में पहने फूलने वाले शिक्षा संस्थानों से तुलना व्यर्थ है, उनके मानदंड हमारे मानदंड नहीं हो सकते! लेकिन हम सब जानते हैं  कि  यह तर्क समस्या से कतराने का खूबसूरत आवरण है, कि  हम अंतरराष्ट्रीय वातावरण में काम कर रहे हैं और ‘हमारा’ सीमित अर्थ में ही हमारा है। Continue reading विश्वविद्यालय और उत्कृष्टता के प्रश्न